December 08, 2016

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विभाजन के दंश का मार्मिक फिल्मांकन

गौतम घोष उन गिने-चुने भारतीय फिल्मकारों में हैं जिनकी फिल्मों को अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिलती रही है।

Author November 23, 2016 05:25 am
फिल्म का दृश्य ।

गौतम घोष उन गिने-चुने भारतीय फिल्मकारों में हैं जिनकी फिल्मों को अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिलती रही है। भारतीय पैनोरामा में दिखाई गई उनकी नई फिल्म ‘शंखचील’ भारत के विभाजन के दंश की कभी न खत्म होनेवाली कविता की तरह है। भारत-बांग्लादेश के सहयोग से बनी इस फिल्म के कई दृश्य कविता की तरह करुणा की शोकांतिका में बदल जाते हैं। देशों की सीमाओं से परे जाकर मानवीय रिश्तों की डोर अभी भी बंगाल को बांधे हुए है। फिल्म में एक भी खलनायक नहीं है पर नियति की मार के आगे दोनों देशों की जनता लाचार है।
गौतम घोष की यह फिल्म उनके सशक्त छायांकन से बनी दार्शनिक सिने-भाषा के कारण देखी जानी चाहिए जिसका हर दृश्य बिना कुछ कहे भी बहुत कुछ कह जाता है। भारत बांग्लादेश की सीमा पर सतखीरा जिले के एक छोटे से गांव में मुंतसिर चौधरी बादल (प्रसेनजीत चटर्जी) और उसकी पत्नी लैला चौधरी (कुसुम सिकदर)अपनी बारह साल की बेटी रूपशा (शाजवती) की दिल की बीमारी से परेशान रहते हैं। बादल एक स्कूल मास्टर है। वह किसी तरह अपनी बेटी को बचाना चाहता है। उसके सामने दुविधा है कि वह ढाका जाए जो वहां से बहुत दूर है या इच्छामती नदी पार कर भारत में रूपशा का इलाज कराए।

एक दिन जब रूपशा की हालत इतनी बिगड़ जाती है कि उसे अस्पताल मे भर्ती करने के सिवा कोई विकल्प नहीं बचता तो बादल लैला के साथ अपना देश धर्म नाम बदलकर नकली पहचान पत्र के साथ सीमा पार कर जाता है। कोलकाता के एक निजी अस्पताल में रूपशा को भर्ती करने के बाद उसके दिल के आपरेशन की तैयारी चल रही है। जिस सुबह उसका आपरेशन होना है उसी रात वह मर जाती है। चूंकि वह हिंदू के पहचान पत्र से भर्ती हुई है इसलिए उसके शव को श्मशान ले जाया जाएगा। कशमकश यह है कि यदि बाबुल अपनी पहचान उजागर करता है तो उसपर गैर कानूनी रूप से सीमा पार करने का मुकदमा चलेगा। बाबुल रोते हुए पुलिस अफसर से गुजारिश करता है कि उसकी बेटी के शव को मुसलिम धर्म के अनुसार उसके गांव में दफनाया जाए। भले ही उसे फांसी पर चढ़ा दिया जाए। कानूनी कार्रवाई के बाद बीएसएफ के जवान उसके शव को बांग्लादेश की सेना को सौपते हैं। यह भी विडंबना है कि रूपशा के शव को बांग्लादेश पुलिस को सौंपने की जिम्मेदारी बीएसएफ के उसी अफसर को दी जाती है जो सीमा पर रूपशा को बेटी की तरह प्यार करता था। अंतिम दृश्य में गांव में रूपशा को दफनाया जा रहा है तो उधर कोलकाता पुलिस बादल और लैला को जेल ले जा रही है और एक विशाल शंखचील उनके घर के पेड़ पर बैठी सबको घूर रही है।

विभाजन पर यह पहली फिल्म है जिसमें बिना किसी प्रकट हिंसा के नियति की मार झेलते लोग हैं। भारत बांग्लादेश सीमा पर बसे लोगों का भाईचारा है। इच्छामती नदी ही उनका देश है। भारत-पाकिस्तान के विभाजन पर तो कई फिल्में बनी हैं पर बांग्लादेश की ओर हमारा ध्यान कम ही जाता है। अस्सी नब्बे के दशक में बंगाली सिनेमा पर राज करनेवाले प्रसेनजीत चटर्जी का अभिनय हमें अपने साथ साथ बहा ले जाता है। उनका लाचार होकर निहारना, उनकी मुस्कुराहट और उनकी करूणा से भरी आंखें शब्दों से ज्यादा बोलती हैं। बांग्लादेश की कुसुम सिकदर के साथ उनकी कैमिस्ट्री असर करती है। रूपशा की भूमिका में शाजवती ने पूरी फिल्म को बांधे रखा है। कैमरा इच्छामती नदी और वहां के बाशिंदों की दिनचर्या को पूरी तन्मयता से दिखाता है कि हम एक- एक अंश को जी रहे होते हैं। पूरी फिल्म में तलछट के जीवन का धूसर रंग छाया हुआ है। यहां कोई नकली चमक-दमक नहीं है पर हर दृश्य में पेंटिंग सी सुंदरता है। ऋत्विक घटक के मेघे ढाका तारा के बाद गौतम घोष ने शंखचील में बांग्लादेश का अनकहा यथार्थ फिल्माया है। उनकी पिछली फिल्म मोनेर मानुष भी लालन फकीर के बहाने बांग्लादेश ले जाती है पर तब वह भारत का ही हिस्सा था। घटक जहां नॉस्टेल्जिक हैं वहीं घोष यथार्थवादी हैं और इतिहास की पृष्ठभूमि में आज की कहानी कहते हैं।

 

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First Published on November 23, 2016 5:10 am

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