December 10, 2016

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परीक्षा का प्रश्न

केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड कई राज्यों में बनी समितियों से लंबे विचार-विमर्श के बाद अपनी सिफारिशें दे चुका है और जल्द ही सरकार इस बारे में नई नियमावली बनाएगी।

Author November 16, 2016 01:03 am
श्रीनगर में 12वीं की वार्षिक परीक्षा में शामिल होने के बाद वापस लौटतीं छात्राएं। (PTI Photo by S Irfan/14 Nov, 2016)

केंद्र सरकार केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) द्वारा संचालित दसवीं की परीक्षा से ग्रेडिंग प्रणाली खत्म करके दोबारा श्रेणी-प्रणाली शुरू करने की तैयारी में है, जैसा कि मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावडेकर ने बुधवार को जयपुर में संकेत दिया। उन्होंने बताया कि केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड कई राज्यों में बनी समितियों से लंबे विचार-विमर्श के बाद अपनी सिफारिशें दे चुका है और जल्द ही सरकार इस बारे में नई नियमावली बनाएगी। इस प्रस्ताव को पहले मंत्रिमंडल के समक्ष और बाद में संसद में भी प्रस्तुत किया जाएगा।

गौरतलब है कि यूपीए-दो सरकार के दौरान ‘फेल न करने की नीति’ (नो-डिटेंशन पालिसी) को अपनाते हुए दसवीं यानी हाईस्कूल की परीक्षा में ग्रेडिंग प्रणाली लागू की गई थी। इसका मकसद किसी परीक्षार्थी को फेल करने के बजाय ए-1, ए-2….इ-3 जैसा ग्रेड देकर अगली कक्षा में भेजना था। तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल इस योजना के सूत्रधार थे। इस प्रणाली के पक्ष में सबसे अहम दलील यह थी कि इससे परीक्षार्थियों पर फेल होने का डर या तनाव कम होगा। कई मनोविदों, विशेषज्ञों ने कहा था कि तनाव-मुक्त होने की वजह से छात्र बेहतर और स्वाभाविक तरीके से सोच सकेगा। तब भी केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड ने, जो कि मंत्रालय का सर्वोच्च सलाहकार निकाय है, मौजूदा सतत एवं समग्र मूल्यांकन (सीसीई) प्रणाली पर अपनी मुहर लगाई थी। 2010 में पुरानी प्रणाली खत्म करके 2011 से इसे लागू किया गया था। राजग सरकार इसे सत्र 2017-18 से बदलने की योजना बना रही है।

जावडेकर के मुताबिक यह पाया गया कि ग्रेडिंग प्रणाली छात्रों में यथेष्ट और लक्षित योग्यता व दक्षता नहीं ला पा रही है; सर्वेक्षण और परीक्षण बता रहे हैं कि मौजूदा प्रणाली शिक्षक और शिक्षार्थी, दोनों स्तरों पर विफल हुई है। हालांकि उन्होंने इस नीति में बदलाव के लिए आम सहमति बनाने की जरूरत जताई है। एक मोटे आंकड़े के अनुसार देश भर में औसतन ढाई करोड़ परीक्षार्थी दसवीं की परीक्षा देते हैं, जिनमें पचास लाख सीबीएसई और बाकी राज्यों के बोर्डों से जुड़े हैं। जावडेकर चाहते हैं कि आठवीं और पांचवीं की परीक्षा में भी बोर्ड प्रणाली लागू हो। लेकिन इसके लिए निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा अधिनियम-2009 में संशोधन करके राज्यों को अधिकार देना पड़ेगा कि वे नए कानून बनाएं। इस कानून में आठवीं तक फेल न करने की व्यवस्था की गई है। अंतराष्ट्रीय छात्र मूल्यांकन कार्यक्रम की एक रिपोर्ट में पाया गया था कि ग्रामीण क्षेत्र में कक्षा पांच के छात्र कक्षा तीन की किताबें तक नहीं पढ़ पा रहे थे। कक्षा पांच के ही पांच में से केवल तीन छात्र कक्षा दो की किताबें पढ़ने में सक्षम थे।

इसमें शक नहीं कि भारत में सामाजिक श्रेणी की ही तरह शिक्षा प्रणाली के भी कई स्तर हैं। क्या सरकारी और निजी स्कूलों के अध्ययन-अध्यापन का अंतर जमीन-आसमान जैसा नहीं है? शिक्षकों के वेतन और दूसरी सुविधाओं में क्या भारी असमानता नहीं है? शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों की व्यवस्था क्या गहरे अंतर से ग्रसित नहीं है? ऐसे में किसी एक को दूसरे की कसौटी पर कसना क्या गलत नतीजे की ओर नहीं जाना है? सरकार को चाहिए कि नीतियों और कार्यक्रमों में बदलाव करते समय इस तरह के सवालों को भी मद््देनजर रखे।

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First Published on November 16, 2016 1:03 am

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