ताज़ा खबर
 

प्रसंगवशः वन और जीवन

मानसून चक्र को बनाए रखने, मृदा अपरदन को रोकने, जैव-विविधता को संजोए रखने और दैनिक उपभोग के दर्जनाधिक उपदानों की सुलभ प्राप्ति के लिए जंगलों का होना बेहद जरूरी है। प्राकृतिक असंतुलन के लिए जंगलों का बचे रहना बेहद जरूरी है। 
Author September 17, 2017 03:12 am

सुधीर कुमार

अंतरराष्ट्रीय संस्था वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड द्वारा तैयार की गई एक रिपोर्ट बताती है कि पिछले पचास वर्षों में दुनिया के आधे से ज्यादा जंगल गायब हो चुके हैं। अनुमान है कि वनोन्मूलन के कारण पृथ्वी से प्रतिदिन पौधे, जंतु और कीड़ों की करीब एक सौ सैंतीस प्रजातियां खोती जा रही हैं। यह मानव समाज के लिए बड़ी चेतावनी है। स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र के लिए जैव-विविधता बेहद अहम है। पर इसके संरक्षण को लेकर हम गंभीर नहीं हैं। पिछले साल एमएस स्वामीनाथन ने कहा था कि वर्तमान समय में जैव-विविधता का संरक्षण अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो गया है। जैव-विविधता के संरक्षण के लिहाज से हमारे देश में स्थिति संतोषजनक नहीं है।

भारत में पौधों की लगभग पैंतालीस हजार और जीवों की करीब इक्यानबे हजार प्रजातियां मौजूद हैं। पर असंतुलित आर्थिक विकास और वैश्विक ऊष्मण की वजह से पौधों और जीवों की अनेक प्रजातियां संकट में हैं। अनुमान है कि पौधों और जीवों की पचास से डेढ़ सौ प्रजातियां हर रोज खत्म हो रही हैं।
दरअसल, कथित औद्योगिक विकास की भट्ठी में प्रतिदिन हजारों पेड़-पौधों को झोंका जा रहा है। जैसे-जैसे भारतीय समाज कृषिगत और ग्रामीण अवस्था से उन्नति कर क्रमश: औद्योगिक और शहरी अवस्था में परिणत हुआ है, उसके साथ ही मानव समाज के समक्ष पर्यावरण संकट के रूप में एक बड़ी चुनौती ने दस्तक दी है। कुछ वर्ष पहले पेड़ों की संख्या अधिक थी, तो समय पर बारिश होती थी और गरमी भी कम लगती थी; लेकिन अब यह समस्या बढ़ रही है, जल-स्रोत सूखने लगे हैं।

सनद रहे, औद्योगिक कूड़ा-कचरा, सभी प्रकार के प्रदूषण, कार्बन उत्सर्जन, ग्रीनहाउस प्रभाव और वैश्विक ऊष्मण की वजह से आज संपूर्ण पर्यावरण दूषित हो गया है। दूसरी तरफ, बढ़ती आबादी और उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति में पेड़-पौधों की बलि चढ़ाई जा रही है। अंधाधुंध शहरीकरण का नतीजा है कि आज वनों का आवरण समाप्त होता जा रहा है। वहां घर या कारखाने बनाए जा रहे हैं।

जंगलों का होना प्रकृति और इंसानी सेहत के लिए अति आवश्यक है। जैसे-जैसे वनावरण में कमी आ रही है, वैसे ही आहार-शृंखला के विच्छेद और जैव-विविधता में कमी का ग्राफ भी बढ़ता जा रहा है। बड़े पैमाने पर जंगलों का सफाया करने से, सूखे और बाढ़ की समस्या, ग्लोबल वार्मिंग और प्राकृतिक असंतुलन के खतरे बढ़ते जा रहे हैं। ‘ग्लोबल वार्मिंग’ की समस्या आज भारत ही नहीं, एक तरह से वैश्विक चेतावनी बन चुकी है। कल-कारखाने बड़े पैमाने पर क्लोरोफ्लोरो कार्बन गैसों का उत्सर्जन कर रहे हैं। पेड़-पौधों की संख्या में कमी के कारण उनका अवशोषण नहीं हो पा रहा है, जिसकी वजह से कार्बन डाई-आॅक्साइड और मिथेन जैसी गैसें वायुमंडल का औसत तापमान बढ़ाने में बड़ा कारक सिद्ध हो रही हैं।

वैश्विक ऊष्मण जैव-विविधता का सबसे बड़ा दुश्मन है। इसकी वजह से ही प्राकृतिक मौसम और जलवायु चक्र विच्छेद हो रहे हैं, जिससे प्रतिदिन पृथ्वी का कुछ हिस्सा बाढ़, सूखा, भूस्खलन और अन्य आपदाओं से प्रभावित रहता है। इस वजह से भौतिक और मानव संसाधन का बड़े पैमाने पर नुकसान हो रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछली सदी के दौरान धरती का औसत तापमान 1.4 फारेनहाइट बढ़ चुका है। जबकि अगले सौ साल के दौरान इसके बढ़ कर 2 से 11.5 फारेनहाइट होने का अनुमान हैं। वैज्ञानिकों का मत है कि सदी के अंत तक धरती के तापमान में 0.3 से 4.8 डिग्री तक की बढ़ोतरी हो सकती है। पृथ्वी के औसत तापमान में निरंतर वृद्धि से ग्लेशियर लगातार पिघल रहे हैं। पिछले दो दशक के दौरान अंटार्कटिक और उत्तरी गोलार्द्ध के ग्लेशियरों में सबसे ज्यादा बर्फ पिघली है। फिलहाल समुद्र के जलस्तर में 0.9 मीटर की औसत बढ़ोतरी हो रही है, जो अब तक की सबसे अधिक बढ़ोतरी है।

आज जिस तरह मानव समाज अनियंत्रित विकास की बुनियाद पर पृथ्वी की हरियाली को नष्ट कर आर्थिक उन्नति के सुनहरे सपने देख रहा है; वह एक दिन सभ्यता के अंत का कारण बनेगी। दरअसल, प्राकृतिक संसाधनों के उपभोग के स्थान पर शोषण की बढ़ रही इसी प्रवृत्ति की वजह से पर्यावरण का प्राकृतिक चक्र विच्छेद हो गया है। मनुष्यों की हठधर्मिता ने संपूर्ण पर्यावरणीय चक्र पलट दिया है। नतीजतन, न समय पर बारिश होती है और न ही गरमी और सर्दी आती है। सच तो यह है कि औद्योगिक विकास की बदलती परिभाषा मानव सभ्यता के अंत का अध्याय लिख रही है। लेकिन, बेफ्रिकी के रथ पर सवार होकर हम अंधाधुंध विकास का गुणगान कर रहे हैं। क्या केवल कंक्रीट के आलीशान भवन और औद्योगिक संयंत्र ही मानव का पोषण करेंगे?

अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जहां अधिकारों की बात होती है, वहां हमारा कर्तव्य भी संलग्न रहता है। जैसे, अगर हमें जीवन जीने का अधिकार है, तो हमारा यह कर्तव्य भी है कि हम दूसरों की जान न लें। उसी प्रकार हमारी पृथ्वी हमें जीवन जीने के लिए तमाम सुख-सुविधाएं प्रदान करती है, तो हमारा कर्तव्य है कि हम समर्पित भाव से उसकी रक्षा करें। अब, जबकि जलवायु परिवर्तन पर अंतरराष्ट्रीय जगत चिंतित है; पर्यावरण संरक्षण के निमित्त आमजन का सहयोग अनिवार्य जान पड़ता है। हालांकि, प्रति वर्ष वैश्विक स्तर पर नाना प्रकार के सभा-सम्मेलनों के आयोजनों के बावजूद, पर्यावरण संरक्षण की दिशा में हम कच्छप गति से ही आगे बढ़ रहे हैं, जो चिंता का विषय है। जरूरी है कि हम पर्यावरण के लिए घातक साबित हो रही गतिविधियों पर लगाम लगाएं। सरकार सतत पोषणीय विकास के आधार पर लोककल्याण की वैचारिकी को व्यवहार के धरातल पर उतारने पर जोर दे।

पृथ्वी पर जीवन को खुशहाल बनाए रखने के लिए जरूरी है कि पृथ्वी को तंदरुस्त रखा जाय। धरती की सेहत का राज है- वृक्षारोपण। यह कई मर्जों की दवा है। दरअसल,पर्यावरण संबंधी अधिकतर समस्याओं की जड़ वनोन्मूलन है। वैश्विक ऊष्मण, बाढ़, सूखा जैसी समस्याएं वनों के ह्रास के कारण ही उत्पन्न हुई हैं।
एक समय धरती का अधिकतर हिस्सा वनों से आच्छादित था, पर आज इसका आकार दिन-ब-दिन सिमटता जा रहा है। मानसून चक्र को बनाए रखने, मृदा अपरदन को रोकने, जैव-विविधता को संजोए रखने और दैनिक उपभोग के दर्जनाधिक उपदानों की सुलभ प्राप्ति के लिए जंगलों का होना बेहद जरूरी है। प्राकृतिक असंतुलन के लिए जंगलों का बचे रहना बेहद जरूरी है।

नगरीकरण और औद्योगीकरण की राह में तेजी से आगे बढ़ रहे हमारे शहरों में भौतिक जीवन जरूर सुखमय हुआ है, पर खुला, स्वच्छ और प्रेरक वातावरण नई पीढ़ी की पहुंच से बहुत दूर होता जा रहा है। स्थिति यह है कि मानवीय स्वार्थों की पूर्ति के चलते,पर्यावरण संरक्षण से इतर इसके दोहन की गति कई गुना बढ़ गई है। स्मरण रहे, जिस आर्थिक विकास की नोंक पर आज का मानव विश्व में सिरमौर बनने का सपना संजोए है, वह एक दिन मानव सभ्यता के पतन का कारण बनेगी।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.