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संपादकीयः हौसले की छलांग

यह सही है कि रियो डि जेनेरियो ओलंपिक के जिम्नास्टिक का फाइनल अभी बाकी है, लेकिन दीपा कर्मकार के वहां तक पहुंचने के लिहाज से देखें तो भारत के लिए बेशक यह ऐतिहासिक अवसर है।
Author August 10, 2016 03:06 am
दीपा करमाकर।

यह सही है कि रियो डि जेनेरियो ओलंपिक के जिम्नास्टिक का फाइनल अभी बाकी है, लेकिन दीपा कर्मकार के वहां तक पहुंचने के लिहाज से देखें तो भारत के लिए बेशक यह ऐतिहासिक अवसर है। अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में भारत के प्रदर्शन का अब तक जो रिकार्ड रहा है, उसमें किसी खिलाड़ी के फाइनल में पहुंचने का अपना महत्त्व है। दीपा कर्मकार ने भारत को एक ऐसी ही खुशी और उम्मीद दी है। अपने कोच विश्वेश्वर नंदी के मार्ग-निर्देशन में दीपा का यहां तक का सफर उनकी मेहनत, लगन और कड़े अभ्यास का नतीजा है। 2007 के राष्ट्रीय खेलों में शानदार प्रदर्शन के दौरान जब लोगों का ध्यान उनकी ओर गया, उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा और आज वे सबसे अव्वल रहने से बस एक कदम दूर हैं। इससे पहले 2014 में ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों के अलावा 2015 में हिरोशिमा में आयोजित एशियाई चैंपियनशिप में भी उन्होंने कांस्य पदक जीता था।

मगर पिछले साल विश्व प्रतियोगिता में उन्होंने जिम्नास्टिक के सबसे चुनौतीपूर्ण प्रोडुनोवा वॉल्ट पर कामयाब प्रदर्शन करके आखिरी पांच में जगह बनाई, तभी अंतरराष्ट्रीय जिम्नास्टिक संघ ने उन्हें विश्वस्तरीय जिम्नास्ट की श्रेणी में रखा था। रियो ओलंपिक में भी फाइनल में पहुंचने में प्रोडुनोवा वॉल्ट पर उनके शानदार प्रदर्शन ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई। बावन साल के बाद पहली बार भारत के किसी जिम्नास्ट का ओलंपिक में हिस्सा लेना और फाइनल तक पहुंचना एक ऐतिहासिक मौका है।

दीपा की इस उपलब्धि का महत्त्व तब और बढ़ जाता है जब उनके शुरुआती दिनों, उनके पास संसाधनों के अभाव और कई तरह की बाधाओं को पार करने के तथ्य सामने आते हैं। दीपा ने अपने खेल जीवन में पहली बार जब जिम्नास्टिक प्रतियोगिता में भाग लिया था, तब उनके पास न जूते थे और न जरूरी कॉस्ट्यूम। उन्होंने कहीं से जो उधार कॉस्ट्यूम लिया था, वह उन्हें पूरी तरह फिट भी नहीं हो रहा था। लेकिन चुनौतियों का सामना करते हुए आज उन्होंने साबित किया है कि धुन, जुनून और हौसला हो, तो बड़ी-बड़ी बाधाएं पार की जा सकती हैं। क्रिकेट जैसे खेलों के लिए जो उत्साह दिखाया जाता है, वह दूसरे खेलों को नहीं मिल पाता है।

यह बेवजह नहीं है कि ज्यादातर अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में भारतीय खिलाड़ी हिस्सा लेने जाते तो हैं, मगर वह एक तरह से भागीदारी की औपचारिकता निबाहने भर के लिए होता है। कभी-कभी कोई उपलब्धि मिल जाती है तो उससे ही संतोष कर लिया जाता है। हालांकि खेल प्रतियोगिताओं में हार और जीत का महत्त्व इसी बात में है कि किसी खिलाड़ी ने जीतने में कोई कसर नहीं छोड़ी। लेकिन सच यही है कि यादगार उपलब्धियां देश के हिस्से कम ही आई हैं।

दीपा कर्मकार की अब तक की कामयाबी यह भी बताती है कि अगर प्रतिभाओं की खोज में ईमानदारी बरती जाए और उन्हें उचित प्रशिक्षण और संसाधन मुहैया कराए जाएं तो अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत को निराश नहीं होना पड़ेगा। खासतौर पर दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में बहुत क्षमताओं वाली खेल प्रतिभाएं अभाव के बीच जीते हुए और मार्गदर्शन के बिना अपनी संभावनाएं विकसित नहीं कर पाती हैं या गुमनाम हो जाती हैं। अगर इस ओर थोड़ा ध्यान दिया जाए तो तस्वीर काफी बेहतर हो सकती है। गाहे-बगाहे यह साबित भी होता रहा है। दीपा कर्मकार इसी का मिसाल हैं।

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