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राजपााठः आह गौर की

बड़ा मजेदार होता है मध्यप्रदेश विधानसभा के सत्र का नजारा। विपक्ष के साथ-साथ सत्ता पक्ष के असंतुष्ट विधायकों को भी मिल जाता है अपनी भड़ास निकालने का मौका। सरकार की पोल खोलने से भी नहीं हिचकते। ताजा सत्र में भी भाजपा विधायक कैलाश चावला ने इस मौके का फायदा उठाया। बकाया वसूली के चक्कर में […]
Author July 25, 2016 03:15 am

बड़ा मजेदार होता है मध्यप्रदेश विधानसभा के सत्र का नजारा। विपक्ष के साथ-साथ सत्ता पक्ष के असंतुष्ट विधायकों को भी मिल जाता है अपनी भड़ास निकालने का मौका। सरकार की पोल खोलने से भी नहीं हिचकते। ताजा सत्र में भी भाजपा विधायक कैलाश चावला ने इस मौके का फायदा उठाया। बकाया वसूली के चक्कर में ट्रांसफार्मर से जुड़े उपभोक्ताओं की बिजली काट देने का मामला छह महीने पहले उठाया था। मुख्यमंत्री चौबीस घंटे बिजली देने का दावा करते हैं। पर चावला को अब तक उनके सवाल का संतोषजनक जवाब नहीं मिला। सदन के भीतर भाजपा की ही ममता मीणा ने दो साल से अधूरी पड़ी सड़क का काम पूरा नहीं होने की तोहमत अफसरों पर लगाई थी। महिदपुर के विधायक बहादुर सिंह चौहान को मलाल है कि वे सवालों के जरिए करोड़ों के घोटालों को सरकार के संज्ञान में लाते हैं। पर अफसर फाइलें दबा लेते हैं। पेटलावद पंचायत का उदाहरण भी दे दिया उन्होंने। भाजपा के हितेंद्र सोलंकी ने सदन में डंके की चोट पर खंडवा में नकली बीज और खाद धड़ल्ले से बिकने और दोषियों पर कार्रवाई न होने का खुलासा किया। 75 पार के फार्मूले से कुर्सी गंवाने वाले बाबूलाल गौर भी अब मुखर हो गए हैं। शुक्रवार को भोपाल और इंदौर में मेट्रो ट्रेन के मुद्दे पर सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया। बोले- सात साल में मेट्रो नहीं चला पाई सरकार। यह उसकी क्षमता पर तो सवाल है ही उदासीनता और लालफीताशाही की बानगी भी है। इतना सुनते ही मंत्री माया सिंह अब तक की प्रगति का हिसाब बताने लगीं तो गौर ने कटाक्ष किया- इस जवाब पर दया आती है। माया सिंह बोलीं 2021-22 तक पूरा हो जाएगा पहला चरण। गौर फिर भी चुप नहीं हुए। कहा कि तब तक तो न हम रहेंगे और न आप। यह कह कर भी ताना मारा कि जयपुर में मेट्रो योजना हमारे बाद आई और दौड़ने भी लगी है। लखनऊ ने भी पछाड़ दिया है हमें। भोपाल मेट्रो कंपनी के चीफ इंजीनियर को रेलवे का कोई अनुभव नहीं होने का खुलासा भी कर दिया। तीखे-तेवर दिखाते हुए बोले कि वे वेयरहाउसिंग कारपोरेशन के अफसर रहे हैं। रेल क्या चलाएंगे? विधानसभा अध्यक्ष ने गौर को धीरज रखने और मंत्री का पूरा जवाब सुनने की सलाह दी तो नाराज हो गए कि क्या उत्तर सुन लें। जवाब से संतुष्ट नहीं हूं। अब तो माया सिंह का भी धीरज चुक गया। उम्र का लिहाज छोड़ सफाई देने लगीं कि उन्हें तो इस मंत्रालय में आए कुछ दिन ही हुए हैं। गौर साहब पहले तो आप खुद ही थे इस विभाग के मंत्री। गौर फिर भी खामोश नहीं हुए। वाद-विवाद जारी रखा और ताना मारा कि उन्हें नगरीय प्रशासन से हटा कर गृह और जेल विभाग दे दिया था। फिर माया सिंह से सवाल पूछा- बताओ मेट्रो कैसे बनेगी? खंभों पर या भूमिगत? आरामदेह या साधारण? अध्ययन किया हो तो बताओ, नहीं तो मुझे अपनी सीट पर बैठने की अनुमति दो तो मैं बता दूंगा। वाद-विवाद को मोड़ देने की मंशा से दूसरे मंत्री गोपाल भार्गव ने गौर को टोका- गौर साहब आपको मेट्रो से क्या करना? आप तो यूपी के गवर्नर बनने वाले हो। गौर ने तपाक से कहा- बनवा दोगे तो चले जाएंगे। नेता प्रतिपक्ष बाला बच्चन ने भी सरकार की खिल्ली उड़ाई। कहा कि एक ही दिन के सत्तावन सवालों का सरकार ने एक जैसा जवाब दिया है कि कलक्टरों से जानकारी नहीं मिल पाई है। फिर सवाल दाग दिया बाला ने- क्या विधानसभा से ऊपर हैं कलक्टर। यह तो सदन का अपमान है। इतना सुनते ही विपक्ष ने हंगामा कर दिया।
प्रश्न-प्रतिप्रश्न
नीकु तो नीकु ठहरे। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कोई न कोई नया मुद्दा उछाल देते हैं। मकसद अपने अनुकूल सियासी चर्चा कराना होता है। प्रधानमंत्री के साथ दिल्ली में मुख्यमंत्रियों की बैठक में हिस्सा लिया। हर मुख्यमंत्री ने इस मौके पर अपने सूबे की समस्याएं उठाई। विरोधियों ने इस बहाने केंद्र पर हमला भी किया। ऐसे में नीकु ने सही मौका देख नई मांग पेश कर सबको हैरान कर दिया। राज्यपाल के पद को समाप्त करने का सुझाव दे दिया। पर वैसी प्रतिक्रिया नहीं दिखी जैसी उन्होंने सोची होगी। बावेला नहीं मचा। अलबत्ता मुद्दा राज्यपाल की भूमिका की तरफ घूम गया। साथ ही नीकु प्रति प्रश्न की चपेट में आ गए। विधान परिषद खत्म करना तो उनके हाथ मे है, वे बिहार में पहले विधान परिषद को खत्म करें। नीकु इन दिनों देश के तमाम समाजवादियों को एकजुट करने की मुहिम में जुटे हैं। पटना और दिल्ली में इसके लिए बैठकें भी कर चुके हैं। समाजवादी कब से चिल्लाते रहे हैं कि राज्यसभा और विधान परिषद लोकतंत्र में सत्ता पर काबिज होने के चोर दरवाजे हैं। इनके सदस्य जनता के बीच से तो चुन कर आते हैं। विधान परिषद को हालांकि ज्यादातर राज्यों ने पहले ही खत्म कर दिया। ले-देकर पांच राज्य ही हैं विधान परिषद वाले। बिहार भी इन्हीं में एक है। 2005 में मुख्यमंत्री बने थे नीकु। तब से वे खुद विधान परिषद के ही सदस्य हैं। इसका यह मतलब कतई नहीं निकाला जा सकता कि वे विधानसभा चुनाव नहीं जीत सकते। उनकी अपनी साख इतनी तो है ही कि वे सूबे की जिस विधानसभा सीट से चाहें, जीत निश्चित है। उनके मुख्यमंत्री रहते विधानसभा चुनाव दो बार हुए। दोनों ही बार उन्होंने विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा। हालांकि मुख्यमंत्री के उम्मीदवार वे दोनों बार पहले से घोषित थे। दोनों बार कामयाबी भी मिली। विधान परिषद खत्म होने से बिहार का कोई अहित तो होने से रहा। न नीकु के सियासी भविष्य पर ही किसी तरह की आंच आएगी। विधानसभा चुनाव लड़ कर वे सत्ता संभालेंगे तो कद और ऊंचा होगा। नीकु को मलाल है कि नरेंद्र मोदी ने उनके सूबे में उनसे सलाह लिए बिना ही राज्यपाल की नियुक्ति कर दी। शायद इसी गुस्से के चलते वे राज्यपाल के पद को खत्म करने का मुद्दा उभार रहे हैं।
ग्रहण का बिस्कुट
लालू यादव को हाजिर जवाबी और सटीक टिप्पणी के मामले में कौन पछाड़ सकता है। उनका तो अंदाज ही निराला है। मजाक-मजाक में अपनों पर भी तीर दाग देते हैं। पिछले दिनों तो अपने सियासी अनुज पर भी निशाना साध बैठे। फरमाया कि छोटे भाई यानी नीतीश कुमार ने सूर्य ग्रहण के वक्त बिस्कुट खाया था। इससे उन पर एक साथ कई आफत आई थी। अब तो वे खुद नीतीश के साथ हैं। कितना ठीक-ठाक चल रहा है सब। लालू को कौन समझाए कि जिस वक्त नीतीश ने सूर्य ग्रहण में बिस्कुट खाए थे तब वे लालू के घोर विरोधी थे। विरोध में बोले बिना कोई दिन जाता ही नहीं था। लालू भी कसर नहीं छोड़ते थे। उन दिनों तो लालू ने उनके विरोध में न जाने क्या-क्या कहा था? आजकल साथ हैं तो बात वाकई दूसरी है। हां, बड़ा भाई बन कर बड़प्पन जरूर निभाया है लालू ने। बेशक लालू की तरह किसी तरह का अंधविश्वास नहीं पालते नीकु।
गुरु घंटाल की गुगली
स्वामी प्रसाद मौर्य के बसपा छोड़ने पर दीपावली मना रही थी यूपी में भाजपा। पर पंजाब में पार्टी से इस्तीफा दे नवजोत सिद्धू ने सारी खुशियों पर पल भर में पानी फेर दिया। राज्यसभा में पिछले महीने ही तो नामित किया था मोदी सरकार ने अपने इस असंतुष्ट कद्दावर नेता को। लेकिन क्रिकेटर सिद्धू ने अपनी गुगली से पार्टी को क्लीन बोल्ड तो किया ही, असहज भी कर दिया उसे। सधी हुई सटीक टिप्पणी करके। फरमाया कि मैं सत्य और असत्य की जंग में तटस्थ नहीं रह सकता। राज्यसभा की सदस्यता को एक झटके में ठुकरा दिया। तो भी पंजाब के भाजपा सूबेदार विजय सांपला अभी यही तुर्रा दे रहे हैं कि सिद्धू ने भाजपा से इस्तीफा नहीं दिया है। भले अभी अपनी भावी रणनीति का खुलासा नहीं किया हो, पर संकेत केजरीवाल के साथ जाने के ही मिल रहे हैं। हालांकि न्योता कांग्रेस के सूबेदार कैप्टन अमरिंदर ने भी दिया है अमृतसर लोकसभा सीट को लगातार तीन बार जीत कर भाजपा की झोली में डालने वाले सिद्धू ने। सियासी हलकों में तमाम तरह की अटकलें लग रही हैं। मसलन, मियां-बीबी में एक राय नहीं है। सिद्धू की डाक्टर पत्नी भी अब सियासी शतरंज के मैदान में मोहरे चल रही हैं। अभी उन्होंने नहीं दिया है भाजपा से इस्तीफा। नवजोत कौर सिद्धू बादल सरकार में संसदीय सचिव ठहरीं। उनकी पहली पसंद आम आदमी पार्टी ही बताई जा रही है। चार महीने पहले दिल्ली आकर अरविंद केजरीवाल से मिली थीं। पर सिद्धू अभी पत्ते खोलने को तैयार नहीं। हां, भाजपाई यह सोच कर हैरान हैं कि सिद्धू को पार्टी छोड़नी थी तो राज्यसभा में मनोनयन की रजामंदी क्यों दी थी। सिद्धू दंपत्ति अकाली दल से खफा हैं। अरसे से अपनी पार्टी को सलाह दे रहे थे कि अकाली दल से गठबंधन तोड़ने में फायदा है। सलाह पर ध्यान नहीं दिया गया तो नाराज हो गए। ऊपर से भाजपा ने अमृतसर की उनकी सीट अरुण जेटली को थमा दी। जो मोदी लहर के बावजूद हार गए।
चौकीदार चोर को
गनीमत है कि सुध समय रहते आ गई। राजस्थान में भाजपा अब चौकस हो रही है। अपने मंत्रियों और विधायकों के जरिए जमीनी हालात की पड़ताल कराई जा रही है। संगठन की हालत और सरकार की छवि दोनों का मूल्यांकन है इस कवायद का मकसद। समूह बनाए गए हैं विधायकों और मंत्रियों के। हर समूह का इलाका तय हो गया है। लोगों की धारणा जानेंगे। आलाकमान ने हड़काया है। उसके पास तो यही जानकारी पहुंच रही है कि पार्टी के कार्यकर्ता ही नहीं आम आदमी भी वसुंधरा सरकार की कार्यशैली से खुश नहीं। आरएसएस तो पहले ही जता चुका है अपनी सरकार के कामकाज पर नाखुशी। संघियों ने तो नाराजगी में मंत्रियों से मिलना-जुलना भी बंद कर दिया है। बेशक अमित शाह की हिदायत यही है कि संघ के बिना गुजारा मुमकिन नहीं। सो, सरकार के कामकाज पर संघ की छाप दिखनी चाहिए। काश अमित शाह समझ पाते कि राजस्थान में ज्यादातर मंत्रियों का संघ से दूर-दूर तक लेना-देना नहीं। रही नौकरशाही की बात तो वह मुख्यमंत्री को छोड़ किसी को भाव दे ही नहीं रही। और तो और जिलों में तैनात अफसर भी अब मंत्रियों और विधायकों की परवाह नहीं कर रहे। शायद खतरे की घंटी सुन ली है आलाकमान ने। कुछ इलाकों के मंत्री समूह अपनी पड़ताल का ब्योरा मुख्यमंत्री को थमा भी चुके हैं। पर ऐसी पड़ताल में खराब तो कुछ भी दिखने से रहा। दिखे भी कैसे? मंत्रियों से पुराने और निष्ठावान भाजपाई तो मिलना तक गवारा नहीं कर रहे। सो आधी अधूरी और एकतरफा जानकारी के आधार पर मंत्रियों ने जनता के खुश होने का राग अलापना शुरू कर दिया है। मंत्री अपनी ही सरकार की कार्यशैली को खराब बता भला मुख्यमंत्री के कोपभाजन बन जाने का जोखिम क्यों उठाएं। फिर लोगों को अगर नाराजगी है तो मुख्यमंत्री से कम मंत्रियों से ही ज्यादा है। संघी खेमा इस कवायद से संतुष्ट नहीं। उसकी अपनी धारणा है कि आईना तो निष्पक्ष कार्यकर्ता ही दिखा सकते हैं सरकार को। मंत्रियों से मूल्यांकन कराने को वफादार भाजपाई उसी तरह मान रहे हैं जैसे चोर को कोई चौकीदार बना दे।
बेबात बतंगड़
बांध तो पन्ना में टूटा था, पर गुरुवार को उसका असर दिखा मध्यप्रदेश विधानसभा में। वित्त मंत्री जयंत मलैया और कांग्रेस के मुकेश नायक में हो गई तीखी नोक-झोंक। भ्रष्टाचार और व्यक्तिगत आरोपों तक पहुंच गई बहस। मलैया कुछ दिन पहले तक जल संसाधन मंत्री भी थे। उन्होंने विधानसभा उपाध्यक्ष राजेंद्र सिंह से पेशकश कर दी कि वे सदन की समिति बना कर उनके कार्यकाल की जांच करा लें। शुरुआत नायक के बांध टूटने के मामले में अफसरों की बर्खास्तगी और मलैया के इस्तीफे की मांग से हुई। फिर तो सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तंज कसने का सिलसिला शुरू हो गया। मलैया के पक्ष में उमाशंकर गुप्ता और नरोत्तम मिश्रा बोलने लगे तो नायक की हिमायत में राम निवास रावत और जीतू पटवारी ने संभाल लिया मोर्चा। नोक-झोंक लक्ष्मण रेखा लांघने लगी तो विधानसभा अध्यक्ष ने सदन की कार्यवाही से ही निकलवा दिया उसे। लेकिन नायक तो मूड में आ गए थे। सदन के बाहर पत्रकारों से बातचीत में भी एक अरब की लागत वाले बांध के टूटने पर मलैया का इस्तीफा मांगते रहे। सीबीआइ से उनकी संपत्ति की जांच कराने का मुद्दा भी उछाल दिया। इससे खिन्न मलैया का धैर्य जवाब दे गया। लगे अपनी डींग हांकने कि मैं तो खानदानी रईस हूं। परिवार में कारोबार है। विरासत में मिले कारोबार को और बढ़ाया है। विधायकों की समिति बना कर अध्यक्ष चाहें तो जांच करा लें। फिर पलटवार भी करने से नहीं चूके। फरमाया कि संपत्ति की जांच तो नायक की होनी चाहिए। पच्चीस साल में अरबपति बन जाने का रहस्य खुल जाएगा।
चस्का उगाही का
लोकतंत्र में बड़ी चुनावी सफलता कई बार मुश्किलें घटाने के बजाए बढ़ा देती है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को आजकल ऐसी ही मुश्किल से दो-चार होना पड़ रहा है। गैरों के बजाए अपने ही बढ़ा रहे हैं दीदी की परेशानी। सूबे के विभिन्न इलाकों से तृणमूल कांग्रेस के नेताओं की अराजकता की खबरें सुन कर आजिज आ चुकी हैं ममता। सार्वजनिक तौर पर तो स्वीकार करने से रहीं। कहीं जबरन उगाही हो रही है तो कहीं सिंडीकेट राज का प्रभाव बढ़ रहा है। यानी अपने ही दे रहे हैं गैरों को वार करने के मौके। कोलकाता से सटा न्यू टाउन राजार हाट का इलाका तो पार्टी नेताओं के सिंडीकेट राज से कुछ ज्यादा ही त्रस्त है। आतंक के आगे मुंह खोलने की हिम्मत भी नहीं किसी की। हालांकि ममता कई बार आगाह कर चुकी हैं कि एक ही काम चलेगा। चाहे राजनीति करें या फिर सिंडीकेट चलाएं। दरअसल सिंडीकेट के जरिए इलाके में बन रही इमारतों के मालिकों को तय दर पर चहेते व्यापारियों से ही निर्माण सामग्री की खरीद के लिए मजबूर किया जा रहा है। जो विरोध करता है उसे सबक सिखाया जाता है। कुछ तो जानलेवा हमलों के भी शिकार हो चुके हैं। पुराने मकान की मरम्मत तक नहीं कर सकता कोई इलाके के तृणमूल नेता को चौथ दिए बिना। विधाननगर के निगम पार्षद अनिंद्य चटर्जी और उनके कई गुर्गे तो जबरन वसूली के चक्कर में सलाखों के पीछे जा चुके हैं। हालांकि ज्यादातर शिकायतों को अनदेखा करना पुलिस की मजबूरी ठहरी। मुख्यमंत्री ने ही हस्तक्षेप कर दिया तो पुलिस को डंडा उठाना पड़ा। तभी गिरफ्तार हो पाए अनिंद्य। जनाब का दुस्साहस देखिए कि बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के एक रिश्तेदार को धमकाने से भी नहीं हिचके। हसीना ने ममता को फोन किया तब जाकर हुई धरपकड़। बेचारी दीदी भी भोली हैं। समझ क्यों नहीं रहीं कि एक बार जिसे खून मुंह लग जाता है उसका चस्का छूटता नहीं है आसानी से।
हताशा में भाजपा
उत्तराखंड में संभल नहीं पा रही है भाजपा। हरीश रावत सरकार को अपदस्थ कराया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के दखल से बाजी पलट गई। विधानसभा के सत्र में भाजपा ने रावत की नाक में दम करने की योजना बनाई थी। पर रावत ने तो उलटे भाजपा को ही पटखनी दे दी। विधानसभा से न केवल सूबे का बजट पास करा लिया, बल्कि विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल और उपाध्यक्ष अनसूईया प्रसाद के खिलाफ 18 मार्च के भाजपा के अविश्वास प्रस्ताव को भी एक झटके में गिरवा दिया। तिलमिलाए भाजपाइयों को कुछ नहीं सूझा तो विधानसभा का बहिष्कार कर राजभवन जा पहुंचे सरकार के खिलाफ शिकायत करने। राज्यपाल केके पॉल अब और फजीहत क्यों कराते? उन्होंने तो बजट को मंजूरी देने में कतई देर नहीं लगाई। हां, हरीश रावत ने सूबे के भाजपाइयों को हैरत में जरूर डाल दिया। बजट पास होते ही लगे अरुण जेटली और नितिन गडकरी का गुणगान करने।
घर के न घाट के
संकट में है अब हिलोपा। हिलोपा यानी महेश्वर सिंह की हिमाचल लोकहित पार्टी। मजबूरी में बेचारे महेश्वर पार्टी का भाजपा में विलय करने के चक्कर में हैं। पिछले चुनाव में प्रेम कुमार धूमल से अनबन के चलते भाजपा छोड़ी थी। पर विधानसभा में खुद ही पहुंच पाए। बाकी सारे उम्मीदवार धराशायी हो गए। अब वे तो पुरानी पार्टी में जाने के चक्कर में हैं, पर उनकी जर्जर हो चुकी पार्टी के कुछ नेता इसके लिए तैयार नहीं। यह तो थूक कर चाटने वाली बात लगती है ऐसे नेताओं को। ऐसे नेता अरविंद केजरीवाल की पार्टी को बेहतर विकल्प मान रहे हैं। यानी भाजपा के आगे घुटने टेकना गवारा नहीं। मोल भाव और मान सम्मान का ख्याल जरूरी है। शांता कुमार, प्रेम कुमार धूमल और जेपी नड्डा सभी की चिरौरी के बाद तो सहमति बनी थी हिलोपा के भाजपा में विलय की। पर आखिरी वक्त पर अपनों ने ही मार दी टंगड़ी।
खतरे की घंटी
हिमाचल के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह अब प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआइ के चक्रव्यूह से बाहर निकलने की जुगत भिड़ा रहे हैं। प्रवर्तन निदेशालय के खिलाफ तो वीरभद्र और उनकी पत्नी पहले ही दिल्ली हाईकोर्ट में दस्तक दे चुके हैं। 29 जुलाई को होगी सुनवाई। राहत नहीं मिली तो लेने के देने पड़ सकते हैं। अपनी गिरफ्तारी पर रोक की फरियाद लगाई है। प्रवर्तन निदेशालय गिरफ्तार करेगा तो सरकार पर संकट बढ़ेगा। शायद खतरे को भांप कर ही सियासी माहौल बना रहे हैं। कम अंतराल से मंत्रिमंडल की बैठक बुलाई हैं। मंत्रिमंडल संकट में उनके साथ है, यही दिखाने की मंशा होगी। चुनाव में अभी सवा साल का वक्त बचा है। तो भी वीरभद्र पर मंडरा रहे खतरे से कांग्रेस तो बैकफुट पर आ ही गई है।

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