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संपादकीयः ट्रंप का निशाना

एक हफ्ते के भीतर अमेरिका का यह दूसरा हमला है।
Author April 15, 2017 04:27 am
अफगानिस्तान में हुए आतंकी ठिकानों पर हुए हमले को लेकर ट्रंप ने की अमेरिकी सेना की तारीफ

एक हफ्ते के भीतर अमेरिका का यह दूसरा हमला है। कुछ दिन पहले उसने रासायनिक हथियार इस्तेमाल किए जाने के आरोप में सीरिया के एक हवाई ठिकाने पर उनसठ टॉमहॉक मिसाइलें दागी थीं। अब दूसरी कार्रवाई उसने अफगानिस्तान के नांगरहार प्रांत के अचिन जिले में की है। अमेरिका का दावा है कि यह कार्रवाई आइएस के आतंकी ठिकाने को नष्ट करने के लिए की गई और इसमें कोई छत्तीस आतंकी मारे गए। इसी इलाके में कुछ दिन पहले एक अमेरिकी सैनिक आइएस के खिलाफ सैन्य अभियान के दौरान मारा गया था। मात्र एक सैनिक की मौत का बदला लेने के लिए अमेरिका ने इतनी बड़ी कार्रवाई का फैसला नहीं किया होगा। फिर, अफगानिस्तान में आइएस पैर पसारने में लगा हुआ है और वहां उसने कहां ठिकाने बना रखे हैं, इसकी खुफिया जानकारी अमेरिकी रक्षा विभाग को बहुत पहले से रही होगी, क्योंकि अफगानिस्तान में अमेरिका प्रत्यक्ष रूप से भी मौजूद है और वहां उसकी सरपरस्ती में चलने वाली सरकार है। तब क्या कारण है कि आइएस के खिलाफ इतना बड़ा कदम पहले नहीं उठाया गया।

दरअसल, ताजा कार्रवाई को अमेरिका की कमान डोनाल्ड ट्रंप के हाथ में आने से भी जोड़ कर देखा जा रहा है, जो कि स्वाभाविक है। यों ट्रंप ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान ऐसा आभास दिया था कि उनकी दिलचस्पी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उलझने के बजाय अमेरिका की घरेलू अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में अधिक है। पर आइएस को नेस्तनाबूद करने का इरादा भी वे जताते रहे। और आखिरकार अफगानिस्तान में आइएस के ठिकाने पर अमेरिकी वायुसेना ने एमओएबी यानी मैसिव आर्डिनेंस एअर ब्लास्ट नामक बम गिराया, जिसे मदर आॅफ आॅल बम यानी बमों का बम भी कहा जाता है। इस बम के इस्तेमाल के कारण ही ताजा कार्रवाई को अपूर्व माना जा रहा है, वरना आतंकवाद-विरोधी अमेरिकी कार्रवाई के ढेर उदाहरण दिए जा सकते हैं। सवाल उठता है कि क्या अफगानिस्तान में मौजूद अपने सैनिकों और अफगान सुरक्षा बलों के सहारे आइएस के पैर नहीं उखाड़े जा सकते थे? हवाई कार्रवाई और सबसे बड़े गैर-परमाणु बम के इस्तेमाल के पीछे कहीं कोई और मंशा तो नहीं है? यों ट्रंप ने कहा तो यह है कि इस कार्रवाई को उत्तर कोरिया को संदेश की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। पर उत्तर कोरिया का जिक्र करना ही यह इशारा देना है कि उसे चेत जाना चाहिए। फिर, यह कार्रवाई ऐसे समय हुई है जब कुछ दिनों से यह आशंका जताई जाती रही है कि उत्तर कोरिया फिर से परमाणु परीक्षण कर सकता है।

ग्यारह टन विस्फोटकों वाला बम जहां गिरा, वह अफगानिस्तान का पाकिस्तान से लगा हुआ इलाका है। इसलिए इस कार्रवाई को पाकिस्तान के लिए भी चेतावनी के तौर पर देखा जा रहा है। लेकिन सीरिया पर मिसाइलों से किए गए हमले ने जहां रूस को नाराज कर दिया है, वहीं अफगानिस्तान में की गई इस कार्रवाई की मुखालफत खुद वहां के राष्ट्रपति और अमेरिका के चहेते रह चुके हामिद करजई ने की है। करजई ने यह तक कहा है कि यह आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई नहीं है, बल्कि अमेरिका अफगानिस्तान का इस्तेमाल अपने भयानक हथियारों के परीक्षण स्थल के तौर पर कर रहा है। असल में आइएस के खिलाफ सख्त रुख के तौर पर अमेरिकी सेना की इस कार्रवाई की सराहना भले हुई हो, पर ट्रंप के अस्थिर मिजाज को देखते हुए यह अंदेशा भी जताया जा रहा है कि कहीं उनके फैसले अमेरिका और बाकी दुनिया के लिए भी बहुत जोखिम-भरे न साबित हों।

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