December 03, 2016

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बेबाक बोल धन वापसी- स्याह सफेद

पिछले मंगलवार की रात टीवी पर ‘महानायक’ की तरह ‘अवतरित’ होकर आपने ज्यों ही देश की 86 फीसद मुद्रा को अवैध बना दिया, कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक की 99.9 फीसद जनता भौंचक थी।

आजादी के कुछ समय बाद से ही भ्रष्टाचार से सबसे त्रस्त रही आम जनता कालेधन के खिलाफ छिड़े अभियान के समर्थन में ही खड़ी होगी। भ्रष्टतंत्र से फैले पैसे से खोखली होती भारतीय अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए हम सब सबसे आगे खड़े हैं। लेकिन सरकार को ऐसे कड़े फैसले लेने से पहले इस बात का पुख्ता इंतजाम करना था कि पहले ही कई दिक्कतों से जूझ रही आम जनता को इसके कारण भूखे नहीं रहना पड़ता। भूखे दिहाड़ी मजदूर और कभी न खत्म होती दिख रही कतार में खड़े मध्यमवर्ग को सुबह से शाम खड़ा देख एक चैनल पर राकांपा नेता व साहित्यकार देवीप्रसाद त्रिपाठी बहादुरशाह जफर के अल्फाज में हेरफेर करते हुए कह रहे थे, ‘उमर-ऐ-दराज मांग के लाए थे चार दिन, दो कट गई कतार में और दो जुगाड़ में’। दुनिया के कई देश अर्थव्यवस्था की सेहत सुधारने के लिए करंसी में बदलाव करते रहते हैं। भारत सरकार रिजर्व बैंक को इसके लिए पूरी तरह तैयार कर यह कड़ा फैसला लेती तो आम लोगों को इतनी तकलीफ नहीं होती। अभी तक बैंकिंग व्यवस्था से बेदखल किसानों को बुआई के समय उन बैंकों के सामने खड़ा कर दिया गया जहां नकदी पहुंच ही नहीं रही। बहुत मुश्किल से तो लोगों का बैंकों पर भरोसा हुआ था लेकिन हड़बड़ी में उठाए इस कदम ने निजी के साथ ही सरकारी बैंकों से भी हाशिए पर पड़ी जनता का भरोसा उठा दिया। खैर, कुछ दिनों में हालात सामान्य होने के बाद आम लोग रोजी-रोटी में मशगूल हो जाएंगे लेकिन सरकार के हड़बड़ी में उठाए इस फैसले पर लंबे समय तक सवाल उठते रहेंगे। धन वापसी की हड़बड़ी और गड़बड़ी पर इस बार का बेबाक बोल।

पिछले मंगलवार की रात टीवी पर ‘महानायक’ की तरह ‘अवतरित’ होकर आपने ज्यों ही देश की 86 फीसद मुद्रा को अवैध बना दिया, कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक की 99.9 फीसद जनता भौंचक थी। अफरातफरी तो उसी रात से शुरू हो गई थी, लेकिन सुबह तक देश में कोहराम मच चुका था और मरी हुई मुद्रा के साथ जनता खुद को जिंदा लाश की तरह पा रही थी। चूंकि आप रात में शेर की तरह दहाड़ कर बोल चुके थे कि मेरा यह कदम भ्रष्टाचारियों के लिए और देश के शुद्धीकरण के लिए है, इसलिए उस दहाड़ से दहली कमजोर बिल्ली जैसी देश की निरीह जनता खुद को बेगुनाह साबित करने के लिए कभी न खत्म होने वाली कतार में खड़ी हो गई। सभ्यता-संस्कृति की नाक ऊंची रखने वाले देश में सारी पत्नियां एक झटके में भ्रष्टाचारी करार दी जा चुकी थीं और भारतीयों के बीच प्रचलित होने से लेकर अमेरिकी अखबारों तक में पत्नियों को निशाने पर लेकर चुटकुले छप रहे थे। अपने बेटे-बहू से छिपा कर आपातकाल के लिए पैसे जोड़ कर रखने वाली अस्सी साल की वह मां अपनी उन संतानों के सामने अपराधी की तरह खड़ी थीं, जिनके लिए ही उन्होंने वे पैसे जोड़े थे। अब तक उनके सजदे में बेटे के सिर झुकते थे, आज वही बेटा उन पर त्योरियां चढ़ाए सामने खड़ा था।

ऐन शादी के मौसम में दूल्हे नोट बदलने की कतार में थे और कहीं किसी बेटी की मां या किसी पिता की हृदय गति रुकने से मौत हो चुकी थी। जिनके भी घर में जन्म, शादी या मृत्यु जैसा जीवन का अहम पड़ाव या विराम था वे सब त्राहिमाम थे। भूखे पेट खड़े नहीं हो सकने की स्थिति में जिंदा दिखने वाले दिहाड़ी मजदूर अमीरों के लिए नोट बदलने की लाइन में खड़े होने के लिए मजबूर कर दिए गए। दिल्ली के चांदनी चौक से लेकर देश के हर चौक का किराना से खुदरा व्यापार ठप हो गया। बिना अतिशयोक्ति कहा जा सकता है कि यह नजारा देश का पहला आर्थिक आपातकाल जैसा लग रहा था। एक बार बीसवीं सदी में इंदिरा गांधी ने देश के विचारों पर पहरा लगाया था, लेकिन आपने पूरे देश की क्रयशक्ति को ही बंधक बना डाला और रपटें कह रही हैं कि इसकी वजह से देश में अब तक 50 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं।

28 मई 2014 को नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री का पद संभालते ही कालेधन की जांच के लिए विशेष जांच समिति गठित की थी। भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता से उन्होंने चुनावों के समय वादा किया था कि वे ‘प्रधानसेवक’ बनते ही देश से भ्रष्टाचार मिटा देंगे, विदेशों में रखा काला धन निकाल कर हर देशवासियों के खाते में पंद्रह लाख रुपए पहुंचा देंगे। सत्ता मिलते ही सरकार के शाह ने कह दिया कि हर खाते में पंद्रह लाख की बात दरअसल चुनावी जुमला थी। लेकिन भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता का भरोसा उन पर बना रहे, इसलिए ‘प्रधानसेवक’ को कुछ करते हुए दिखना था। उन्हें लग रहा था कि कांग्रेसकालीन गवर्नर उन्हें नायक नहीं बनने देंगे तो उन्हें भी चलता किया। तो केंद्रीय बैंक के नए गवर्नर के साथ प्रधान ने कहा कि अगर कालाधन का पैसा बाहर निकालना है तो पूरी जनता का पैसा बाहर निकाल दो। अब दस दिन में जनता का जितना पैसा बाहर निकला है, उसमें उस मोटे भ्रष्टाचारी का मोटा धन नहीं दिख रहा था। सच तो यह है कि भ्रष्टाचारी का पैसा तो अभी तक नहीं निकला है, मगर बहुत बड़ी जनता के पास अपना पेट भरने के लिए भी पैसा नहीं बचा। विडंबना यह है कि कतार में खड़ी जनता जब जान बचाने की बात करने लगी तो उसके बाद उन्होंने खुद पर ही जान का खतरा बता कर पचास दिन का समय मांग लिया। तब तक 96 साल की बूढ़ी मां को लाइन में लगा कर पैसे हासिल करके देश की जनता को बहलाया गया। लेकिन सच यह है कि पिछले एक हफ्ते से ज्यादा दिनों से रो रही जनता की आंखों से आंसू सूख चुके थे और वह यहां तक कहने लगी थी कि नोट नहीं, अब वोट से मिलना।

तो ऊपर के शब्द उसी लोककथा के शब्दचित्र हैं जो आपके-हमारे मोबाइल से पूरे देश में फैल रहा है। जो चीज रघुराम राजन, पी चिदंबरम और प्रभात पटनायक अपनी अकादमिक भाषा में आम लोगों को नहीं पहुंचा पाते हैं, वही बातें अब कहानियां, चुटकुले और कार्टून के जरिए हर आम आदमी तक पहुंच रही हैं और वह समझ रहा है। मुख्यधारा का मीडिया जो बात कहने में घबराता है, वाट्सऐप के चुटकुले धड़ल्ले से कह कर एक से दूसरे मोबाइल में सेंध मार रहे हैं।
गौरतलब यह है कि दो हजारी गुलाबी नोटों पर मंगलयान उतार चुके इतने बड़े भारत की अर्थव्यवस्था अब तक गांवनुमा है। देश के सिर्फ 40 फीसद एटीएम काम कर रहे हैं और वहां तक भी भारत का केंद्रीय बैंक आरबीआइ करंसी नहीं पहुंचा पा रहा था। इस मसले पर पर जब एक आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता से बात हो रही थी तो उन्होंने हमें लगभग झिड़कते हुए कहा कि आप हिंदी पट्टी के पत्रकार कभी असम से आगे जाकर भी देख पाते हो क्या! जरा जाकर मणिपुर और पूर्वोत्तर के इलाकों का हाल देखो जहां पहले भी करंसी की कमी रहती थी। वहां अभी क्या हाल होगा, इसका अंदाजा ही लगाया जा सकता है। खैर, इस बार तो बदहाली में कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और बिहार और यूपी के दिहाड़ी मजदूर से लेकर रोज लाखों का कारोबार करने वाले चांदनी चौक के कारोबारी के साथ-साथ मोहल्ले के परचून दुकानदार तक की हालत एक सी है। बिना सूखा, बाढ़ या किसी तरह की अन्य कुदरती आपदा आए, वैसी स्थिति पैदा करना किसी बहुमत से चुनी अच्छी-भली चल रही सरकार के लिए फिलहाल ऐतिहासिक गलती ही दिख रही है।

अब पूरा तालाब खंगालने के बाद देश की साधारण तबके की जनता पूछ रही है कि उस मगरमच्छ माल्या का क्या हुआ, पनामा के दागी अमिताभ बच्चन को कोई नुकसान पहुंचा क्या? विशेष जांच समिति की पड़ताल में जब गौतम अडाणी दागी निकले तो जनता पूछ रही है कि अडाणी से 15000 करोड़ का जुर्माना कब वसूलोगे और आम लोगों की शादियों पर मातम पसरा तो जनार्दन रेड्डी की बेटी की शाही शादी में 500 करोड़ के नोट कैसे खर्चे गए? अभी तक आराम फरमा रहे 0.1 फीसद लोगों को पकड़ने का भ्रम फैलाने के लिए 99.9 फीसद जनता को क्यों मुश्किल में डाल दिया गया?
लोकतंत्र में सरकारों की साख तो बनती-बिगड़ती रहती है। लेकिन इस बार उठाए गए इस अव्यावहारिक कदम ने वैश्विक जगत पर भारतीय अर्थव्यवस्था की पोल खोल कर रख दी है। भारत में बैंकिंग सेक्टर अभी बदहाली से जूझ रहा था कि उसकी पूरी विश्वसनीयता पर सवाल उठा दिए गए। सार्वजनिक क्षेत्र के सबसे बड़े बैंक एसबीआइ की बदहाली तो सामने आई ही, साथ ही आरोप लगे कि एसबीआइ ने जानबूझ कर कर्ज न चुकाने वाले उद्योगपतियों (डिफॉल्टर) के 7016 करोड़ रुपए के कर्ज को अपने बट्टे खाते में डाल दिया। निजी बैंकों पर जनता का जो थोड़ा बहुत भरोसा बना था वह भी चकनाचूर हो गया। लोगों तक असली पहुंचने से पहले ही गुलाबी दो हजार की नकली करंसी मिलने के मामले दर्ज हो चुके हैं। एटीएम मशीनें इस नए दो हजारी को उगल नहीं पा रही थीं और बैंक से मिले तो कहीं उसके खुल्ले नहीं हो रहे थे।

संघ से जुड़ा भारतीय मजदूर संघ भी कह चुका है कि विमुद्रीकरण के इस कदम के बाद जरूरी नहीं कि कालेधन पर काबू पा ही लिया जा सके। सरकार के वित्त मंत्री टीवी चैनलों पर नोटबंदी से निपटने के ठोस कारण बताने के बजाए नैतिकता, संयम की ही दुहाई देते रहे। लेकिन कुपोषण, शिक्षा और प्रदूषण से जूझ रहे भारत में प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री से किसान सवाल कर रहे हैं कि बुआई करें कि बैंक की लाइन में लगें? और क्या बीज पेटीएम से खरीदें?
हर अगले रोज नोटबंदी की समस्या से जूझते लोगों के लिए अब यह कोई नई बात नहीं है कि आज नोट निकालने की रकम में तुरंत-तुरंत बढ़ोतरी हुई, कल फिर उसे वापस ले लिया गया। कई बार और बदलाव हुए हैं और लोगों को समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर यह उनके लिए किस कदर बेमानी जंजाल बन गया है। हर आम आदमी चाहता है कि भ्रष्टाचार खत्म हो लेकिन उसके खात्मे के लिए उठाए गए कदम में आम आदमी ही परेशां सा क्यूं है। देश की उसे फिक्र है इसलिए तो शांति से कतार में खड़ा है लेकिन सरकार को इनकी भी फिक्र करनी चाहिए थी क्योंकि देश इनसे ही बनता है।

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First Published on November 19, 2016 2:45 am

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