May 29, 2017

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राजपाठः टीस नीकु की

नीकु को राजद का साथ अखरता जरूर होगा। लोक दिखावे के लिए बेशक जुबान पर नहीं ला सकते पर काम तो दबाव में करना ही पड़ रहा होगा। मुख्यमंत्री हैं तो क्या उनकी पार्टी के विधायकों की तादाद तो राजद के विधायकों से कम ठहरी।

Author October 17, 2016 02:18 am

नीकु को राजद का साथ अखरता जरूर होगा। लोक दिखावे के लिए बेशक जुबान पर नहीं ला सकते पर काम तो दबाव में करना ही पड़ रहा होगा। मुख्यमंत्री हैं तो क्या उनकी पार्टी के विधायकों की तादाद तो राजद के विधायकों से कम ठहरी। इसका उलटा होता तो बात दूसरी होती। गठबंधन की सरकार यों नीकु ने भाजपा के साथ मिलकर भी पूरे एक दशक चलाई। पर तब उनके विधायक भाजपा से ज्यादा थे। लिहाजा वे बिना दबाव के न केवल अपना काम करते रहे बल्कि अपनी धौंस भी जमा रहे थे। मौजूदा स्थिति पहले जैसी नहीं है। पर अगले चुनाव तक तो इसी तरह गुजारा करना पड़ेगा। तभी तो अपनी पार्टी को मजबूत करने के जतन बदस्तूर कर रहे हैं। कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने की चिंता है तो नेताओं को दौड़ा रहे हैं। लोगों के बीच जद (एकी) कार्यकर्ता सरकार की उपलब्धियों का बखान नीकु को श्रेय देते हुए ही कर रहे हैं। अपनी पार्टी के अध्यक्ष तो पहले ही बन गए थे। अब तो दोबारा निर्विरोध अध्यक्ष चुने गए हैं। कई बार साफ कर चुके हैं कि वे केवल चुनाव के वक्त तैयारी करने में भरोसा नहीं रखते। वे तो एक चुनाव निपटते ही अगले की तैयारी में जुट जाते हैं। किसी दूसरे की लकीर को मिटाने में यकीन नहीं उनका। अलबत्ता उसके समानांतर अपनी अलग और बड़ी लकीर खींचते हैं। दूरदर्शी तो हैं ही, इरादे के पक्के भी ठहरे। पर मजबूरी है कि जिस पार्टी के साथ गठबंधन किया है उसके नेता भी कम सयाने नहीं। वे भी बखूबी समझते हैं नीकु की फितरत।
गलती का अहसास
उम्र बढ़ती है तो इंसान अतीत में जरूर झांकता है। एक तरह से आत्मचिंतन करता है। अपने बिहारी बाबू भी आजकल इसी प्रक्रिया से गुजर रहे हैं। बिहारी बाबू यानी सांसद शत्रुघ्न सिन्हा। अचानक बोल गए कि अपने ही अभिनेता मित्र राजेश खन्ना के मुकाबले नई दिल्ली में लोकसभा का उपचुनाव लड़ना उनकी गलती थी। जिसकी वजह से वे अपने एक अच्छे मित्र से हमेशा के लिए अलग हो गए। दरअसल इस उपचुनाव ने दोनों के रिश्तों में ऐसी तल्खी बढ़ा दी कि राजेश खन्ना जब तक जीवित रहे, बिहारी बाबू से दूरी ही बनाए रखी। पर बिहारी बाबू ने एक सच और भी बोल दिया। खुलासा किया कि यह उपचुनाव उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी के कहने पर लड़ा था। तब वे भाजपा में नए थे और आडवाणी के आदेश को टाल नहीं सकते थे। अब तो अफसोस ही कर सकते हैं। बिहारी बाबू अपनी साफगोई के लिए अपनी पार्टी में भी बागी का तमगा पा चुके हैं। कभी लालू यादव के पक्ष में बोल दिया तो कभी अपनी उपेक्षा से चिढ़ कर अपनी ही पार्टी के खिलाफ माहौल बना दिया। नीतीश जब भाजपा से नाता तोड़ कर मोदी की पुरजोर खिलाफत कर रहे थे तब बिहारी बाबू उनकी तारीफ के पुल बांध रहे थे। विधानसभा चुनाव में तो भाजपा को झटका भी लगा। पर बिहारी बाबू ठहरे अपनी मर्जी के मालिक। जो मन आया और ठीक लगा बोल दिया। तभी तो अपने अफसोस को भी जगजाहिर करने से संकोच नहीं किया। हैं तो आखिर बिहारी बाबू।
तुरुप का पत्ता
लगता है कि कांग्रेस ने नवजोत सिंह सिद्धू को पंजाब में अपने लिए तुरुप के पत्ते की तरह इस्तेमाल करने की रणनीति बनाई है। पर माहौल को अभी और थोड़ा अपने पक्ष में होने देने का इंतजार कर रही है यह पार्टी। एक टीवी चैनल के चुनाव पूर्व सर्वे में कांग्रेस को अव्वल बताया गया है। उसके बाद से और चौकस हो गई है पार्टी। यों रणनीति यही है कि चुनाव की औपचारिक घोषणा के बाद प्रचार को आक्रामक बनाया जाए। तभी लोगों को संदेश जाएगा कि सूबे में अगली सरकार कांग्रेस की ही बनेगी। इसलिए संभव है कि सिद्धू अपने मोर्चे का कांग्रेस में विलय भी तभी करें। अरविंद केजरीवाल की पार्टी ने पिछले एक महीने में जिस तरह सूबे में अपनी चमक खोई है, उससे भी कांग्रेस की उम्मीद और पुख्ता हुई है। अब तो भाईलोग सत्तारूढ़ गठबंधन के तीसरे नंबर पर पहुंचने जैसी अटकलें भी लगा रहे हैं। सिद्धू के साथ ही पार्टी परगट सिंह और बैंस बंधुओं को भी अपनाना चाहेगी। अभी तक की तो यही योजना है कि सिद्धू की पत्नी नवजोत कौर को अमृतसर से विधानसभा चुनाव लड़वाया जाए। पार्टी बहुमत में आई तो कैप्टन अमरिंदर को अमृतसर की लोकसभा सीट से इस्तीफा देना पड़ेगा। तब उपचुनाव में सिद्धू को उतार सकती है पार्टी। यानी पत्नी के लिए सरकार बनने की स्थिति में मंत्री पद और सिद्धू के लिए संसद। अमृतसर सीट थी भी सिद्धू की ही। पर पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा आलाकमान ने अरुण जेटली के लिए सिद्धू को बलिदान कर दिया था। यह बात अलग है कि बादल परिवार के समर्थन से इठलाने वाले जेटली तमाम जतन करके भी जीत नहीं पाए थे। अलबत्ता इस चक्कर में अपने कद्दावर और लोकप्रिय नेता सिद्धू को जरूर नाराज कर दिया पार्टी ने।
तुष्टिकरण का फेर
आखिर हैं तो कांग्रेसी ही। अपनी अलग पार्टी बनाई तो नाम तृणमूल कांग्रेस ही रखा दीदी ने। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री को दूसरे नेताओं की तरह वोटबैंक की फिक्र निरंतर रही है। जब से सत्ता में आई हैं, अल्पसंख्यकों को खुश करने का कोई मौका नहीं छोड़ा। शायद कांग्रेस और वाममोर्चे की जमीन खिसकाने में इसी फार्मूले ने मदद की हो। इस बार तो सारी सीमाएं लांघ दीं। सबसे बड़ा पर्व होता है पश्चिम बंगाल में दुर्गापूजा। पर मुहर्रम की चिंता में दुर्गा की प्रतिमाओं के विसर्जन पर दशहरे की शाम से पाबंदी लगा दी। भले कोलकाता हाईकोर्ट की फटकार क्यों न सहनी पड़ी। हाईकोर्ट ने सरकार के आदेश को अल्पसंख्यकों को रिझाने की कोशिश करार दिया। तुष्टिकरण की कोशिश बताने से भी नहीं हिचके न्यायमूर्ति दीपंकर गुप्ता। साथ ही ममता को चेताया अलग कि सियासत और मजहब का घालमेल खतरनाक हो सकता है। मनमाने फैसलों से असहिष्णुता बढ़ने का आइना दिखाया। दरअसल अतीत में कभी नहीं लगी थी मूर्ति विसर्जन पर पाबंदी। जबकि 1982 और 1983 में भी दशहरे के अगले ही दिन था मुहर्रम। पर नेताओं की चमड़ी तो मोटी हो जाती है। अदालत की फटकार के बाद भी लज्जित नहीं दिखा तृणमूल कांग्रेस का कोई नेता। अलबत्ता एक बड़े नेता ने यही फरमाया कि राजनीति का मर्म अदालत क्या जाने? अदालत को तो राजनीति करनी नहीं पड़ती। पर सियासी दलों का तो धंधा ही राजनीति ठहरा।

खट्टे-मीठे रिश्ते
कभी किशोर उपाध्याय को उत्तराखंड के कांग्रेसी हरीश रावत का हनुमान मानते थे। नारायण दत्त तिवारी के मुख्यमंत्री रहते हरीश रावत के भोंपू की तरह बरताव करते थे उपाध्याय। रावत ने ही पैरवी कर उन्हें उत्तराखंड का पार्टी सूबेदार बनवाया। उत्तराखंड का सामाजिक ताना-बाना राजपूतों और ब्राह्मणों से मिलकर बना है। सो, भाजपा हो या कांग्रेस, सूबेदारी और विधायक दल के नेता का पद ब्राह्मण और राजपूत में बांटती है। मसलन राजपूत रावत मुख्यमंत्री हुए तो कांग्रेस का सूबेदार कोई ब्राह्मण ही बनेगा। उपाध्याय को बनवा कर हरीश रावत ने विजय बहुगुणा खेमे को झटका दिया था। पर सियासत में स्वार्थ टकराते हैं तो अपने भी बेगाने नजर आते हैं। रावत और उपाध्याय के रिश्तों की कैमिस्ट्री में भी इसी वजह से खटास आ गया। अपने पार्टी सूबेदार को मुख्यमंत्री कहीं साथ ले ही नहीं जा रहे। अलबत्ता दूसरे दलों के नेताओं की कांग्रेस में भर्ती खुद कर रहे हैं। हरिद्वार, अल्मोड़ा, नैनीताल और बागेश्वर में पार्टी के छह अलग-अलग कार्यक्रम हुए। मुख्यमंत्री हर जगह दिखे पर सूबेदार कहीं नहीं। उन्हें न्योता ही नहीं था तो पहुंचते कैसे? दोनों के रिश्तों में दरार पीडीएफ के चक्कर में पड़ गई। जिस विधायक ने उपाध्याय को विधानसभा चुनाव में शिकस्त दी थी उसे हरीश रावत ने मंत्री पद दे दिया। इसे उपाध्याय ने अपनी तौहीन माना। ऊपर से रावत ने उनके सिफारिशी कार्यकर्ताओं को लालबत्ती नहीं दी। जबकि पार्टी आलाकमान ने उन्हें इसके लिए समझाया था। पर हरीश रावत न आलाकमान की चिंता कर रहे हैं और न अपने पार्टी सूबेदार की। सरकार तो उनकी है ही, संगठन पर भी वर्चस्व बना लिया है। बेचारे किशोर उपाध्याय राजपूत मुख्यमंत्री पर ब्रह्महत्या का आरोप लगाने से ज्यादा और क्या कर सकते हैं? हरीश रावत का अपना दर्द ठहरा। करीबियों से अक्सर कहते हैं कि जो दिनरात उनकी चिलम भरता था, वही अब उनकी जड़ों में मट्ठा डालने लगा तो क्यों लगाएं उसे अपने गले।
चाबुक का असर
लगता है कि अमित शाह की नसीहत का असर हुआ है। राजस्थान में भाजपा का संगठन और सरकार दोनों ही अब अपनी छवि को लेकर चौकस दिख रहे हैं। सरकार के नाकारा होने की छवि बनी तो कांग्रेस ने मौके का फायदा उठाने की गरज से अपने नेताओं की एकजुटता का अभियान छेड़ दिया। वसुंधरा सरकार के तीन साल बीत गए हैं। ऐसे में अमित शाह ने वसुंधरा और सूबेदार अशोक परनामी दोनों को दिल्ली तलब किया। कार्यशैली में बदलाव लाने का बौद्धिक पिलाया। मकसद लगातार दूसरी बार पार्टी की जीत सुनिश्चित करना बताया। अमित शाह को सोचना चाहिए था कि अभी तो परनामी अपनी टीम तक नहीं बना पाए हैं। जबकि पार्टी के सहसंगठन मंत्री वी सतीश ने अमित शाह को इस बैठक से पहले ही फीडबैक दिया होगा। चर्चा है कि अब वसुंधरा अपनी सरकार की छवि सुधारने के लिए नाकारा और बदनाम मंत्रियों की छुट्टी कर सकती हैं। यह बात अलग है कि जिन्हें हटाया जाएगा, उन्हें काबिल बता पार्टी में जगह मिलेगी। राजेंद्र राठौड़, कालीचरण सर्राफ और किरण माहेश्वरी जैसे मंत्रियों को संगठन के नजरिए से ज्यादा कुशल मानते रहे हैं परनामी। संगठन में दमदार नेता हों तो कार्यकर्ता भी आक्रामक तेवर अपनाते हैं। पर मंत्रियों को तो मालपुओं का चस्का लग चुका है। बदलाव की आहट पाते ही हर कोई जुट गया है कुर्सी बचाने की जुगत में।
कुल्हाड़ी पर पांव
यूपी को देश की सियासी नब्ज माना जाता है। सबसे बड़ा भी है यह सूबा। सियासी अहमियत है तभी तो नरेंद्र मोदी ने गुजरात को छोड़ इसी सूबे को अपनाया है। पर सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के यादव कुनबे की कलह को लेकर गजब की अटकलें चल रही हैं। पिता-पुत्र की अनबन पर बसपा और कांग्रेसी खेमे में दिवाली मन रही है तो भाजपा नेताओं के चेहरे बुझ गए हैं। उनकी मुस्कान बनावटी ठहरी। वे तो इसी चिंता में दुबले हुए जा रहे हैं कि सूबे का मुसलमान छिटक कर बसपा के साथ न चला जाए। ऐसा हुआ तो मायावती का सत्ता में आना तय है। लिहाजा भाजपाई अब भी मायावती को हलके में ले रहे हैं। या फिर लेने का उपक्रम कर रहे हैं। पर यादव परिवार को तो जैसे ग्रहण लग गया है। हर दिन जिसके जो मन आ रहा है, कह रहा है। मुलायम ने नए बयान से हर किसी को हैरान कर दिया। फरमाया कि अगले मुख्यमंत्री का फैसला चुनाव बाद विधायक करेंगे तो अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री रहते ही वह सरकारी आवास ले लिया जिसमें वे बतौर पूर्व मुख्यमंत्री रह सकेंगे। तो क्या उन्होंने मान लिया है कि वे सत्ता गंवा रहे हैं। सियासत में अटकलें भी खूब चलती हैं। एक चुनाव पूर्व सर्वेक्षण ने कमाल के आंकड़े पेश कर दिए। सीटों की संख्या के मामले में जिस सपा को तीसरे नंबर पर धकेल दिया उसी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की बतौर मुख्यमंत्री दावेदार लोकप्रियता राजनाथ सिंह और मायावती से भी ऊपर यानी 37 फीसद दिखा दी। कोई कह रहा है कि मुलायम खुद बेटे की मजबूती के लिए अपने भाई का पक्ष लेकर नाटक कर रहे हैं तो जानकार भविष्य के नजारे दिखा रहे हैं। यही कि 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले सपा दो फाड़ हो जाएगी। एक भतीजे यानी अखिलेश की सपा और दूसरी चाचा यानी शिवपाल यादव और अखिलेश के सौतेले भाई प्रतीक यादव की सपा। तो क्या अगले लोकसभा चुनाव को लेकर भी गंभीर नहीं हैं यादव परिवार के धुरंधर। अखिलेश जिस बाहरी का वास्ता दे अपनी पीड़ा जताते रहे, लगता है कि उसी बाहरी ने फिर जादू कर दिया है नेताजी पर।

मंजा खिलाड़ी
सियासी सूझबूझ और वक्त की नजाकत भांपने के हुनर में माहिर हैं शिवराज सिंह चौहान। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने सेना की सर्जिकल स्ट्राइक से देश में बने माहौल के बीच चौदह अक्तूबर को प्रधानमंत्री को बुला लिया भोपाल। आजादी के बाद देश की सुरक्षा में शहीद हुए सैनिकों की याद में बनाए शौर्य स्मारक के लोकार्पण के निमित्त। गजब की सियासी टाइमिंग दिखाई। बेशक देश में ऐसे चार स्मारक पहले ही बन चुके हैं। पर इस स्मारक से भोपाल को तो नई पहचान मिलेगी ही। प्रधानमंत्री के नाते आठवीं यात्रा थी यह मोदी की। पर इस बार शिवराज ने प्रभावित कर दिखाया प्रधानमंत्री को। अहसास करा दिया कि वे करामाती भी हैं और करिश्माई भी। करिश्माई हैं तभी तो उनकी अगुवाई में दो विधानसभा चुनाव जीत चुकी है भाजपा। लोकसभा में भी उनके मुख्यमंत्री रहते अच्छा ही रहा है चुनाव का परिणाम। अब शिवराज के विरोधी अपने बाल नोचने से ज्यादा क्या कर पाएंगे? पूर्व सैनिकों के सम्मेलन में भीड़ भी खूब जुटाई थी चौहान ने। लोकसभा चुनाव के बाद पहली बार सुनाई पड़ा भीड़ से मोदी-मोदी का जयघोष। मोदी का चेहरा खिला हुआ था। अपने भाषण में खूब कसीदे पढ़े शिवराज की तारीफ में मोदी ने। शिवराज ने और भी सूझबूझ दिखाई। शहीद सैनिकों के माता-पिता के लिए पांच हजार रुपए की मासिक पेंशन और रिहायश के लिए प्लाट या फ्लैट की घोषणा कर दिल जीत लिया उनका। जनसभा के बाद मोदी जा पहुंचे दिगंबर जैन संत विद्या सागर से आशीर्वाद लेने। जैन साधू ने कुछ मंत्र भी दिए आशीर्वाद के साथ मोदी को। मसलन देश का संबोधन इंडिया के बजाए भारत से हो, अदालती फैसले अंग्रेजी के बजाए मातृभाषा में लिखे जाएं और देश से मांस के निर्यात पर रोक लगे।
भाजपाई प्रलाप
सामाजिक समरसता का ढिंढ़ोरा पीटने में कोई सानी नहीं भाजपा का। मध्य प्रदेश भाजपा इस मामले में और भी अग्रणी है। संगठन और सरकार की कार्यशैली पर चिंतित पार्टी नेतृत्व को यह जानकर झटका लगा होगा कि मध्य प्रदेश में आधे दलितों को मंदिर में आज भी घुसने की आजादी नहीं। जिसकी चिंता व्यापक हिंदू एकता का राग अलापने वाले आरएसएस के सुप्रीमो मोहन भागवत को भी नजर आई। दशहरे पर संघ के स्थापना दिवस समारोह में नागपुर में भागवत ने सामाजिक असमानता और जातीय भेदभाव को अभिशाप बताया। संघ के सर्वेक्षण के आंकड़ों का जिक्र भी कर दिया भागवत ने। मध्य प्रदेश के नौ हजार गांवों में दलितों और पिछड़ी जातियों को मंदिरों में भेदभाव झेलना पड़ रहा है। सवर्ण हिंदू आज भी न उन्हें अपने श्मशान में दाह संस्कार की छूट देते हैं और न अपने जल स्रोतों के इस्तेमाल की। गौरक्षकों पर प्रधानमंत्री ने बेशक हमला बोला था। लेकिन भागवत ने उनका बचाव ही किया। लगे हाथ मोदी को सफाई भी दे डाली कि जो लोग इस आड़ में गलत काम कर रहे हैं, उनकी तुलना गोरक्षकों से करना कतई उचित नहीं।
कुनबे का कलह
एक दिन के दौरे पर मंडी जाएंगे मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। हिमाचल के इस शहर में भाजपा की परिवर्तन रैली को तो संबोधित करेंगे ही कुछ उद्घाटन भी करेंगे। हिमाचल जैसे छोटे सूबे के लिए प्रधानमंत्री का आना किसी वरदान से कम नहीं आंकना चाहिए। पर उनके दौरे से ठीक पहले ही पार्टी बंटी नजर आ रही है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा का मुख्यमंत्री बनने का सपना फिर प्रखर हो गया है। शांता कुमार और राम स्वरूप शर्मा व जयराम ठाकुर जैसे पुराने नेताओं के सहारे करना चाह रहे हैं अपना सपना साकार। शर्मा मंडी के सांसद हैं तो शांता उनके पुराने गुरु। जयराम ठाकुर से खुद का अच्छा नाता रहा है। शांता भी नड्डा को आगे कर प्रेम कुमार धूमल से अपना पुराना हिसाब चुकाने के फेर में होंगे। पर खुद को अलग-थलग करने की कोशिश पर खामोश तो धूमल भी नहीं रहने वाले।

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First Published on October 17, 2016 2:17 am

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