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कविताः बोलचाल

बोलचाल- बोल-बोलकर सब कहते, कुछ लिखकर कहते हैं
Author January 19, 2016 15:56 pm

बोलचाल

बोल-बोलकर सब कहते
कुछ लिखकर कहते हैं
कुछ कहते रहते मन ही मन
कुछ दिखकर कहते हैं

कुछ बहकर कहते हैं
कुछ उगकर कहते हैं
कहते हैं कुछ उड़कर
कुछ चलकर कहते हैं
कुछ रहते हैं गुपचुप
जरा ठहरकर कहते हैं

बात न हो कोई कहने को
तब भी कहते हैं
कहने को कुछ होता ही है
जब भी कहते हैं

कुछ हिलकर कहते हैं
कुछ मिलकर कहते हैं
मन फट जाए किसी का
तो सिलकर कहते हैं
खुलकर कहते हैं
खिलकर कहते हैं

पास बुलाकर कहते हैं
कभी लजाकर कहते हैं
कोई नहीं सुने तो
ढोल बजाकर कहते हैं

कहते हैं कुछ बढ़कर
कुछ चढ़कर कहते हैं
कुछ लड़कर कहते हैं
कुछ भिड़कर कहते हैं
कुछ पीछे पड़ जाते हैं
तो मुड़कर कहते हैं
कुछ की बात नहीं बनती
तो कुढ़कर कहते हैं

कुछ गुस्से से फूल कर
कुछ अपने को भूल कर
बातें करते रहते अपने आप से
उलझे रहते यों ही ऊलजुलूल से
कुछ दिल से कहते हैं
कुछ सिर से कहते हैं
समझ न आए बात अगर
तो फिर से कहते हैं

जो कहते हैं गढ़ कर
वे जुड़ कर कहते हैं
गढ़ते हैं हर बात नई
कुछ पढ़कर कहते हैं

कुछ कहते हैं बेहतर
कुछ कमतर कहते हैं
जब कहते हैं रम कर
फिर जम कर कहते हैं

कुछ पा कर कहते हैं
कुछ खो कर कहते हैं
कुछ आ कर कहते हैं
कुछ जा कर कहते हैं

ऐसा कोई नहीं
कि जिसको कहने को न हो
इसके-उसके साथ कहीं
कुछ सहने को न हो

कुछ गा कर कहते हैं
कुछ रो कर कहते हैं
कुछ हंस कर कहते हैं
कुछ ऐसे भी होते हैं
जो डंस कर कहते हैं
अपनी ही बातों में
कुछ फंस कर कहते हैं

सब कुछ कहां कहा जाता है
सहते रहते हैं
रहते हैं सब साथ-साथ
कुछ कहते रहते हैं।

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