December 05, 2016

ताज़ा खबर

 

संपादकीयः कलह और सुलह

उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ दिनों से समाजवादी पार्टी के भीतर जिस तरह की उठापटक चल रही थी, उससे कयास लगाए जाने लगे थे कि अब सपा शायद विभाजन की ओर बढ़ रही है।

Author November 4, 2016 02:33 am

उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ दिनों से समाजवादी पार्टी के भीतर जिस तरह की उठापटक चल रही थी, उससे कयास लगाए जाने लगे थे कि अब सपा शायद विभाजन की ओर बढ़ रही है। यहां तक कि पिता और पुत्र यानी सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव और राज्य के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के बीच जिस तरह की तल्खी सार्वजनिक रूप से देखने में आई थी, उसने राजनीतिक विश्लेषकों तक को हैरान किया था। लेकिन लखनऊ में जब अखिलेश यादव की रथयात्रा शुरू हुई तो उसे खुद मुलायम सिंह ने हरी झंडी दिखाई। यही नहीं, शिवपाल सिंह यादव भी इस कार्यक्रम में शामिल हुए और भतीजे को शुभकामना दी। जबकि शिवपाल और उनके कुछ नजदीकी सहयोगियों को जिस तरह अखिलेश यादव ने कैबिनेट से निकाल दिया था और वार-पलटवार का खेल शुरू हुआ था, उसमें इतनी जल्दी सब कुछ ठीक होने के आसार कम ही थे। तो क्या पार्टी के भीतर जारी पारिवारिक टकराव अब सुलह के रास्ते पर है?


संभव है कि यह निष्कर्ष अभी जल्दबाजी हो। मगर इस रथयात्रा की शुरुआत के साथ सपा की ओर से यह संदेश देने की कोशिश तो की ही गई है कि पार्टी की नजर अब विधानसभा चुनावों पर है। राज्य में विधानसभा चुनावों में अब ज्यादा वक्त नहीं बचा है। ऐसे में पार्टी के अंदरूनी कलह से नुकसान जितना अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के लिए लड़ने वाले नेताओं को होता, उससे ज्यादा यह स्थिति समूची पार्टी के अस्तित्व पर असर डालती। शायद यही वजह है कि पार्टी नेताओं ने सुलह के संकेत दिए हैं, ताकि अपने समर्थकों को एकजुट करने में मदद मिले। हालांकि यह कहना मुश्किल है कि अखिलेश यादव और शिवपाल सिंह यादव के बीच तनातनी जिस स्तर तक पहुंच गई थी, उसमें यह सद्भावना कब तक बनी रहेगी। रथयात्रा की शुरुआत में मंच पर मुख्यमंत्री ने पिता मुलायम सिंह का नाम कई बार लिया, लेकिन चाचा शिवपाल का नाम लेने से बचे; रथ की तस्वीरों में पिता मौजूद थे, चाचा गायब थे, उससे साफ है कि बर्फ अभी पूरी तरह पिघली नहीं है।

 

दरअसल, उत्तर प्रदेश में फिलहाल जो राजनीतिक समीकरण हैं, उनमें विधानसभा चुनावों के लिए सपा का किसी दूसरी पार्टी से गठबंधन नहीं होता है तो उसकी सत्ता के सामने कई गंभीर चुनौतियां हैं। भाजपा ने जिस आक्रामक तेवर के साथ अनौपचारिक रूप से प्रचार अभियान शुरू कर दिया है, बसपा ने अपनी शांत शैली में चुनावी तैयारियां शुरू कर दी हैं, उसमें अपने आधार मतों को बचाने के लिए भी सपा को पहले के मुकाबले अब ज्यादा मशक्कत करनी पड़ेगी। खासतौर पर मुसलिम समुदाय के बीच भाजपा को लेकर क्या राय है, यह छिपा नहीं है। ऐसे में जो भी पार्टी भाजपा को मजबूत चुनौती देती दिखेगी, मुसलिम समुदाय के मत भी उस ओर झुकेंगे। यह स्थिति इसलिए भी सामने आई कि मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान और उसके बाद की स्थिति में मुसलिम समुदाय को मौजूदा राज्य सरकार से कई शिकायतें रहीं। इसके अलावा, समाज के दूसरे तबकों के बीच भी पार्टी की एकजुटता का संदेश देने की कोशिश की गई है तो उसका मकसद भी चुनावों के मद्देनजर अपनी विश्वसनीयता को मजबूत करना ही है। अब देखना है कि बीते दिनों तीखे पारिवारिक टकराव और उथल-पुथल के दौर से गुजर कर विकास से विजय के नारे के साथ रथयात्रा तक पहुंची सपा आने वाले राजनीतिक उतार-चढ़ाव का सामना कैसे करती है!

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

First Published on November 4, 2016 2:32 am

सबरंग