December 08, 2016

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Guru Nanak Jayanti ‘Birthday’ 2016: गुरुपर्व की महत्ता को जानिए

गुरु पर्व को गुरु नानक जयंती या गुरु नानक प्रकाशोत्सव के नाम से भी जाना जाता है।

Author November 14, 2016 05:52 am
सिख धर्म के संस्थापक और प्रथम गुरु नानक देव जी।

सिख धर्म के संस्थापक और प्रथम गुरु नानक देव जी के जन्म के उपलक्ष्य में गुरु पर्व मनाया जाता है। सिख गुरु नानक देव जी के जन्मोत्सव की बेहद खुशी और उत्साह से मनाते हैं। गुरु पर्व को गुरु नानक जयंती या गुरु नानक प्रकाशोत्सव के नाम से भी जाना जाता है। गुरु नानक जी का जन्म 547 साल पहले 15 अप्रैल, 1469 को तलवंडी में हुआ, जिसे अब ननकाना साहिब नाम से जाना जाता है। इस समय ननकाना साहिब पाकिस्तान के हिस्से वाले पंजाब में है। गुरु पर्व कार्तिक पूर्णिमा को मनाया जाता हैं। इस दिन को सिख धर्म के अनुयायी गुरु पर्व के रूप में मनाते हैं। गुरु नानक अपने व्यक्तित्व में दार्शनिक, योगी, गृहस्थ, धर्मसुधारक, समाजसुधारक, कवि, देशभक्त और विश्वबंधु – सभी के गुण समेटे हुए थे।

गुरु पर्व पर समारोह मनाने के पद्धति

गुरु पर्व या पुरु परब के 3 सप्ताह पहले से सिख धर्म के लोग भजन कीर्तन करते हुए प्रभात फेरी निकालते हैं। गुरुद्वारों में गुरुग्रंथ साहिब का अखंड पाठ होता है। गुरु पर्व के अवसर पर धर्म-ग्रंथों को सजाया व शबद-कीर्तन किया जाता है। इसके उपरांत निशान साहिब व पंच प्यारों की झांकियां निकाली जाती है तथा सामूहिक भोज अर्थात लंगर का आयोजन किया जाता है। बड़ी संख्या में लोग ननकाना साहिब मत्था टेकने जाते हैं। इस मौके पर देश के सारे गुरुद्वारे सज कर तैयार हो गए है। गुरुपर्व पर सभी गुरुद्वारों में भजन कीर्तन किया जाएगा।

गुरु नानक जी की शिक्षा

गुरु नानक देव जन्म से ही ज्ञानशील थे होने के कारण जनता की सेवा कर सदाचार अपनाने के लिए प्रेरित किया। नानकदेव जी सर्वेश्वरवादी थे। मूर्तिपूजा को उन्होंने निरर्थक माना। रूढ़ियों और कुसंस्कारों के विरोध में वे सदैव तीखे रहे। उनका मानना था कि ईश्वर का साक्षात्कार, उनके मतानुसार, बाह्य साधनों से नहीं वरन् आंतरिक साधना से संभव है। उनके दर्शन में वैराग्य तो है ही साथ ही उन्होंने तत्कालीन राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक स्थितियों पर भी नजर डाली है। संत साहित्य में नानक उन संतों की श्रेणी में हैं, जिन्होंने नारी को बड़प्पन दिया है।

इनके उपदेश का सार यही होता था कि ईश्वर एक है उसकी उपासना हिंदू मुसलमान दोनों के लिये है। मूर्तिपुजा, बहुदेवोपासना को ये अनावश्यक कहते थे। हिंदु और मुसलमान दोनों पर इनके मत का प्रभाव पड़ता था।

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First Published on November 14, 2016 5:35 am

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