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एक सवारी बेचारी

साइकिल रिक्शे को लेकर इन दिनों दुनिया भर में बहस छिड़ी है। भारत में एक ताकतवर समूह इसे शहरी सौंदर्य पर धब्बा मानता है और इसे सड़कों से बेदखल करना चाहता है। जबकि अमेरिका और यूरोप में रिक्शे का चलन पर्यावरण-मित्र के तौर पर बढ़ रहा है। क्या है इस रिक्शे की उपयोगिता और कैसा है इसका भविष्य ? बता रहे हैं राजेंद्र रवि।
Author February 14, 2016 02:30 am

साइकिल रिक्शे को लेकर इन दिनों दुनिया भर में बहस छिड़ी है। भारत में एक ताकतवर समूह इसे शहरी सौंदर्य पर धब्बा मानता है और इसे सड़कों से बेदखल करना चाहता है। जबकि अमेरिका और यूरोप में रिक्शे का चलन पर्यावरण-मित्र के तौर पर बढ़ रहा है।  क्या है इस रिक्शे की उपयोगिता और कैसा है इसका भविष्य ? बता रहे हैं राजेंद्र रवि। 

बीसवीं शताब्दी का अंतिम दशक विश्व में शहरी परिवहन के लिए काफी महत्त्वपूर्ण है। । इसी दशक में 1998 में दिल्ली मेट्रो रेल का शिलान्यास हुआ और 1995 में एरिका स्टिनहावर ने आॅक्सफोर्ड शहर में ‘आॅक्सफोर्ड रिक्शा कंपनी ‘ की स्थापना की। उस समय मेट्रो रेल के प्रमुख ई.श्रीधरन ने एक साक्षात्कार में कहा था, ‘मेट्रो रेल से दिल्ली में वैश्विक स्तर के परिवहन की सुविधा, सड़क-जाम से छुटकारा, वायु-प्रदूषण से राहत, कारों की संख्या पर लगाम और रोजगार की सुविधा आदि मिलेगी। लेकिन मेट्रो शहरी परिवहन का एक हिस्सा है, सिर्फ इससे सभी समस्याओं का हल नहीं हो सकता।’ एरिका स्टिनहावर ने रिक्शा कंपनी बनाने के बाद कहा, ‘रिक्शा परिवहन का एक बेहतर माध्यम है, खासकर आॅक्सफोर्ड जैसे घनी आबादी वाले शहर के लिए रिक्शा वायु और ध्वनि प्रदूषण से रहित है और पर्यावरण संरक्षक भी है।

उसकी सामान्य गति की वजह से यातायात भी जाम नहीं होता और आराम से अगल-बगल के दृश्य देखे जा सकते हैं।’ ऐसे, इन दोनों में कोई तुलना नहीं है, लेकिन समझने की बात है कि जब दुनिया के विकसित देशों में मेट्रो रेल में ठहराव आ गया है, तब भारत मेट्रो के पीछे भाग रहा है और जब दुनिया में साइकिल रिक्शे का चलन बढ़ता जा रहा है तब हमारी सरकार इसे ‘पिछड़ेपन का प्रतीक’ कहकर बंद करना चाह रही है।
आज दिल्ली ही नहीं, भारत के अधिकतर शहर परिवहन की कमी, वायु-प्रदूषण, सड़क-जाम, सड़क-दुर्घटना और बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहे हैं। जिससे मुक्ति पाने के लिए हमें एक एकीकृत शहरी परिवहन नीति की जरूरत है, जो हमारे स्थानीय संसाधनों पर आधारित हो, सस्ता और टिकाऊ हो और जो सड़कों पर सबको समान अवसर और हक दे। वह हमारी संवैधानिक प्रतिबद्धताओं और सामाजिक, आर्थिक, लैंगिक और भौगोलिक विविधताओं के अनुकूल भी हो। गांधी ने कहा था कि ‘कुछ करने से पहले सबसे कमजोर और गरीब आदमी की शक्ल याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो कदम तुम उठाने जा रहे हो क्या यह उस आदमी के लिए उपयोगी है, उसकी जिंदगी में सुख और सुकून देगा ? इससे तुम्हारा संदेह मिट जाएगा।’

क्या इस मानदंड पर हमारी सड़कें खरी हैं? शहरी सड़कों पर रिक्शा सबसे कमजोर लेकिन महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक परिवहन का साधन है। क्या हमारी सड़कों पर रिक्शे को समान अवसर और हक है? साइकिल-रिक्शा हमारे शहरी जीवन का अभिन्न अंग रहा है। वह सिर्फ अतीत की बात नहीं है, उसे हम आज भी देख रहे हैं। साइकिल रिक्शा और उससे जुड़े लाखों लोगों के अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता। आज साइकिल रिक्शा करोड़ों लोगों के जीविकोपार्जन का न सिर्फ साधन है बल्कि यह करोड़ों-करोड़ शहरियों को सुगम-सरल परिवहन भी उपलब्ध करवाता है। यह शहरों में मोटर-वाहनों से होने वाले वायु, ध्वनि और जल प्रदूषण से बचाता है।

साथ में, यह विभिन्न प्रकार के र्इंधन की खपत को रोकता है जिसके जलने से हमारा जलवायु में लगातार बदलाव आ रहा है। यह परिवहन के आधुनिकतम साधन मेट्रो रेल को चलाने में मदद करता है। मेट्रो रेल कुछ चुने हुए रास्ते पर चलती है और चलेगी। शहर में सार्वजनिक परिवहन मेट्रो इसके उपयोगकर्ता के आवास और काम के स्थान से दूर हैं। साइकिल रिक्शे के अभाव से मेट्रो की उपयोगिता सीमित रहती है। साइकिल रिक्शा परिवहन के ‘आरंभ और अंतिम’ बिंदु की सुविधा की कमी को पूरा करता है। यह काम वह सिर्फ मेट्रो के लिए नहीं, बल्कि शहर के किसी भी सार्वजनिक परिवहन के लिए करता है- चाहे वह सड़क मार्गीय हो या रेल। इस योगदान के बावजूद मेट्रो स्टेशनों और बस स्टॉपों पर उन्हें खड़ा रहने की इजाजत नहीं है और न ही सुविधा। इसलिए ट्रैफिक पुलिस उन्हें इन स्थानों से खदेड़ती रहती है।

आज दिल्ली और देश में बन रहे मेट्रो और बस की ढांचागत संरचना में साइकिल रिक्शा के लिए जगह नहीं है और यातायात नियमन उसके खिलाफ। शहर में स्थित सार्वजनिक निगमों और शहरी परिवहन योजनाकारों को यह अहसास है कि साइकिल रिक्शा पर संवैधानिक तौर पर रोक लगाना मुश्किल है, लेकिन इसे ढांचागत संरचना के माध्यम से दरकिनार किया जा सकता है। इससे वह खुद-ब-खुद सड़क और शहर से बाहर होता चला जाएगा और कानून के राज के अनुसार उसका परिचालन भी गैर-कानूनी होगा। यही वजह है कि शहरों में कानून के रखवाले इन्हें इसी आधार पर तंग और प्रताड़ित करते रहते हैं और प्रतिबंधित भी। सवाल है कि क्या शहरी परिदृश्य हमेशा से साइकिल रिक्शे के खिलाफ रहा है? या एक साजिश के तहत उसे सड़कों से बेदखल किया जा रहा है?

रिक्शे की गाथा जापान से शुरू होती है। यह 1870 में जापान की सड़कों पर हाथ रिक्शे के रूप में उतरा। यह आधुनिक युग की एक एशियाई देन था। यह आगे चल कर आधुनिकता का हमसफर भी बना। इसकी उपस्थिति इतनी प्रभावशाली थी कि देखते-देखते इसका फैलाव और प्रचलन भारत, चीन, बांग्लादेश, इंडोनेशिया और वियतनाम जैसे मुल्कों में भी हो गया। शुरुआत में यह व्यक्तिगत वाहन था। आगे चल कर इसने सार्वजनिक परिवहन का रूप लिया और दो साल के अंदर जापान में लाखों की संख्या में रिक्शे चलने लगे। भारत में अंग्रेज हुक्मरान ग्रीष्मकालीन राजधानी शिमला में इसका इस्तेमाल व्यक्तिगत वाहन के रूप में करते थे। बाद में इसका प्रचलन भारत के अधिकतर शहरों में होता गया। यही हाथ रिक्शा आगे चल कर साइकिल रिक्शे के रूप में परिवर्तित हो गया। एक समय में एशियाई सड़कों पर इसका साम्राज्य था और प्रतिष्ठा भी। दूसरे विश्व युद्ध के बाद वैश्विक परिदृश्य में बड़ा परिवर्तन आया और दुनिया में रिक्शे के यूरोप और अमेरिकी संस्करण का अध्याय शुरू हुआ।

एशियाई शहरों से यूरोपीय और अमेरीकी शहर-समाज बिल्कुल अलहदा था। यूरोपीय और अमेरिकी समाज ने रिक्शे से इतर रेल, ट्राम और दूसरी सुविधाएं विकसित कर ली थीं और रिक्शा उसके औपनिवेशिक विस्तार और शोषण में कोई मददगार भी नहीं हो सकता था। इसलिए आधुनिकीकरण के पश्चिमी नजरिए ने एशियाई विकास के रास्ते को न सिर्फ रोका, बल्कि वह हावी हो गया। यहीं से साइकिल रिक्शे के खिलाफ नजरें टेढ़ी होती गर्इं और बौद्धिक स्तर पर उसके खिलाफ तरह-तरह के विमर्श और अफवाह फैलाए जाने लगे। साइकिल रिक्शे के खिलाफ संगठित आवाज में वे परिवर्तनकारी समूह भी शामिल थे जो दुनिया में समाजवाद और सर्वहाराराज कायम करने के लिए सक्रिय और संघर्षरत थे। यही वजह है कि बेजिंग और शंघाई की सड़कों से इसे हटा दिया गया।

फिर भी इसके निशां मिटाएं नहीं मिटे और दुनिया के अलग-अलग मुल्कों में इसके बदले हुए संस्करण आते रहे। अब तो दुनिया के उन भू-भागों पर इसने दस्तक दे दी है, जहां पहले कभी इसका नामोनिशान नहीं था। बीसवीं सदी के अंतिम दशक में जब साइकिल रिक्शे आॅक्सफोर्ड की सड़कों पर अवतरित हुए तो उसने प्रशासन को चौंकाया और वहां की नगरपरिषद् ने कुछ ही दिनों में उसके चलने पर पाबंदी लगा दी। लेकिन वायु-प्रदूषण और सड़क-जाम से शहर की सेहत इतनी बुरी हो गई थी कि उसने नगरवासियों को साइकिल रिक्शे के पक्ष में खड़ा कर दिया और नगरपरिषद ने अपने यातायात के कायदे-कानून में परिवर्तन करके इसे चलने की अनुमति दे दी। आज साइकिल रिक्शे के नए रूप ने यूरोप और अमेरिका की सड़कों पर अपने पैर पसार दिए हैं।

अब यह लंदन, एम्स्टर्डम, बर्लिन, फ्रैंकफर्ट, हमबर्ग, न्यूयॉर्क, शिकागो, वैंकोवर, संदिएगो, आॅस्टिन, विएना, बुडापेस्ट, हेल्सिंकी, कोपनहेगन, टोंसबर्ग, सिडनी, मेलबोर्न, ब्रिसबेन, एडिलेड, पर्थ, आॅकलैंड, वेलिंगटन, क्रिसचर्च, मॉस्को, मेक्सिको सिटी और प्राग जैसे विकसित शहरों में भी चल रहा है और इसकी संख्या लगातार बढ़ रही है। इन शहरों के सामने यह चुनौती आ गई है कि इनसे कैसे निपटा जाए ? इन शहरों के परिवहन और यातायात नियम इसे चलने की इजाजत नहीं देते, लेकिन दूसरी ओर इसकी लोकप्रियता और मांग बढ़ती जा रही है।
अलग-अलग शहरों में इसे अलग-अलग नामों से- पेडीकैब, वेलो टैक्सी, गो-ग्रीन, साइकिल टैक्सी, इको-चारिओट्स, कैपिटल इन मोशन आदि नामों से- पुकारा जाता है । इन्हें चलाने वाले लोगों ने सरकार की तरफ से आ रहे दबाव से निपटने, साझे तौर पर बातचीत करने और समय-समय पर अपने पक्ष में जन-दबाव बनाने के लिए एसोसिएशनों का गठन किया है।

दूसरी ओर, परंपरागत रिक्शे में सुधार और विकास का काम भी तेजी से चल रहा है। अमेरिका में ‘मेन स्ट्रीट सिटी कैब’ नामक एक कंपनी ने मॉडर्न साइकिल रिक्शे के सैकड़ों मॉडल विकसित किए हैं। इसने रिक्शे की गति में वृद्धि, ब्रेक सिस्टम, चालक और उपयोगकर्ता के अनुकूल डिजायन में मौलिक सुधार किए हैं और शहर में अलग-अलग कामों के लिए बाजार में कई मॉडल उपलब्ध कराए हैं। इनकी डिजायन शहर की हर जरूरत को पूरा करते हुए दिखते हैं, जहां इसने व्यक्तिगत और सामूहिक वाहन बनाया है, वहीं सामान लाने ले जाने के लिए अलग आकार और रूप के साइकिल रिक्शे भी। स्ट्रीट वेंडर के लिए दर्जनों तरह के साइकिल कैब हैं ।-सब के सब मानव-श्रम से चलने वाले मॉडल हैं। इसने चालकों के लिए रोड मैन्युअल बनाया है और रख-रखाव के लिए दिशा-निर्देश भी। साइकिल रिक्शे का फलक एशियाई परिधि को लांघ कर अब यूरोप और अमेरिका के साथ-साथ अफ्रीकी और लातीनी अमेरिकी देशों तक पहुंच गया है।

भारत में विगत तीन दशक से साइकिल रिक्शे पर बंदिशों की तलवारें लटकी हैं तो इसकी तरफदारी में भी काम हुए हैं। परिवर्तनकारी समूहों के दबाव में 2006 में राष्ट्रीय शहरी परिवहन नीति बनी। उसके इर्द-गिर्द विमर्श शुरू हुए, जिनमें आधे-अधूरे ढंग से साइकिल रिक्शे की तरफदारी की बात की गई है। लेकिन साइकिल रिक्शा से जुड़े समूहों ने इसे एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हुए इसकी बेहतरी और हकदारी की लड़ाई को आगे बढ़ाया और ‘सड़क पर समान अधिकार’ की मांग सरकार

और समाज के बीच रखी। इससे भी जब सरकार नहीं चेती तो मामला हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट तक गया। सरकार साइकिल रिक्शे पर पाबंदी के सवाल पर अड़ी थी। तब कोर्ट ने साइकिल रिक्शे के अधिकार और उसके हक में ऐतिहासिक फैसला सुनाया। इसके बाद सरकार ने साइकिल रिक्शे के खिलाफ कड़े कदम वापस कर लिए। लेकिन मन नहीं बदला। यही वजह है कि सरकार येन-केन-प्रकारेण साइकिल रिक्शे को बंदिशों से घेरने के लिए सक्रिय रहती है और न्यायालय के निर्णय को ठंडे बस्ते में डाल दिया है।

जलवायु संकट ने भी साइकिल रिक्शे के प्रति सोच में बदलाव लाने के लिए मजबूर किया है। अब एक वर्ग जलवायु-संकट की बात नहीं करता, बल्कि जलवायु-न्याय की भी बात करता है। ऐसी हालत में भी भारत का राजनीतिक नेतृत्व, नीति-निर्माता और एक खास किस्म के बौद्धिक वर्ग ने साइकिल रिक्शे के ऐतिहासिक महत्त्व और इसके नए अवतार के मर्म को जानने-समझाने से खुद को किनारा किए हुए है। वे इसके स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सरोकारों को समझने से पल्ला झाड़ रहे हैं और इसे ‘गरीबी और अप्रतिष्ठा का प्रतीक’ मानकर खारिज कर रहे हैं। यह एक ऐतिहासिक भूल है या समाज और समुदाय के प्रति गैरजवाबदेही?

जिस तरह एक जमाने में जापान ने दुनिया को रिक्शे के आविष्कार का तोहफा देकर एशियाई आधुनिकता का रास्ता दिखाया था, उसी प्रकार आज भारत खत्म होते ऊर्जा के स्रोतों और जलवायु के बढ़ते हुए खतरे से निकलने के लिए मानव-श्रम आधारित ऊर्जा के साधनों के साथ खड़ा होकर दुनिया को नई राह दिखा सकता है। एक रास्ता पश्चिमी विकास का है जिसने मनुष्य को मशीन के हवाले कर दिया है। यह पूर्णरूप से र्इंधन-आधारित है जो अब खत्म होने के कगार पर हैं। आज पूरी दुनिया के विकसित देश अब पलटी मारने की फिराक में हैं और अपने-अपने शहरों में इस एजेंडे को लागू भी कर रहे हैं।

इसी का परिणाम है कि जो समाज तेज गति में मदहोश था, वह आज धीमी गति की वकालत कर रहा है और शहर और समाज को कार से मुक्त करने की पहल कर रहा है। भारत के पास आज भी साइकिल रिक्शा जैसे धीमी गति के वाहन बहुतायत संख्या में उपलब्ध हैं और देश के एक बड़े भूभाग में पसंद भी किए जाते हैं। इसके साथ साइकिल को शामिल कर लें तो यह देश के परिवहन का सबसे ज्यादा संख्या वाला वाहन समूह हो जाएगा- जो पर्यावरण-मित्र, मानव-ऊर्जा चालित और न्यूनतम खर्च वाला टिकाऊ परिवहन का साधन है। इसकी हिमायत देश के न्यायालय ने भी किया है और हमारी संवैधानिक प्रणाली ने भी। हमारे पास प्रचुर मात्रा में मानवीय संसाधन है। ऐसी स्थिति में इसे सम्मानित और बराबरी के हक के साथ बढ़ाने की जरूरत है। अपने तकनीकी विकास की धार इन श्रम-शक्तियों की सुविधा की ओर मोड़कर इसे सरल, सुंदर और प्रतिष्ठापूर्ण बनाया जा सकता है।
एक सवारी बेचारी

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