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जनता के दुख-दर्द को आम ज़बान में बयान करने वाले कवि थे नागार्जुन

नागार्जुन हिन्दी और मैथिली दोनों भाषाओं में कविता लिखते थे। उन्हें मैथिली का साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला था।
(बाएं से दाएं) नागार्जुन, यूआर अनंतमूर्ति और भीष्म साहनी। (Express photo by Ravi Batra)

राज्य लक्ष्मी

आधुनिक काल में छायावाद के बाद अत्यंत सशक्त साहित्यांदोलन प्रगतिवाद है। प्रगतिवाद का मूल आधार सामाजिक यथार्थवाद रहा है। प्रगतिवाद काव्य वह है, जो अतीत की संपूर्ण व्यवस्थाओं के प्रति रोष व्यक्त करता है और उसके बदलाव की आवाज़ को बुलंद करता है। नागार्जुन के काव्य में प्रगति के स्वर सर्वप्रमुख है। सही अर्थों मे नागार्जुन जनता के कवि हैं। वे एक मार्क्सवादी कवि हैं। अपनी कविता के माध्यम से उन्होंने मार्क्सवादी सिद्धांतों का प्रचार भी किया है। उनकी कविता में अमीर-गरीब, मालिक-मजदूर, ज़मींदार-कृषक, उच्चवर्ग-निम्न वर्ग के बीच द्वंद दिखाई देता है। गरीबी, भुखमरी, बीमारी, अकाल, बाढ़ जैसे सामाजिक यथार्थ का सूक्ष्म चित्रण कवि ने किया है।

प्रगतिशील हिंदी कविता में सबसे अधिक संवेदनशील और लोकोन्मुख जनकवि नागार्जुन की विशिष्टता इसी बात में रही है कि उनकी रचनाओं और उनके वास्तविक जीवन में गहरा सामंजस्य है। उनकी कविताएँ सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक आदि पक्षों में एक बड़ा चिन्ह हमारे समक्ष प्रस्तुत करती हैं। कवि नागार्जुन ने अपने युगीन यथार्थ और समसामयिक चेतना को अपनी कविता से मुखरित किया है, जिसमें एक ओर तो गरीब किसान, मजदूर शोषण के अनवरत चक्र में पिसते हुए दाने-दाने को मोहताज हैं तो दूसरी ओर नकाबधारी जो भोग-विलास में लुप्त हैं –

“जमींदार हैं, साहूकार हैं, बनिया हैं,व्यापारी हैं।
अन्दर–अन्दर विकट कसाई, बाहर खद्दरधारी हैं।”

बाबा नागार्जुन गरीबी, बदहाली और शोषण के लिए ज़िम्मेदार सामंती व्यवस्था के आडम्बरपूर्ण जीवन, वैभव प्रदर्शन और शोषण को अपनी कविता ‘विजयी के वंशधर’ में इस तरह प्रस्तुत किया है –

“गुलाबी धोती / सीप की बटनोंवाला रेशमी कुर्ता
मलमल की दुपलिया फूलदार टोपी / नेवले की मुँह सी मूठ की नफीस
छड़ी
बड़ा और छोटा सरकार / लालासहेब , हीराजी / मालिक जी ,
मोती साहेब, बच्चन जी / नून की बचोल बाचू/
हवेली से निकले बनकर सँवरकर।”  

महाकवि नागार्जुन का महान जीवन दर्शन है – विश्वमानववाद, वसुधैव कुटुम्बकम, एक विशाल, व्यापक विश्व दृष्टी। नागार्जुन का संपूर्ण कृतित्व प्रगतिशील चेतना का वाहक है। उनके साहित्य में मध्यमवर्गीय जीवन तथा मजदूर वर्ग की ज़िन्दगी का संपूर्ण चित्र यथार्थ रूप में मिलता है। उन्होंने जगत की वास्तविकता को सामने लाया। उन्होंने अपने साहित्य के माध्यम से एक नयी समस्या, एक नयी चेतना का अलोक दिखाया। उन्होंने अपनी रचनाओं में श्रमिक, दलित तथा शोषित समाज के दुःख और कष्ट का चित्रण किया है। वे जीवन के भयंकर यथार्थ का चित्रण करते हैं, उन्होंने पूँजीवाद, साम्राज्यवाद, संप्रदायवाद सभी का विरोध किया है, जिससे श्रमिक, शोषित वर्ग और किसानों को उनके श्रम का उचित मान मिल सके। नागार्जुन अपनी ‘अकाल और उसके बाद’ कविता में कहते हैं –

“कई दिनों तक चूल्हा रोया,चक्की रही उदास,
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उसके पास,
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त,
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त,
दाने आये घर के भीतर कई दिनों के बाद,
धुआँ उठा आँगन के ऊपर कई दिनों के बाद,
चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद,
कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद।”

नागार्जुन की प्रगतिवादी चेतना का मुख्य आधार किसान तथा मजदूर हैं। उनकी अधिकांश कविताएं भारत के निम्न मध्यवर्गीय श्रमिक, किसान के जीवन को चित्रित करती हैं। उनमें साधारण, उपेक्षित तथा असहाय जिंदगी बितानेवालों का चित्रण किया हैं। उनकी कविताओं में सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक विषमता को लेकर जनवादी चेतना का चित्रण हुआ है। इस तरह समाज में व्याप्त सामाजिक विषमता का चित्रण करते हुए उन्होंने ढोंग, आडम्बर का डटकर विरोध किया है। नागार्जुन आम जनता के कवि हैं इसीलिए सामाजिक, राजनीतिक स्थिति के साथ ही साथ समाज में व्याप्त सामान्य, मेहनतकश मजदूरों की आर्थिक विपन्नता का चित्रण अपनी कविता में करते हैं।

राजनैतिक एवं सामाजिक विषमता के प्रति विद्रोह की भावना उनकी जनवादी कविता का स्वर रहा है, जैसे झूठी राजनीति, सामाजिक पाखण्ड, भ्रष्टाचार, सत्तालोलुपता आदि के प्रति कवि का मन विद्रोह करता है।

“दिल ने कहा- दलित माओं के / सब बच्चे अब बागी होंगे।
अग्निपुत्र होंगे वे, अंतिम / विप्लव में सहभागी होंगे।।”

कवि मूलतः मार्क्सवादी होकर भी श्रम और शांति की अभिलाषा को व्यक्त करता हैं। वे एक तरफ मार्क्सवाद की समानता का पक्षधर भी रहे हैं और दूसरी तरफ वे दलित, शोषित, पीड़ित व्यक्तियों पर हो रहे अत्याचार के प्रति विद्रोह करते हैं। नागार्जुन की कविता के केंद्र में सामान्य आदमी रहा है। उन्होंने शोषित, पीड़ित, श्रमिक और मजदूर वर्ग के प्रति अपनी अलग जनवादी दृष्टि बना ली है। उनके काव्य का लक्ष्य व्यापक होने के कारण शोषित, पीड़ितों पर होनेवाले अन्याय, अत्याचार के खिलाफ कवि ने अपनी आवाज़ बुलंद की है , वे सामाजिक विषमता के प्रति विद्रोह कर समाज में परिवर्तन लाना चाहते हैं। नागार्जुन की कविता समाज जीवन के विविध अंगो को तथो पक्षों को उजागर करती है।

“प्यासी पथराई उदास आँखें / थकी बे- आसरा निराश आँखें
कोई भी तो अपना रुख फेरे उसकी ओर / कोई भी तो उठाये अपनी आँखों का पर्दा
बीसियों आये, बीसियों गुजरें / कहाँ किसी ने देखा बेचारी के तरफ
छलक रहा है गुणों का अभिशाप / बुझी – बुझी निगाहों में….”

एक ओर कल्याणकारी राज्य की कामना एवं कल्पना तो दूसरी ओर वृद्धों को तिरस्कृत रखने की समाज प्रवृत्ति तथा सरकार की नीति का कवि विरोध करते हैं। नागार्जुन वर्तमान के गर्भ से जन्म लेनेवाले भावी भारत की झाँकी को देखने वाले दूरदृष्टि संपन्न साहित्यकार हैं।

“तुम्हारी यह दंतुरित मुस्कान
मृतक में भी डाल देगी जान
धूलि धूसर तुम्हारे ये गीत……
छोड़कर तालाब मेरी झोपड़ी में खिल रहे जलपात
परस पाकर तुम्हारा ही प्राण
पिघल कर जल बन गया होगा कठिन पाषण”

सदियों से पीढ़ी दर पीढ़ी शोषण और सामाजिक अत्याचार सहन करने के लिए बाध्य दलित वर्ग के आर्थिक,सामाजिक उन्नयन के लिए नागार्जुन ने अपने काव्य में पुरजोर आवाज़ उठाई। दलित वर्ग विशेषत: हरिजनों ने जो सामाजिक यंत्रणा झेली है, वह अकथनीय है। इसी के सजीव चित्रण नागार्जुन ने अपने प्रसिद्ध ‘हरिजन गाथा’ में इस प्रकार किया है–

“हाल ही में घटित हुआ वो विराट दुष्कांड,
झोंक दिए गए थे उसमें तेरह निरपराध हरिजन सुसज्जित चिता में…
यह पैशाचिक नरमेघ
पैदा कर गया है दहशत जन-जन के मन में,
इन बूढों की तो नींद ही उड़ गयी है तबसे।
बाकी नहीं बचे हैं पलकों के निशान
दिखते हैं दृगों की कोर ही कोर
देती है जब तक पहरा पपोटों पर
सील मुहर सूखी की कीचड़ की।”

इस प्रकार सामाजिक व्यवस्था कोई विषय नागार्जुन से अछूता नहीं बचा है। जात-पाँत, धार्मिक कट्टरता, छुआछूत, आर्थिक तंगी, महंगाई, घर-गृहस्थी, ग्रामीण और शहरी जीवन, भ्रष्टाचार, सूदखोरी आदि की एक लम्बी सूची बनेगी, जिस पर नागार्जुन ने छोटी-बड़ी कोई न कोई कविता अवश्य ही लिखी है। उनके बहुआयामी साहित्यिक व्यक्तित्व के अनुरूप ही उनकी कविता भी है। उनकी कविताओं में एक-एक पात्र से उनका आत्मीय रिश्ता है। वह अपने पात्रों के कष्ट और अभाव से दुखी होते हैं, उन्हें कष्ट पहुँचानेवालों को वह चुनौती देते हैं। समाज में व्याप्त विसंगतियों का भी उन्होंने खुलकर विरोध किया।

नागार्जुन ने प्रगतिशील साहित्य की विषयवस्तु और उसकी वर्णनशैली को विविधता के कारण एक अनोखा तथा आकर्षक स्वरुप दिया । उन्होंने पौराणिक आख्यान और पात्रों से लेकर खेत-खलिहान, नदी, पहाड़, घाटी जैसे अछूते क्षेत्रोँ से प्रगतिशील कविता के रूप को स्थापित किया। प्रगतिशील कविता को निखार देकर उसे जनप्रिय बनाने में उनकी भूमिका को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा।

नागार्जुन के काव्य का एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि उनकी कविता स्थान विशेष की कविता न होकर पूरे हिंदी प्रांत की और पूरे देश की कविता है  नागार्जुन मूलतः मैथिली भाषी हैं। ‘यात्री’ नाम से मैथिली में कविता भी लिखते थे। मैथिली की अपनी कविताओं पर वे साहित्य अकादमी के पुरस्कार से सम्मानित भी हुए हैं।

(लेखिका हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं।)

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