ताज़ा खबर
 

संपादकीयः विवेक पर हमला

त्रकार गौरी लंकेश की हत्या से एक बार फिर देश में लोकतंत्र की बुनियाद और उसमें असहमत स्वरों की जगह को लेकर गंभीर चिंता पैदा हुई है।
Author September 7, 2017 02:22 am
पत्रकार गौरी लंकेश की अज्ञात हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी। (तस्वीर- फेसबुक)

पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या से एक बार फिर देश में लोकतंत्र की बुनियाद और उसमें असहमत स्वरों की जगह को लेकर गंभीर चिंता पैदा हुई है। गौरी लंकेश जिस तरह अपने निर्भीक लेखन और बेबाक विचारों को अभिव्यक्त करने का उदाहरण बन गई थीं, उसमें उनकी हत्या पत्रकारिता पर भी हमला है। गौरतलब है कि मंगलवार की रात आठ बजे बंगलुरु के राजराजेश्वरी नगर में उनके घर पर ही तीन लोगों ने करीब से कई गोलियां मारीं और उनकी वहीं मौत हो गई। फिलहाल यह पता नहीं चल पाया है कि हत्या के पीछे कौन लोग थे, लेकिन शुरुआती जांच के मुताबिक राज्य के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कहा कि गौरी लंकेश की हत्या में भी ऐसे ही हथियार का इस्तेमाल किया गया, जिनसे गोविंद पानसरे, एमएम कलबुर्गी और नरेंद्र दाभोलकर की हत्या की गई थी। अब चूंकि इस घटना से समूचे देश में विरोध के स्वर मुखर हो रहे हैं, इसलिए मामले की जांच के लिए विशेष टीमों का गठन कर दिया गया है और असलियत जांच के बाद ही सामने आएगी। लेकिन जो तथ्य सामने आ रहे हैं, उनसे यही संकेत उभर रहे हैं कि गौरी लंकेश की हत्या में कट्टरपंथी तत्त्वों का हाथ हो सकता है।

गौरी एक साप्ताहिक ‘लंकेश पत्रिके’ की संपादक थीं और आमतौर पर इसे जनता के पक्ष में व्यवस्था विरोधी स्वर के रूप में देखा जाता रहा है। कर्नाटक में सांप्रदायिक राजनीति और उसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका के खिलाफ गौरी ने लगातार लिखा। उसके चलते वे पहले ही कुछ लोगों और समूहों के निशाने पर थीं और उन्हें कई बार धमकियां भी मिल चुकी थीं। लेकिन उन्होंने बिना डरे अपनी पत्रिका में लिखना और सांप्रदायिकता के खिलाफ बोलना जारी रखा। उनकी आलोचना के घेरे में मुख्य रूप से केंद्र सरकार और भाजपा की नीतियां थीं। जाति-व्यवस्था के अन्याय और स्त्री से जुड़े सवालों सहित वे देश में जिस तरह सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर मुखर और सक्रिय थीं, उससे स्वाभाविक ही उन लोगों या समूहों के रास्ते में बाधा पहुंच रही थी जो केवल समाज को बांटने की राजनीति करते हैं। यों गौरी लंकेश के पहले कर्नाटक में ही सांप्रदायिकता और अंधविश्वासों के विरुद्ध जमीनी स्तर पर काम करने की वजह से तर्कवादी एमएम कलबुर्गी की हत्या की जा चुकी है।

इसी तरह के काम के लिए महाराष्ट्र में नरेंद्र दाभोलकर और गोविंद पानसरे की भी हत्या कर दी गई थी। दरअसल, कट्टरपंथ और नफरत की राजनीति के बूते जिंदा रहने वाले समूहों के सामने वैसे ही लोग चुनौती होते हैं जो साधारण लोगों को उनकी हकीकत बताने की हिम्मत करते हैं।
गौरी लंकेश की हत्या इसलिए भी समूचे देश और किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए चिंता की बात होनी चाहिए कि अखबार-पत्रिका या कोई भी समाचार माध्यम सच को सामने लाने का जरिया होते हैं। इसके जरिए उठे सवालों को दफन करने की कोशिश किसी भी समाज के प्रगतिशील मूल्यों और सभ्य विचारों पर हमला है। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे और एमएम कलबुर्गी की तरह गौरी लंकेश की हत्या की वजहें भी एक ही प्रकृति की हैं और अब तक उन मामलों के असली अपराधियों को सजा नहीं हो सकी है। इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि असहमति की जो आवाजें विवेक की कसौटी पर किसी समाज के निर्माण की वकालत करती हैं, उन्हें ही कुछ लोग दुश्मन मान कर खत्म कर देते हैं। अगर सरकारें चाहती हैं कि नफरत और हिंसा के प्रतिगामी मूल्यों की राजनीति से देश और समाज को बचाया जाए तो इनके वास्तविक दोषियों को जल्दी सजा के मुकाम तक पहुंचाने की जरूरत है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग