December 02, 2016

ताज़ा खबर

 

इतिहास का सांस्कृतिक पुनरावलोकन

प्रथम विश्व युद्ध में अपना एक हाथ और पैर गवां चुके व्लादिस्लाव स्ट्रेमिंस्की पोलैंड के एक महत्त्वपूर्ण चित्रकार हैं।

Author November 22, 2016 06:58 am
आंद्रे वाजदा की फिल्म आफ्टर इमेज इतिहास का सांस्कृतिक पुनरावलोकन है।

आंद्रे वाजदा की फिल्म आफ्टर इमेज इतिहास का सांस्कृतिक पुनरावलोकन है। इस फिल्म को आॅस्कर अवार्ड के लिए विदेशी भाषा की सर्वश्रेष्ठ फिल्म की श्रेणी मे पोलैंड की ओर से नामांकित किया गया है। फिल्म इस मायने मे क्लासिक है कि दुनिया भर में सांस्कृतिक तानाशाही के खिलाफ मानवीय प्रतिरोध को बेहद कलात्मक तरीके से दर्शाती है। नब्बे साल की उम्र में वे भूल नहीं पाए कि उनके पिता को स्तालिन ने मरवा दिया था। इस बार भी उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद का समय चुना है, जब अचानक कला पर स्तालिनवादी समाजवादी यथार्थ का नियम थोप दिया गया और कलाकारों की आजादी खत्म कर दी गई। आंद्रे पानुफ्निक के संगीत की पृष्ठभूमि मे पोलैंड के लोड्ज शहर को पावेल एडेलमान के कैमरे ने अविस्मरणीय दृश्यों मे रचा है। पावेल एडेलमान को रोमन पोलांस्की की महान फिल्म द पियानिस्ट के लिए आॅस्कर पुरस्कारों में नामांकित किया जा चुका है। पेंटिंग और अमूर्त डिजाइन का इस्तेमाल इस तरह किया गया है कि हास्य का विद्रूप पैदा हो सके।

कला की दुनिया के वास्तविक दृश्य लिए जाने से हमे डाक्यूमेंटरी का आभास होता है जो विश्व सिनेमा में आंद्रे वाजदा का सिगनेचर माना जाता है। प्रथम विश्व युद्ध में अपना एक हाथ और पैर गवां चुके व्लादिस्लाव स्ट्रेमिंस्की पोलैंड के एक महत्त्वपूर्ण चित्रकार हैं। वे नेशनल स्कूल आॅफ मॉडर्न आर्ट्स लोड्ज मे प्रोफेसर हैं। वे कला मे राजनीतिक विचारधारा के दखल के खिलाफ हैं। उनके छात्र उन्हें कला का खुदा मानते हंै। जब पोलैंड की कम्युनिस्ट सरकार का कला की दुनिया में दखल असहनीय हो जाता है तो स्ट्रेमिंस्की विरोध मे खड़े होते हंै। वे किसी कीमत पर सरकारी दखल को मानने को तैयार नहीं हंै। सरकारी गुंडे लोड्ज में उनका स्टूडियो तहस- नहस कर देते है। उन्हें बिना कारण बताए नौकरी से निकाल दिया जाता है। उन पर अमेरिकी कॉस्मोपालिटनिज्म का प्रचारक होने का आरोप लगाया जाता है। वे पेंटिंग न कर सकें, इसलिए उन्हें उस कलाकार संघ से निकाल दिया जाता है जिसके गठन में उनकी महती भूमिका थी। अब बिना परिचय पत्र के कोई दुकानदार उन्हें रंग और पेंटिंग बनाने का सामान नहीं दे सकता। भयानक गरीबी और बीमारी और सरकारी दमन झेलते हुए अंतत: 26 दिसंबर 1952 को वे इस दुनिया को अलविदा कहते हैं।

फिल्म में लगभग मेलोड्रामा नहीं है, लेकिन स्ट्रेमिंस्की की पीड़ा कई जगह गहरे हास्य में बदल जाती है। वाजदा ने कही भी वास्तविक सरकारी हिंसा को नहीं दिखाया है, पर दहशत और आतंक को हम महसूस करते हंै। कई दृश्यों की मार्मिकता हृदय विदारक है, जब पैसे के बिना वेट्रेस कई दिनों से भूखे स्ट्रेमिंस्की के प्लेट से सूप निकाल लेती है तो वे कुत्ते की तरह प्लेट चाटते दिखाई देते हैं।वे अपनी बेटी को स्कूल हॉस्टल मे रखने पर मजबूर हैं क्योंकि उनके साथ उसका बचपन झुलस जाएगा। पत्नी के मरने पर वे अंतिम संस्कार में नहीं जा पाते क्योंकि किसी वजह से उनकी पत्नी नहीं चाहती थी। अचानक वे अस्पताल से उठकर पत्नी की कब्र पर नीले फूल चढ़ाने चले जाते हैं, मानो मृत्यु से पहले का आखिरी काम निपटा रहें है। अंतिम दृश्य मे उनकी बेटी नीका अस्पताल के उस बिस्तर पर थोड़ी देर बैठना चाहती है जिस पर स्ट्रेमिंस्की की मौत हुई है। फिल्म एक स्याह माहौल की सिसकियों का कोलाज बनाती है जिसमे कला और राजनीति के बड़े सवाल मानवीय प्रसंगों में बौने हो जाते हंै। स्ट्रेमिंस्की का मानना है कि आजादी से बड़ा कोई जीवन मूल्य नहीं हो सकता और कला आजादी की विजुअल डिस्कवरी है। इसमे संदेह नहीं कि आफ्टर इमेज गोवा फिल्मोत्सव की सबसे महत्त्वपूर्ण फिल्म मानी जा रही है।

 

कॉफी विद करण सीज़न 5: वरुण धवन और अर्जुन कपूर ने खोली एक-दूसरे की पोल

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

First Published on November 22, 2016 5:28 am

सबसे ज्‍यादा पढ़ी गईंं खबरें

सबरंग