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दुनिया मेरे आगेः हिंसा की परतें

पिछले कुछ हफ्तों के दौरान तीन अलग-अलग घटनाओं ने मुझे समाज के बीच पलते मानस पर एक बार फिर सोचने पर मजबूर किया।
Author July 27, 2016 02:19 am

ज्योति सिडाना 

पिछले कुछ हफ्तों के दौरान तीन अलग-अलग घटनाओं ने मुझे समाज के बीच पलते मानस पर एक बार फिर सोचने पर मजबूर किया। पहली घटना उत्तर प्रदेश के नोएडा की है, जिसमें ‘लिव-इन’ में रह रही प्रेमिका ने जब शादी की जिद ठानी तो गुस्साए प्रेमी ने उस पर चाकू से बत्तीस वार किए और उसे लहूलुहान कर दिया। दूसरी घटना में दिल्ली के आदर्श नगर थाने से कुछ दूरी पर पार्किंग से कार निकालते समय एक बाइक से हलकी टक्कर होने पर बाइक सवार दो लोग कार में बैठे युवक को दौड़ा-दौड़ा कर पीट रहे थे, वहां खड़े तमाशबीन उसे बचाने की हिम्मत नहीं कर पा रहे थे। इसके अलावा, जयपुर के रामगंज इलाके में हिट एंड रन मामले में एक तेज रफ्तार से जाती और तेज संगीत बजाती बेकाबू कार ने पांच साल के मासूम को कुचल दिया और कई अन्य को घायल कर दिया। जाहिर है, ये रोजाना की खबरों में शामिल आम खबरों की तरह हैं, लेकिन विश्लेषण के मौके देती हैं।

दरअसल, अब लोगों के व्यक्तित्व में भीड़तंत्र की विशेषताएं शामिल हो रही हैं। इस भीड़ को दो भागों में बांट कर देखा जा सकता है- एक, भीड़ जो भयभीत है, आक्रोशित है, असुरक्षा का भाव लिए हुए है, इसलिए हिंसक है। दो, भीड़ जो शक्तिशाली है, उसे पता है कि कानून को हाथ में लेने के बावजूद उसका कुछ नहीं होगा, क्योंकि उसे प्रभुत्वशाली लोगों का संरक्षण प्राप्त है, इस कारण वह हिंसक है। सवाल है कि एक लोकतांत्रिक समाज में यह भीड़तंत्र इतना प्रभावी क्यों है? शायद जो शक्तिशाली है, वह अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए भीड़ को निर्मित करता है और दूसरी ओर बेकार अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अवसरों की नाकाम तलाश करता हुआ व्यक्ति अपनी कुंठाएं निकालने के लिए भीड़ को जन्म देता है या भीड़ का हिस्सा बन जाता है।

एक सैद्धांतिक अवधारणा के मुताबिक भीड़ में व्यक्ति अपनी वैयक्तिकता को खो देता है और भीड़ का हिस्सा बन जाता है। इससे उसमें अपनी एक अलग भीड़-चेतना विकसित हो जाती है, जो उसकी व्यक्तिगत चेतना को उखाड़ फेंकती है। भीड़ के सदस्य भीड़-चेतना में सहभागिता करते हैं और भीड़ की प्रेरणा अनुसार ही काम करते हैं। इसमें शामिल सभी का भावनात्मक स्तर लगभग समान होता है। यह भीड़ भावनात्मक अधिक और तार्किक कम होती है, सरलता से उत्तेजित हो जाती है। लेकिन अब भीड़ व्यवहार का मनोविज्ञान बदल गया है। अब एक अकेला व्यक्ति या दो-तीन लोग भी भीड़-व्यवहार को अभिव्यक्त करने लगते हैं। ये लोग छोटी-सी बात को भी बड़ी घटना में तब्दील कर देते हैं, आक्रामक व्यवहार करते हैं, फिर चाहे किसी की जान भी चली जाए। शायद ये लोग भयभीत, असुरक्षित, आक्रोशित हैं और जिंदगी की दौड़ में विफल हैं, इसलिए हिंसक हैं।

‘बाहरी’ या दूसरे प्रांतों से रोजगार या शिक्षा की तलाश में आए लोग छोटी-छोटी बातों पर स्थानीय लोगों की हिंसा और आक्रोश का शिकार बनते हैं। इस तथ्य की उपेक्षा कर दी जाती है कि इन ‘बाहरी’ लोगों की उस प्रांत या नगर की अर्थव्यवस्था को आकार देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका है। संस्कृति के इस तरह संकुचित होते जाने की हालत ने ‘हम’ बनाम ‘वे’ के विभाजन को सूक्ष्म, लेकिन बड़े पैमाने पर बढ़ाया है। इन अस्थिरताओं ने लोगों की चेतना में यह स्थापित किया है कि उन्हें किसी भी हालत में विफलता नहीं चाहिए। हम शायद भूल गए हैं कि प्रतियोगितामूलक अर्थवाद में सफलता और विफलता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। लोगों का असफल होना प्रतियोगिता को उद्देश्यों की दृष्टि से सफल सामाजिक प्रक्रिया बनाता है। लेकिन विभाजन की दृष्टि से प्रतियोगिता बहिष्करण को वैधता प्रदान करती है और योग्यता ‘उपलब्धियां’ और अयोग्यता ‘हार’ को अभिव्यक्त करती है। इस तरह की प्रतियोगिता में परोक्ष हिंसा छिपी है।

उदाहरण के लिए, विवाह के अवसर पर शक्तिशाली लोगों के द्वारा हवा में बंदूक से गोलियां चला कर खुशी का इजहार करना हिंसा ही है। दूसरी तरफ, आत्महत्या या हत्या सार्वजनिक उदासी या कुंठा के रूप में अभिव्यक्त हिंसा ही है। वैश्वीकरण ने अपने सकारात्मक और नकारात्मक परिणामों में इस हिंसा को अभिव्यक्ति दी है। ऐसा नहीं है कि पूर्व में ऐसा नहीं होता था। धार्मिक उत्सवों पर पशुओं का वध या बलि शक्ति की अभिव्यक्ति है। स्पेन में ‘बुल फाइट’ शक्ति का ही एक प्रदर्शन है जिसमें व्यक्ति सब कुछ, यहां तक कई बार अपनी जिंदगी भी भूल जाता है। यह हिंसा अब इतनी अधिक सार्वजनिक हो गई है कि शांतिपूर्ण जीवन की चर्चा महज आदर्श है। एक तर्क और दिया जा सकता है कि जब राज्य और खासतौर पर लोकतांत्रिक राज्य अपने नागरिकों के प्रति हिंसक होते चले जाएं तो फिर नागरिकों से कैसे अपेक्षा की जा सकती है कि वे हिंसा से दूर रहें! क्या यह हिंसा अपने आप में एक मूल्य, विश्वास, व्यवस्था और उद्देश्य प्राप्ति का माध्यम बन गई है?

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