December 03, 2016

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संपादकीयः हताशा में राजनीति

इरोम शर्मिला चानू के राजनीतिक दल गठित करने पर स्वाभाविक ही आंदोलनों के जरिए सामाजिक-राजनीतिक बदलाव लाने की कोशिशों पर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं।

Author October 20, 2016 02:07 am

इरोम शर्मिला चानू के राजनीतिक दल गठित करने पर स्वाभाविक ही आंदोलनों के जरिए सामाजिक-राजनीतिक बदलाव लाने की कोशिशों पर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं। पूर्वोत्तर में सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून यानी अफस्पा हटाने की मांग को लेकर इरोम शर्मिला करीब सोलह साल तक अनशन पर रहीं। कई बार उनसे अनशन तोड़ने की अपील की गई, मगर वे अपनी मांग पर अटल रहीं। जब उनकी सेहत खराब होने लगी तो जबरन नाक में नली डाल कर उन्हें आहार दिया गया, पर वे अफस्पा हटाने की मांग पर अड़ी रहीं। उनके संघर्ष को दुनिया भर में सराहना मिली। मगर बीते अगस्त में उन्होंने अचानक अनशन तोड़ने और विधानसभा चुनाव लड़ने का एलान कर दिया। अनशन तोड़ने के बाद वे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से मिलीं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मिलने की इच्छा जताई थी। उनके इस तरह सक्रिय राजनीति में आने से सवाल उठने लगे हैं कि क्या वे सत्ता के आकर्षण में बंध गई हैं। उनके इस तरह राजनीति का रुख कर लेने से अफस्पा हटने को लेकर उम्मीद लगाए लोगों को निराशा हुई है। मगर इसे इरोम शर्मिला की सत्ता लोलुपता नहीं कहा जा सकता। करीब दो महीने पहले जब उन्होंने अनशन तोड़ा और राजनीतिक दल गठित करने का एलान किया था, तब साफ कहा था कि अपने आंदोलन के शिथिल पड़ते जाने और सत्ता पक्ष के ढुलमुल रवैए के चलते उन्हें काफी निराश हुई है। वे सीधे सत्ता में भागीदारी करके अपनी मांग मनवाने का प्रयास करेंगी। इसीलिए पार्टी गठित करने के साथ ही उन्होंने अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री ओ. इबोबी सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ने की घोषणा भी कर दी।


छिपी बात नहीं है कि पिछले कुछ सालों में विभिन्न मुद्दों को लेकर उठे अनेक आंदोलनों से लोगों की उम्मीदें जगी थीं। इसलिए बड़ी तादाद में लोग उनसे जुड़े भी। उन्हें लेकर अनेक स्वयंसेवी संगठन भी एकजुट हुए, पर जैसे-जैसे समय बीतता गया, लोग और संगठन अलग होते गए, आंदोलन अपनी ताकत खोते गए। सरकारों का रवैया टालमटोल का बना रहा। ऐसे में कई लोगों की राय बनी कि सरकारों पर दबाव डालने के बजाय आंदोलनकारियों को सीधे सत्ता में शामिल होकर उन मुद्दों का हल निकालने की कोशिश करनी चाहिए। अण्णा आंदोलन के बाद आम आदमी पार्टी का उदय इसी विचार के तहत हुआ था। इरोम शर्मिला का अनुभव भी कुछ ऐसा ही रहा। शुरुआती वर्षों में तो बहुत सारे लोग उनके साथ खड़े हुए, अनेक संगठनों ने भी उन्हें समर्थन दिया, मगर आंदोलन लंबा खिंचता गया तो सब अलग होते गए। इरोम शर्मिला लगभग अकेली पड़ती गई थीं। सरकार पर उनका दबाव बहुत कारगर साबित नहीं हो रहा था। इसलिए सत्ता में शामिल होकर अफस्पा हटाने की लड़ाई लड़ने का उनका इरादा समझा जा सकता है। मगर उनके सत्ता तक पहुंचने और फिर अपने इरादे में कामयाब रहने को लेकर भी कोई दावा फिलहाल नहीं किया जा सकता। आम आदमी पार्टी के पूर्ण बहुमत में आने के बावजूद अपने वादों और इरादों में कामयाब न हो पाने का उदाहरण सामने है। इसलिए अगर इरोम शर्मिला अकेले विधानसभा में पहुंच भी जाती हैं तो अफस्पा को लेकर सकारात्मक फैसला करा पाने में वे कितना कामयाब हो पाएंगी, कहना मुश्किल है। इसलिए उनके सामने चुनौती न सिर्फ चुनाव जीतने, बल्कि अपनी निष्ठा और आंदोलन से जुड़े लोगों के विश्वास को भी बचाए रखने की है।

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First Published on October 20, 2016 2:06 am

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