ताज़ा खबर
 

पी चिदंबरम का कॉलम दूसरी नजर: आधार विधेयक का मकसद सही, तरीका गलत

इतिहास को किस्सों के जरिए बताया जा सकता है। राजनीति को भी। अगर आप भारत की राजनीति को कहानी के जरिए व्याख्यायित करना चाहते हैं, तो आपको ‘आधार’ की कहानी से आगे जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
Author March 20, 2016 08:58 am
पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम। ( File Photo)

इतिहास को किस्सों के जरिए बताया जा सकता है। राजनीति को भी। अगर आप भारत की राजनीति को कहानी के जरिए व्याख्यायित करना चाहते हैं, तो आपको ‘आधार’ की कहानी से आगे जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। आधार योजना भारत के सभी निवासियों को विशिष्ट पहचान नंबर देने के मकसद से शुरू की गई थी। यह विचार एकदम नया या अपूर्व नहीं था। भारत विशिष्ट पहचान नंबर की  सूझ से देर से जुड़ा। मुझे याद है कि इसका किस तरह से जबर्दस्त विरोध किया गया था। मीनाक्षी लेखी ने इसे ‘धोखा’ करार दिया था, प्रकाश जावडेकर की निगाह में यह ‘गरीबों के साथ खिलवाड़’ था, और अनंत कुमार ने कहा था कि ‘यह एक ऐसी चीज है जिस पर हमें शर्म आनी चाहिए’। अब भाजपा आधार की चैंपियन बन गई है और उसने विवादास्पद विधेयक को संसद के दोनों सदनों से पास करा लिया है।
यह कामयाबी अलबत्ता एक कीमत चुका कर मिली है।

आधार की कहानी
मुझे शुरू से किस्सा बताने दें। सरकारें कई कारणों से पैसे का हस्तातंरण नागरिकों को करती हैं- छात्रवृत्ति, वृद्धावस्था पेंशन, रसोई गैस पर मिलने वाली सबसिडी आदि। इस तरह का पैसा गलत हाथों में चले जाने, दुबारा दे दिए जाने तथा जालसाजी जैसी समस्याएं काफी समय से रही हैं, और धनराशि का खासा हिस्सा वास्तविक लाभार्थियों तक नहीं पहुंच पाता है। हम इन समस्याओं से कैसे पार पा सकते हैं?
इसका जवाब यह था कि हर लाभार्थी की ‘पहचान’ एक ‘विशिष्ट नंबर’ से की जाए, और वह न्यूनतम बायोमीट्रिक आंकड़ों पर आधारित हो। विशिष्ट नंबर योजनाएं देश में पहले से थीं: आय कर विभाग के पास हर करदाता की बाबत पैन नंबर होता है और हर क्रेडिट कार्ड पर कार्डधारक की पहचान कराता नंबर। वर्ष 2009 में यूपीए सरकार ने आधार योजना की पहल की। एक प्रशासनिक आदेश के जरिए विशिष्ट पहचान प्राधिकरण की स्थापना की गई और इस कार्यक्रम तथा प्राधिकरण के संचालन के लिए नंदन नीलकेणि को लाया गया।

प्राधिकरण को नीलकेणि के विशद तकनीकी ज्ञान और उनकी मानी हुई उद्यमशीलता का लाभ मिला। वरना यह भी एक ढिल्लड़ सरकारी महकमे की तरह हो जाता, जो कि इस बात की मिसाल बना कि एक रूपांतरकारी योजना कैसे बनाई और लागू की जाती है। तकनीकके कारगर इस्तेमाल और कार्यक्रम के प्रायोगिक क्रियान्वयन की सफलता के बाद, विशिष्ट पहचानपत्र प्राधिकरण ने लोगों का पंजीकरण शुरू किया और सितंबर 2010 से आधार कार्ड जारी किए जाने लगे।

विधेयक का विरोध
विशिष्ट पहचान प्राधिकरण को संवैधानिक आधार देने के लिए दिसंबर 2010 में विधेयक लाया गया। यह विधेयक वित्त मामलों की स्थायी संसदीय समिति में लटक गया, जिस समिति के अध्यक्ष दुर्जेय और भाजपा के एक पथ-प्रदर्शक यशवंत सिन्हा थे। विधेयक तीन साल तक संसद में अटका रहा।

आधार का विरोध सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी किया था, जिनके पास पंजीकृत न हो पाने की वजह से योजना से बाहर रह जाने वाले लोगों की चिंता से लेकर निजता में दखल तक विरोध के कई ठोस कारण थे। वर्ष 2013 में सर्वोच्च अदालत ने अपने एक अंतरिम फैसले में कहा कि आधार को सरकार से किसी तरह का लाभ पाने के लिए अनिवार्य नहीं किया जा सकता। वर्ष 2015 में मामला एक बड़े पीठ को सौंपा गया, इस पर सुनवाई करने के लिए कि क्या आधार से निजता के अधिकार का उल्लंघन होता है।

इस बीच, विशिष्ट पहचान प्राधिकरण ने पंजीकरण तथा आधार कार्ड जारी करने का काम जारी रखा। मार्च 2014 तक यह साठ करोड़ लोगों को आधार कार्ड जारी कर चुका था (अब 98 करोड़), जो कि दुनिया भर में एक बेमिसाल रिकार्ड था। इसके अलावा, वित्तीय समावेशन कार्यक्रम के तहत चौबीस करोड़ नए खाते खोले गए। एक कायाकल्प हो रहा था।

1 जनवरी 2013 को यूपीए सरकार ने प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) योजना शुरू की, जिसके तहत लाभार्थियों को सबसिडी की राशि आधार नंबर से जुड़े उनके खातों में सीधे भेजी जानी थी। योजना ने आसान और सहज हस्तातंरण का रास्ता खोला था। रसोई गैस पर मिलने वाली सबसिडी को आधार-संबद्ध बैंक खातों में भेजने की अनिवार्यता लागू करना इस सिलसिले में बड़ा कदम था।

सही लक्ष्य, गलत राह
वर्ष 2016 आते-आते आधार को लेकर भाजपा का नजरिया पूरी तरह बदल गया, जैसे कि और भी कई मामलों में, जिन पर विपक्ष में रहते हुए उसका रवैया विरोध का था। सरकार ने आधार (वित्तीय एवं अन्य सबसिडी, लाभों व सेवाओं का लक्षित हस्तांतरण) विधेयक, 2016 पेश किया। परिपाटी के मुताबिक विधेयक स्थायी समिति को भेजा जाना चाहिए था, समिति की रिपोर्ट पर बहस होती, संशोधन होते (अगर वे मंजूर किए जाते), और विधेयक संसद के दोनों सदनों से पारित होता। विधेयक अपनी मंजिल पर पहुंचता।

पर सरकार ने दूसरी ही योजना और दूसरे ही तरीके सोच रखे थे। विधेयक को लोकसभा में धन विधेयक के रूप में पेश किया गया, उसे स्थायी समिति को भेजने की मांग ठुकरा दी गई, और विधेयक 11 मार्च 2016 को पारित हो गया। राज्यसभा के साथ हिकारत-भरा बर्ताव किया गया। फिर भी राज्यसभा ने पांच संशोधन किए। यह 16 मार्च कोअपराह्न व सायंकाल के बीच हुआ। शाम को लोकसभा की बैठक निर्धारित समय से देर तक चली और उसने सारे संशोधन खारिज कर दिए और विधेयक को उसके मूल रूप में पास कर दिया, और सरकार ने संसदीय जीत का दावा किया!

इस जीत की क्या ‘कीमत’ चुकाई गई?
1. इस विधेयक को संविधान के अनुच्छेद 110 के मुताबिक धन विधेयक नहीं माना जा सकता, क्योंकि यह संबंधित अनुच्छेद में गिनाए गए प्रावधानों तक सीमित नहीं है। इसलिए इस विधेयक को धन विधेयक के रूप में पेश करने की इजाजत देने का लोकसभा अध्यक्ष का फैसला पूरी तरह गलत था।
2. राज्यसभा को दरकिनार कर दिया गया। ऐसा लगता है कि सरकार तर्कों की मजबूती के बजाय संख्याबल पर ज्यादा भरोसा करती है।
3. सरकार ने विपरीत अदालती फैसले का जोखिम मोल लिया है। इस कानून को बुनियादी अधिकारों के उल्लंघन तथा निजता में दखल देने के आधार पर रद््द किया जा सकता है।
4. सरकार ने सामाजिक कार्यकर्ताओं की नाराजगी मोल ली है, जो दिनोंदिन और क्षुब्ध हो रहे हैं। वे बहस को लोगों तक ले जाएंगे। शंकाओं व चिंताओं का आलम लगातार बना रहेगा, और एक रूपांतरकारी सुधार पर उसकी छाया पड़े बिना नहीं रहेगी।
मकसद नेक था, पर तरीका खराब, और इसकी ऊंची कीमत चुकानी पड़ी।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. C
    Chereshwar Mitra Mandal Trombay
    Mar 20, 2016 at 3:57 am
    आधार
    (0)(0)
    Reply
    सबरंग