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अंधेरे में अंताक्षरीः प्रेम रंजन अनिमेष हिंदी कविता के सर्वाधिक संभावनाशील और सशक्त हस्ताक्षरों में उल्लेखनीय हैं। उनकी कविता से गुजरना हर बार एक अभिनव अनुभव होता है, क्योंकि वे हमेशा लीक से हट कर कुछ नया रचते हैं। प्रस्तुत संग्रह भी कवि की कविता के विस्तृत वितान की एक और बानगी सामने रखता है। मानवीय […]
Author December 4, 2016 06:41 am

अंधेरे में अंताक्षरीः प्रेम रंजन अनिमेष हिंदी कविता के सर्वाधिक संभावनाशील और सशक्त हस्ताक्षरों में उल्लेखनीय हैं। उनकी कविता से गुजरना हर बार एक अभिनव अनुभव होता है, क्योंकि वे हमेशा लीक से हट कर कुछ नया रचते हैं। प्रस्तुत संग्रह भी कवि की कविता के विस्तृत वितान की एक और बानगी सामने रखता है। मानवीय संबंधों का जीवंत राग है इन कविताओं में (‘मां को याद है’, ‘स्त्रीगंध’, ‘और सब’, ‘चौखट पर अजनबी पवाइयां’) और अमानवीय होती जा रही सभ्यता की सूक्ष्म पड़ताल (‘खुदकही’, ‘लिफ्टमैन’, ‘कबाड़ वाला आदमी’)। खिचड़ी, अंगोछा और जूट के बारे में भी मानवीय ऊष्मा से सजीव, सप्राण होकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। अनिमेष के काव्य संसार में जहां बच्चों की किलक सदृश खुशनुमा ताजगी है और भीतर तक झकझोरने वाला करुण आर्तनाद भी। साथ ही ‘आंख आना’ और ‘घुटे हुए सिर पर कुछ पंक्तियां’ की तरह वह विडंबनाबोध और व्यंजना, जो अनिमेष की एक और खूबी है। हमारे करीब से कोई मामूली-सी लगने वाली कोई चीज लेकर अनिमेष अपनी कविता में इस तरह रचते हैं, जैसे हम उसे पहली बार देख रहे हों। उनकी यही प्रतिभा ‘सीटी बजाना’ और ‘देखना-चुनना’ जैसी कविताएं संभव करती हैं, जो समकालीन सृजनशीलता का असाधारण उदाहरण है।

प्रेम रंजन अनिमेष; प्रकाशन संस्थान, 4268-बी/3, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली; 250 रुपए।

लड़कियों वाला घर: सुभाष नीरव मानवीय संवेदनाओं के कथाकार हैं। उनके संग्रह ‘लड़कियों वाला घर’ की कहानियां अपने समय के सामाजिक सरोकारों से जूझती हैं। अपने परिवेश के प्रति सजगता इनकी हर कहानी में देखी जा सकती है, जो प्रशंसनीय है। वृद्धावस्था का अकेलापन और उसकी दयनीय स्थितियों, बेकारी, आर्थिक विषमताएं, पारस्परिक रिश्तों की टूटन, राजनीतिक व्यवस्था का मलिन चरित्र आदि इनकी कहानियों के विषय रहे हैं। इन कहानियों में दिखने वाले चेहरे हमारी अपनी जमीन और हमारे बहुत करीबी परिवेश के जीते-जागते चेहरे हैं। कहानियां बगैर किसी भूमिका के सीधे-सीधे पाठक से मुखातिब होती हैं और पाठक को अपनी शुरुआत से ही गिरफ्त में लेने लगती हैं। सबसे बड़ी बीत यह कि नीरव की सभी कहानियां बोद्धिकता से कोसों दूर और बेहद पठनीय हैं। लेखक का अपना मानना भी है कि साहित्य में लेखक के अपने सरोकार और उसकी पक्षधरता पाठक को तभी मालूम हो सकेगी जब पाठक कहानी को पूरी तल्लीनता से पूरा पढ़ सकने की स्थिति में होगा। यानी कहानियों में खुद को पाठक से पढ़वा लेने की शक्ति का होना बेहद जरूरी है। यही कारण है कि लेखक पठनीयता के गुण को पहली शर्त मान कर चलता है।

सुभाष नीरव; अमन प्रकाशन, 104 ए/ 80 सी, रामबाग, कानपुर; 95 रुपए।

दावतः अजान की आवाज कहानी संग्रह के बाद लगभग एक दशक के अंतराल पर मेराज अहमद का दूसरा संग्रह ‘न घर के न घाट के’ आया था। उसके बाद यह संग्रह आया है। प्रस्तुत संग्रह पिछले लगभग दस वर्षों में लिखी ऐसी कहानियों का संकलन है, जो समय-समय पर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाश्ति होती रही हैं। उत्तर भारतीय ग्रामीण जीवन में बहुसंख्यक वर्ग के समांतर ही अल्पसंख्यक वर्ग के मुसलिम समाज की भी यहां की सामाजिक संरचना में महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। विडंबना यह है कि प्रगति और विकास के तमाम दावों के बावजूद उनकी हैसियत कम से कमतर होती जा रही है। वर्तमान में मुसलिम समाज की सामाजिक और आर्थिक दोनों स्थितियां ऐसी हैं कि उन्हें हाशिए के बाहर भी स्थान मिलता नहीं दिखता है। संग्रह की कुछ कहानियां ऐसे ही मुसलिम समाज की दयनीय स्थिति और उसे बढ़ाती उनकी जटिल सामाजिक संरचना के उन अनछुए पहलुओं को सामने लाती हैं, जिन पर विचार करने की महती आवश्यकता है। कहानीकार ने न केवल उन पक्षों को विषय-वस्तु के रूप में ग्रहण किया है, बल्कि उनकी गहराई में भी जाकर देखने का प्रयत्न किया है। संग्रह की दूसरी कहानियां ऐसी हैं जो वृहत्तर भारतीय समाज के नकारात्मक और सकारात्मक दोनों ही आयामों को सहज शैली में ग्रहण किए गए पात्रों और चरित्रों को स्वाभाविक भाषा में प्रस्तुत करते हुए संवाद स्थापित करती हैं।
दावत: मेराज अहमद; वांङमय बुक्स, 205, अहमद रेजीडेंसी, मिल्लत कॉलोनी, दोदपुर रोड, अलीगढ़; 140 रुपए।

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