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व्यंगकार के पांव

उन्होंने कुछ लिखा और दौड़े आए मेरे पास। बोले-‘आप तो अच्छे व्यंग्यकार हैं-जरा देखिए मेरा व्यंग्य।’ मैंने कहा- ‘व्यंग्यकारजी जीवंत व्यंग्य के लिए हमें बोलचाल में व्यंग्य लाना होगा।’
Author January 19, 2016 15:47 pm
पूरन सरमा का ब्लॉगः व्यंगकार के पांव

उन्होंने कुछ लिखा और दौड़े आए मेरे पास। बोले-‘आप तो अच्छे व्यंग्यकार हैं-जरा देखिए मेरा व्यंग्य।’
मैंने कहा- ‘व्यंग्यकारजी जीवंत व्यंग्य के लिए हमें बोलचाल में व्यंग्य लाना होगा।’
वे बोले- ‘अब मैं व्यंग्य में ही पांव जमाना चाहता हूं।’
मैंने कहा- ‘बहुत अच्छा, लोग हाथ जमा रहे हैं-आप पांव जमा दीजिए।’
वे बोले-‘ऐसा है जी, जब तक एक विधा में नहीं लिखा जाएगा-साहित्य में आकलन नहीं हो पाएगा। सारी विधाएं छोड़ कर व्यंग्य में जमना चाहता हूं।’
मैं बोला-‘लेकिन गुरू मुझे तो कोई खतरा नहीं है?’
उन्होंने कहा-‘यह तो समय के गर्भ में है। फिलवक्त मेरा यह व्यंग्य पढ़कर बताइए कि इसे कहां भेजूं?’
– ‘जमना आपको है और पढ़ूं मैं। यह मेरे लिए पहेली है।’
-‘आप घबराइए नहीं। पहली बार में ही नहीं उखड़ जाएंगे।’
-‘इससे मैं उखड़ गया तो?’
-‘सच मानिए आपको कोई खतरा नहीं है।’
‘मुझे इन दिनों दो हजार रुपए की जरूरत है, अगर आप व्यवस्था कर सकेंगे तो मैं व्यंग्य पढ़ सकूंगा।’
व्यंग्यकार ने दांत पीसे और बोला-‘आपसे ऐसी आशा नहीं थी। जितने बड़े बने फिरते हो, उतने ही छोटे हो। कान खोलकर सुन लो, आपको व्यंग्य से नहीं उखाड़ दिया तो नाम बदल दूंगा।’
मैंने कहा-‘नाराज मत होओ भाई, कल ‘बाई द वे’, मैं आपके व्यंग्य से उखड़ गया तो मेरा क्या होगा? फिर मुझे दो हजार की सख्त आवश्यकता भी है, तुम्हें मेरी वैसे ही सहायता करनी चाहिए।’
व्यंग्यकार क्रोध में था,बोला-‘लूटना चाहते हो। मेरे व्यंग्यकार होने से पहले ही जल रहे हो।’
मैंने कहा- ‘भाई, अगर तुम मुझे बिना बताए ही व्यंग्यकार बन जाते तो मैंने कब रोका था। अब जब कोई बात नोटिस में आ गई तो मैं जो रोड़े उत्पन्न कर सकता हूं, करूंगा। रहा सवाल आपके संघर्ष का-वह करते रहिए। मैं भी देखता हूं, तुम बिना दो हजार की दक्षिणा दिए कैसे बनते हो व्यंग्यकार! मेरी राय में तुम तनिक लोभ कर रहे हो। मेरी फीस दे दो तो मैं दो माह नही लिखूंगा और तुम्हें छपने का मौका दूंगा।’
व्यंग्यकार की आंखों में प्रसन्नता की चमक लौट आई, बोले-‘अच्छा यह पालिटिक्स है। आप दो हजार लेने के बाद दो माह नहीं लिखोगे।’
‘जी, मैं हर माह एक हजार रुपए के व्यंग्य लिखता हूं। आप प्रति माह एक हजार के हिसाब से भुगतान कर देंगे तो मैं नहीं लिखूंगा और जब मैं नहीं लिखूंगा तो निसंदेह संपादकों को आपके व्यंग्य छापने चाहिए।’ मैंने कहा।
वे बोले-‘इसका मतलब आप जो पिछले दो महीनों से नहीं लिख रहे हैं-उसके लिए कौन दे रहा था खामियाजा आपको?’
मैं बोला- ‘यह तो ट्रेड सीक्रेट है। आपको लिखकर दे सकता हूं कि मैं भुगतान प्राप्त करने के बाद एक भी रचना प्रकाशनार्थ नहीं भेजूंगा।’
‘लेकिन आपको पांव जमवाने की गारंटी देनी होगी।’ व्यंग्यकार ने कहा।

मैंने कहा-‘देखो भाई, व्यंग्य में जमाने की गारंटी तो मैं दे नहीं सकता। हां, तुम्हारा पांव जरूर मुझे दो हजार देने के बाद जड़ हो जाएगा।’
‘क्या मतलब?’ उन्होंने पूछा।
‘मतलब यह कि दो हजार जिस किसी से भी उधार लाओगे-उसका ब्याज चुकाते-चुकाते ‘गठिया’ हो जाएगी और पांव एक जगह ‘जमा’ समझो।’
‘मैं समझ गया। इसका मतलब यही हुआ न कि मैं ‘व्यंग्य’ न लिखूं।’ उन्होंने कहा।
मैं बोला-‘अजी व्यंग्य अवश्य लिखें, लेकिन यह जमने-जमाने की बात छोड़ दें। आप जो यह मुझे उखाड़ कर जमने की सोचते हैं ? यही गलत है।’
‘तो मुझे क्या करना चाहिए ?’
‘तुम्हें लिखना चाहिए-लेकिन व्यंग्य नहीं। व्यंग्य लिखना बड़ी टेढ़ी खीर है। आप सीधी खीर खाओ और अपनी वही चाल जारी रखो। मेरा मतलब कविताएं लिखो।’ मैंने कहा।
‘मैं कविताओं से थक गया हूं। मैं कुछ नया करना चाहता हूं। कुछ फड़फड़ाता-सा और फड़कता-सा लिखना चाहता हूं-जिससे सबका ध्यान मेरी ओर चला आए।’ व्यंग्यकार ने कहा।
मैंने कहा -‘ओह, आईसी। आप लोगों का ध्यान खींचना चाहते हो, तो ऐसा करो कल से कमर से ऊपर वाले कपड़े पहनना बंद कर दो।’
‘आप फिर मजाक कर रहे हैं श्रीमान जी।’
‘आखिर व्यंग्यकार जो हूं। लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए और भी कई रास्ते हैं, मसलन बाल और नाखून बढ़ा लें-आपका नाम गिनीज बुक में किसी भी क्षण जुड़ सकता है।’
‘व्यंग्यकार तो लाख हो गए किसी का नाम नहीं जुड़ा है आज तक। मुझे देख लो, चालीस संग्रह आ गए और आज भी वही घास खोद रहा हूं।’ मैंने कहा।
‘लेकिन मैं तो अब व्यंग्य में ही पांव जमाना चाहता हूं।’
मैंने कहा-‘यह आपकी जिद है। आप पांव मत जमाइए। कलम की धाक जमाइए। यह कोई बात नहीं है कि जब सब लोग अपनी लेखनी को जमा रहे हैं, उस समय तुम पांव
जमाना चाहते हो। यह कोई रावण का दरबार नहीं है-जो अंगद की तरह तुमने पांव जमा दिया है। हालांकि, मैं तुम्हें व्यंग्य में पछाड़ सकता हूं, लेकिन पांव जमाने में नहीं।’

इसीलिए तो मैं पांव जमाना चाहता हूं। आपको शायद पता नहीं है मेरा वजन पूरा एक कुंटल है। मेरा पांव नहीं यह लोहे की लाट है जिसे उखाड़ने की क्षमता अभी किसी भी व्यंग्यकार में नहीं है। जो इसे उखाड़ने की कोशिश करेगा वही नेस्तनाबूद हो जाएगा।’ व्यंग्यकार ने कहा।
मैंने हाथ बांधे और कहा-‘हे दक्कीसवीं सदी के व्यंग्यकार, क्या आप पांव से लिखते हैं ?’
व्यंग्यकार ने मुझे पांव दिखाया और कहा-‘जी, मैं पांवों से लिखता हूं। कोई माई का लाल आए मेरे सामने, एक पल में हड्डी-पसली एक कर दूं।’
‘बचपना छोड़ो, पांव नीचे करो और भैया फ्री स्टाइल में तुम्हारा ‘फेट’ ठीक रहेगा। व्यंग्य में इतने बड़े पहलवान की जरूरत नहीं है। व्यंग्यकार तो हुए हैं पर तुम्हारे जैसे बलिष्ठ पांव जमाने वाले नहीं!’
मैंने कहा तो व्यंग्यकार ने खड़े होकर पांव पीटे तो पैर यकायक मुड़ गया और धड़ाम से जमीन पर गिर पड़े।
मैंने उन्हें उठाना चाहा तो उठ नहीं पाए। पांव में मोच आ गई थी और एक जगह जम चुका था।
मैंने रिक्शा मंगवाया। पड़ोसियों की सहायता से उठाकर उन्हें उसमें डाल कर रिक्शेवाले से बोला-‘भैया, यह व्यंग्यकार हैं और इनका पांव जम चुका है-थोड़ा सावधानी से ले जाना। कल इन्हें कुछ हो गया तो जमा-जमाया खेल बिगड़ जाएगा।’
मेरी इस बात पर रिक्शावाला हंसा। मुझे लगा कि वह भी कोई व्यंग्यकार ही था। ०

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