December 09, 2016

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जेरे बहस : पीछे न छूटे औरतों के हक

तीन तलाक फिर से जेरे बहस है। सब मिलकर मुसलिम औरतों के हक की लड़ाई लड़ने को खड़े दिख रहे हैं। ऐसे समय में ‘आॅल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड’ कुरआन और हदीस की हिदायत देते हुए मुसलिम समुदाय को मजहबी आधार पर इकट्ठा करने की कोशिश में जुटा हुआ है।

Author October 22, 2016 03:51 am

तीन तलाक फिर से जेरे बहस है। सब मिलकर मुसलिम औरतों के हक की लड़ाई लड़ने को खड़े दिख रहे हैं। ऐसे समय में ‘आॅल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड’ कुरआन और हदीस की हिदायत देते हुए मुसलिम समुदाय को मजहबी आधार पर इकट्ठा करने की कोशिश में जुटा हुआ है। उसके अनुसार, ‘औरत को तलाक देना उसे मारने से बेहतर है, तलाक देने का हक मर्दों को ज्यादा है क्योंकि औरतें भावनाओं में बह जाती हैं’। क्या यह कुतर्क मुसलिम समाज को साथ लाकर औरतों की हकबंदी कर सकता है? तीन तलाक की मनमर्जी से अपनाई गई प्रथा के मुताबिक, पति अपनी पत्नी को ‘तलाक तलाक तलाक’ कह कर छोड़ सकता है। ‘निकाह हलाला’ की प्रक्रिया इससे भी ज्यादा शर्मनाक है। इसके मुताबिक, तलाकशुदा जोड़ा तब तक वापस निकाह नहीं कर सकते, जब तक कि महिला दोबारा शादी करने के बाद तलाक ले या विधवा न हो। हलाला के कारण, कई बार औरतों की जबरदस्ती शादी कराई जाती है। आॅल इंडिया मुसलिम पर्सनल बोर्ड और अन्य संगठनों का कहना है कि सरकार को मजहबी रवायतों का अदब करते हुए, दखलंदाजी नहीं करनी चाहिए। लेकिन क्या कोर्ट का कुरआन समझना और राय लेना उसकी धर्मनिरपेक्षता का सबूत नहीं है? भारतीय मुसलिम महिला आयोग के मुताबिक, 88 फीसद मुसलिम महिलाएं भी इस फैसले के पक्ष में हैं। बल्कि, कुरआन के मुताबिक, तलाक की प्रक्रिया 90 दिनों की है। इस तरह तीन तलाक का मौजूदा प्रारूप गैर इस्लामी है। लेकिन इस पुरुषप्रधान समाज के कुछ लोगों ने अपनी मर्जी और सुविधा के अनुसार कुरआन और हदीस को समझ और समझाकर औरतों को गुलाम बनाए रखने की कोशिश की है।

पर्सनल लॉ बोर्ड जैसे संस्थान दावा करते हैं कि वे पूरे देश के मुसलिमों की अगुआई करते हैं। लेकिन सच तो यह है कि अपनी कट्टरपंथी सोच के कारण वे हर तरक्कीपसंद मुसलिम को शर्मिंदा कर उन्हें नए जमाने के हाशिए पर रख देते हैं। और यह सिर्फ महिलाओं की बात नहीं है। धार्मिक कट्टरपंथ के कारण औरतों को अपनी बराबरी का न समझने से मुसलिम मर्दों का भी उतना ही नुकसान हो रहा है। धर्मग्रंथों की व्याख्या अपनी तरह से कर धर्मगुरु अपनी दुकान तो चला रहे हैं लेकिन अपनी कौम के औरत-मर्द को तरक्की की राह में काफी पीछे धकेल रहे हैं।

तीन तलाक जैसी रवायतें मर्दों के पास औरतों के दमन का बहुत बड़ा हथियार हैं। मर्दवादी मानसिकता वाले इस समाज का एक आम मर्द तो कभी नहीं चाहेगा कि उसके हाथ से यह हथियार छिने। धर्मगुुरु भी इसी जेहेनियत का फायदा उठा कर लोगों को इसके खात्मे के खिलाफ लामबंद कर रहे हैं।
लेकिन अब इसे लेकर बदलाव का माकूल वक्त है। लोग सवाल उठा रहे हैं। पाकिस्तान, तुर्की, इजिप्ट, बांग्लादेश जैसे कई देशों ने तीन तलाक को खारिज किया है, तो हिंदुस्तान में क्यों नहीं? तरक्कीपसंद मुसलिम औरतों और मर्दों को एकजुट होकर इसके खिलाफ आवाज उठानी होगी।
जेरे बहस इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता कि जब भी किसी गलत प्रथा की बात होती है तब पूरे मुसलिम धर्म को निशाने पर ले लिया जाता है। हिंदुस्तान में फिलहाल हिंदुत्व की उठी आंधी में यह कौम सबसे ज्यादा सवालों के घेरे में है। हां, सिर्फ हिंदुत्व के खतरे पर सवाल उठाते हुए अपनी कमियों से आंखें नहीं मूंदनी होगी। और इस पर तेज नजर रखनी होगी कि इस बहस में औरत और उसके हक फिर पीछे नहीं छूट जाएं।

शैफिला लधाणी
छात्रा, जामिया मिल्लिया इस्लामिया

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First Published on October 22, 2016 3:42 am

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