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संपादकीयः विषम हुई राह

दिल्ली सरकार ने वायु प्रदूषण की भयावहता के मद्देनजर तेरह से सत्रह नवंबर तक, सुबह आठ बजे से रात आठ बजे तक सम-विषम फार्मूला लागू करने की घोषणा की थी, जिसके मुताबिक सम और विषम नंबर वाली निजी गाड़ियों को, एक दिन के अंतराल पर, बारी-बारी से चलने की इजाजत दी गई थी।
Author November 11, 2017 03:32 am
चीन इस साल ढाई हजार प्रदूषण फैलाने वाली कंपनियों को बंद करेगा। वहीं, दिल्‍ली सरकार समीक्षा के बाद ऑड ईवन रूल को जारी रखने का फैसला करेगी। (REUTERS)

दिल्ली सरकार ने वायु प्रदूषण की भयावहता के मद्देनजर तेरह से सत्रह नवंबर तक, सुबह आठ बजे से रात आठ बजे तक सम-विषम फार्मूला लागू करने की घोषणा की थी, जिसके मुताबिक सम और विषम नंबर वाली निजी गाड़ियों को, एक दिन के अंतराल पर, बारी-बारी से चलने की इजाजत दी गई थी। लेकिन इस घोषणा के अगले ही रोज यानी शुक्रवार को इस पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की तलवार लटक गई। एनजीटी ने कहा कि सम-विषम फार्मूला लागू करने के दिल्ली सरकार के आदेश पर फिलहाल वह कोई रोक नहीं लगा रहा है, लेकिन यह फार्मूला उसकी अनुमति के बाद ही लागू किया जा सकेगा। अगले दिन यानी शनिवार को फिर सुनवाई होगी, और शायद तभी साफ हो पाएगा कि दिल्ली सरकार के ताजा आदेश का हश्र क्या होगा। ग्रीन ट्रिब्यूनल की स्थापना पर्यावरण की सुध लेने के लिए ही की गई थी। आखिर क्या हुआ कि एनजीटी को वायु प्रदूषण से राहत दिलाने का दिल्ली सरकार का तरीका रास नहीं आया? दरअसल, सम-विषम फार्मूले की तजवीज पहली बार नहीं हुई है; इससे पहले दो बार यह कुछ-कुछ दिनों के लिए लागू किया जा चुका है। एनजीटी को यह विचित्र लगा कि दोनों बार के अनुभवों की बगैर समीक्षा किए एक बार फिर सम-विषम को आजमाया जा रहा है।

गौरतलब है कि पिछले साल अप्रैल में एनजीटी को दी गई अपनी एक रिपोर्ट में सीपीसीबी यानी केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने कहा था कि ऐसे कोई आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं जो यह साबित करते हों कि सम-विषम योजना लागू रहने के दौरान वाहन-जनित प्रदूषण में कमी आई थी। फिर, किस बिना पर दिल्ली सरकार सम-विषम फार्मूले को एक बार फिर लागू करने जा रही है? एनजीटी ने इस बात को लेकर गहरी नाराजगी जताई कि उसने और सर्वोच्च न्यायालय ने प्रदूषण से राहत दिलाने के लिए बहुत सारे उपाय सुझाए थे, पर दिल्ली सरकार उन उपायों को छोड़, केवल सम-विषम को ही लागू करने पर क्यों आमादा है? इस फार्मूले के औचित्य पर कई विशेषज्ञों ने सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि इस फार्मूले के लागू होने के समय तक वैसे भी वातावरण में सुधार आने की उम्मीद है। फिर, एक अहम सवाल यह है कि पिछले एक साल में दिल्ली सरकार ने क्या किया? दिल्ली में वायु प्रदूषण की भयावहता पहली बार सामने नहीं आई है, साल भर पहले दिवाली के बाद भी ऐसा ही मंजर था। लेकिन तब से क्या किया गया?

यह सवाल दिल्ली सरकार के साथ-साथ उपराज्यपाल और केंद्र से भी पूछा जाना चाहिए। यों तो केंद्र सरकार और उपराज्यपाल दिल्ली सरकार को उसकी हदों की याद दिलाना कभी नहीं भूलते, पर ऐसे भयावह वक्त में, जब सांस लेना मुश्किल मालूम पड़ रहा हो और वायु प्रदूषण के चलते मरीजों की तादाद में बीस फीसद की वृद्धि दर्ज की गई हो, लगता है केंद्र ने अपनी जिम्मेवारी से पल्ला झाड़ रखा है। दिल्ली में वायु प्रदूषण के बहुत खतरनाक स्तर तक पहुंच जाने के पीछे एक प्रमुख कारण हरियाणा व पंजाब में पराली जलाना भी माना जा रहा है। यह बेहद अफसोस की बात है कि केंद्र ने संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाने की अभी तक कोई जरूरत नहीं समझी है। केंद्र की खामोशी क्या इसलिए है कि प्रदूषण से निपटने के लिए अप्रिय कदम उठाने होंगे, इसलिए कौन इसमें पड़े! पर अब वक्त आ गया है जब पर्यावरण को बचाने का काम अभियान की तरह और समन्वित रूप से करना होगा।

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