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बेबाक बोल- संविधान एक खोज, सत्ता का सत्य

फेडरिक नीत्शे ने लिखा है कि सत्य नहीं होते, सिर्फ व्याख्याएं होती हैं। वे एक जगह यह भी कहते हैं कि सभी चीजों की व्याख्या संभव है। किसी खास समय में जो व्याख्या प्रचलित होगी, उसका संबंध सत्ता से है, सत्य से नहीं।

आजादी के बाद का इतिहास गवाह है कि जब-जब पूर्ण बहुमत की मजबूत सरकार केंद्र में आई है उसने राज्यों की चुनी हुई हर उस सरकार पर हमला किया है जो उसके खेमे की नहीं है। जनता के द्वारा चुनी हुई केंद्र सरकार राज्यों की जनता के द्वारा ही चुनी गई सरकार को सत्ता से बेदखल करती रही है। और इसके लिए सहारा लिया जाता रहा है अनुच्छेद 356 का। हालांकि नब्बे के दशक के बाद जब गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ तो राज्यों में राष्ट्रपति शासन थोपने की प्रवृत्ति पर कुछ लगाम लगा। अब कांग्रेस के बरक्स भगवा खेमा पूर्ण बहुमत में है। कांग्रेसमुक्त भारत का सपना पूरा करने के लिए 356 का ब्रह्मास्त्र उसके हाथ में है और कांग्रेस के मुंह पर संविधान की दुहाई। सत्ता और संविधान के इसी समीकरण पर पढ़ें इस बार का बेबाक बोल।

फेडरिक नीत्शे ने लिखा है कि सत्य नहीं होते, सिर्फ व्याख्याएं होती हैं। वे एक जगह यह भी कहते हैं कि सभी चीजों की व्याख्या संभव है। किसी खास समय में जो व्याख्या प्रचलित होगी, उसका संबंध सत्ता से है, सत्य से नहीं।
नीत्शे के इस कथन के साथ यहां पर हम संविधान निर्माता डॉक्टर भीमराव आंबेडकर के एक कथन को भी उद्धृत करना चाहते हैं जो उन्होंने अनुच्छेद 356 को लेकर कही थी। आंबेडकर ने कहा था, ‘हम यह आशा करते हैं कि इन अनुच्छेदों के प्रयोग की आवश्यकता नहीं पड़ेगी और ये संविधान की किताब में ही बने रहेंगे। अगर कभी इन्हें अमल में लाया जाता है तो मैं आशा करता हूं कि राष्टÑपति किसी प्रांत के प्रशासन को निलंबित करने के पहले सभी उचित सावधानी बरतेंगे’।
इन दो उद्धरणों से हम सत्ता से संविधान के सत्य को भी समझ सकेंगे। हमारा देश इसका गवाह रहा है कि संविधान के प्रावधानों को सत्ता ने अपनी समझ और सुविधा के अनुसार या अनुकूल सच बनाने की कोशिश की है। और इस सच को समझने के लिए सबसे मौजू है अनुच्छेद 356 की व्याख्या।
जिस शक्ति को आबंडेकर पन्नों में ही कैद रखना चाहते थे, उसका पहला इस्तेमाल नेहरू सरकार ने केरल की ईएमएस नंबुदरीपाद की सरकार को बर्खास्त करने के लिए किया था। तत्कालीन राज्यपाल बुरगुला रामाकृष्णा राव ने पूर्ण बहुमत की सूबे की सरकार को बर्खास्त करने की सिफारिश कर दी थी। यह भी ध्यान देने की बात है कि इस फैसले तक कांग्रेस अध्यक्ष बन चुकीं इंदिरा गांधी का सियासत में दखल बढ़ चुका था। पिता के शासनकाल में इसका पहला इस्तेमाल हुआ और विरासत में सत्ता मिलने के बाद पुत्री ने इस हथियार का इस्तेमाल लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई राज्य सरकारों की हत्या करने के लिए बार-बार किया। इंदिरा गांधी ने अपने पूरे शासनकाल में इसका पचास बार इस्तेमाल किया।
लेकिन लंबे समय तक सत्ता और संविधान की व्याख्या अपनी तरह से और अपने हित में करने वाली कांग्रेस का भी वक्त आया, जब देश में एक ध्रुव यानी कांग्रेस की ओर झुकी हुई राजनीति के बरक्स भाजपा एक मजबूत ध्रुव के तौर पर खड़ी है, तब संविधान में दर्ज अधिकारों के इस्तेमाल के अपने परिप्रेक्ष्य घोषित किए जा रहे हैं। उसे सही ठहराने के अपनी राजनीतिक सुविधा के हिसाब से दलीलें भी पेश की जा रही हैं।
बहरहाल, करीब दो साल पहले कांग्रेस सरकार को मोदी की अगुआई में राजग ने उखाड़ फेंका और उसके बाद मोदी ने कांग्रेस-मुक्त भारत का नारा भी दिया। अब अनुच्छेद 356 यानी राष्टÑपति शासन का ‘कांग्रेस का ब्रह्मास्त्र’ भाजपा के हाथ में है और भाजपा की ‘संविधान की दुहाई’ कांग्रेस के मुंह पर। आज हालत यह है कि सत्ता में आने के दो साल के भीतर भाजपा इस रास्ते अरुणाचल प्रदेश में अपनी पसंद की सरकार बनवा चुकी है। अरुण जेटली कहते हैं कि उत्तराखंड में 356 लगाने का यह सबसे उचित समय है। अब 356 का सत्य और इसकी व्याख्या फिलहाल भगवा खेमे में है।

इसी आलोक में उत्तराखंड में जो हुआ, अब इतिहास है। अब सबकी नजर इसी सवाल पर है कि आगे क्या होगा! देश में चुनी हुई सरकारों के बीच ऐसी अस्थिरता कोई नई बात नहीं। आखिर याद किया जा सकता है कि इसी कारण से हरियाणा के एक विधायक के एक ही दिन में तीन बार पाला बदलने के कारण सरकार गिरती-पड़ती रही और ‘आया राम, गया राम’ के मुहावरे का दलबदल के संदर्भ में इस्तेमाल शुरू हुआ। इसकी एक कहानी है।

हालांकि यह चलन आजादी के कुछ समय बाद शुरू हो गया था, लेकिन इसका चरमोत्कर्ष 1967 में सामने आया, जब हरियाणा के हसनपुर विधानसभा क्षेत्र के सदस्य गया राम ने दो हफ्ते के अंदर तीन बार अपनी पार्टी बदल ली। कांग्रेस से चुने गए गया राम पहले युनाइटेड फ्रंट में शामिल हुए। फिर कांग्रेस में वापस आए और फिर युनाइटेड फ्रंट में चले गए। यह सब महज पंद्रह दिनों के भीतर हुआ।
फिर गया राम जब कांग्रेस में लौटे तो कांग्रेस नेता राव बीरेंद्र सिंह चंडीगढ़ में उन्हें पत्रकारों के सामने लाए और घोषणा की कि ‘गया राम अब आया राम’ हैं। बस यहीं से ‘आया राम, गया राम’ दलबदलुओं की पहचान बन गई।

जहां तक उत्तराखंड की बात है तो मौजूदा परिदृश्य में कह सकते हैं कि वहां भी ‘आया राम, गया राम’ का खेल चल रहा है। हालांकि 1985 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के सदन में लाए गए दलबदल विरोधी कानून के कारण अब यह इतना भी आसान नहीं कि कोई एक या दो व्यक्ति सरकार गिरा दे। कानून के प्रावधानों के कारण अब सरकारों को बनाने या पटकने में बड़ी कोशिश की दरकार है। उत्तराखंड में बागी कांग्रेस विधायकों ने जो किया, उसने मुख्यमंत्री हरीश रावत की चुनी हुई सरकार पर आफत खड़ी कर दी।

रावत के कथित ‘एकाधिकारी शासन’ को लेकर उनकी अपनी ही पार्टी के अंदर-बाहर सुगबुगाहट होती रहती थी। कभी भी ऐसा नहीं लगा कि इससे सरकार पर कोई संकट खड़ा हो जाएगा। लेकिन आखिर हरक सिंह रावत और विजय बहुगुणा ने यह सब अकस्मात ही कर दिखाया। उसके बाद सब कुछ जाना-पहचाना ही है। बागियों का शहर छोड़ कर निकल जाना, सरकार पर वार करना। बहुमत का सवाल खड़ा करना और फिर पार्टी की केंद्रीय इकाइयों की अपनी क्रिया-प्रतिक्रिया और चाल-कुचाल के लिए प्रेरित करना। विधानसभा में बागी राज्य की सरकार को विश्वास मत हासिल करने को कह रहे थे। सरकार खुद को बचाने की हरसंभव कोशिश में जुटी थी। तारीख भी तय थी 28 मार्च।

लेकिन इसके ठीक एक दिन पहले केंद्र ने हरीश रावत सरकार को बर्खास्त कर दिया। प्रदेश में राष्टÑपति शासन लागू हो गया। राजनीतिक गलियारों में हाहाकार मच गया, लेकिन केंद्र अपने फैसले पर कायम रहा। दोनों प्रमुख पार्टियां कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी हालात को अपने तरीके से परिभाषित करती रहीं। लेकिन इसी रोज विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल ने कांग्रेस के नौ बागी विधायकों की मान्यता दलबदल कानून के तहत रद्द कर दी। अपेक्षा के अनुसार ही मामला अदालत की देहरी पर पहुंच गया। और अब फैसले के लिए हमें 18 अप्रैल तक इंतजार करना है।

इस बीच उत्तराखंड हाई कोर्ट के एक पीठ ने सरकार को अपना बहुमत साबित करने को कहा। बर्खास्त विधायकों को भी मतदान के लिए कहा गया। लेकिन राष्टÑपति शासन लागू करने के लिए केंद्र सरकार ने फिर से न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और राहत की सांस ली, क्योंकि हाई कोर्ट के एक खंडपीठ ने पहले वाले पीठ के बहुमत साबित करने के फैसले पर रोक लगा दी।

गौरतलब है कि मौजूदा स्थिति में उत्तराखंड की 70 सदस्यीय विधानसभा की संख्या अब 61 ही मानी जाएगी। किसी भी स्थिति में अगर दुबारा बहुमत साबित करने की कोई स्थिति बनती है तो यह देखना होगा कि अयोग्य विधायकों को मताधिकार मिलता है या नहीं। बहरहाल, इस पर मंथन करना अब कानूनन दोनों दलों के कानूनविदों का काम है। लेकिन ध्यान रहे, 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने एसआर बोम्मई और केंद्र सरकार के बीच के मामले पर फैसला सुनाते हुए कहा था – ‘सभी मामलों में जहां चुनी हुई सरकार के समर्थन वापसी का कुछ सदस्यों का दावा हो, सही रास्ता यही है कि मंत्रिपरिषद की ताकत विधानसभा में तय की जाए’। अभी तक के हालात में उत्तराखंड के मामले में ऐसा कुछ दिखाई नहीं दे रहा।

यहां शक्ति परीक्षण के महज एक दिन पहले सरकार को बर्खास्तगी का मुंह देखना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट ने तो यह भी कहा कि मंत्रिपरिषद की ताकत का अनुमान किसी एक व्यक्ति विशेष का निजी विचार नहीं हो सकता।

ऐसा नहीं लगता कि उत्तराखंड के मामले में इन सबको कोई तरजीह दी गई है। यह माना जा रहा है कि उत्तराखंड में शक्ति परीक्षण विधायकों की खरीद-फरोख्त में भी परिवर्तित हो सकता था। एक पत्रकार ने तो मुख्यमंत्री का स्टिंग भी कर डाला। इससे यह तो तय हुआ कि खुद की कुर्सी सलामत रखने के लिए जनहित के लिए सुशासन के जिम्मेदार नेता अपनी ही सरकार के भ्रष्टाचार के आरोपों से मुंहमोड़ सकते हैं।
उत्तराखंड के तमाम घटनाक्रम से एक और बात भी साफ है कि जब बात सरकार को गिराने या बचाने की हो तो राजनीतिक शुचिता की दावेदार भारतीय जनता पार्टी का व्यवहार भी कुछ अलग नहीं। सरकार की बर्खास्तगी अचानक और शक्ति परीक्षण के एक दिन पहले हुई। खास बात यह है कि कांग्रेस तो इन सबके बीच ‘कांग्रेस की तरह’ ही काम कर रही थी। विधानसभा अध्यक्ष ने बागी नौ विधायकों को तब अयोग्य घोषित किया जब प्रदेश में राष्टÑपति शासन की घोषणा हो चुकी थी। अब मुद्दा यह भी है कि अगर प्रदेश में शक्ति परीक्षण की स्थिति बनती है तो क्या ये विधायक मतदान कर पाएंगे? सवाल यह भी है कि क्या प्रदेश में राष्टÑपति शासन लागू हो जाने के बाद विधानसभा अध्यक्ष को इन विधायकों को बर्खास्त करने का अधिकार था।

लेकिन शक्ति परीक्षण से महज एक ही दिन पहले राष्टÑपति शासन लगाने से एक बात तो साफ है ही कि केंद्र को कहीं न कहीं यह संदेह था कि सरकार बच जाएगी। पांच राज्यों में चुनावों के मद्देनजर कड़ी चुनौती झेल रही भारतीय जनता पार्टी को यह जरूरी लगा कि आठ में से कांग्रेस की एक सरकार अगर अस्थिर हो सके तो वह उसी में उलझ पड़ेगी। इसका असर हुआ भी। उत्तराखंड में तो जो हुआ, हिमाचल के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह भी अपनी सरकार और खुद को बचाने सीधे दिल्ली दरबार पहुंच गए। चुनाव से रूबरू पार्टी को प्रदेश की किसी भी अपनी सरकार का बड़ा सहारा रहता है। लेकिन कांग्रेस के दुर्दिनों का फेर अभी जारी ही दिखाई दे रहा है।

यह भी तय है कि अब दोनों दलों के पास खुद को बचाने-गिराने का समुचित अवसर है। देखना होगा कि कौन इसका कितना फायदा उठाता है। लेकिन चिंता का विषय यह है कि राजनीतिक स्वार्थों की सिद्धि के लिए जिस तरह से संविधान की व्यवस्थाओं को तोड़ा-मरोड़ा जाता है वह क्या उचित है? देश में अनुच्छेद 356 के उपयोग-दुरुपयोग पर बहस कोई नई नहीं और ऐसा लगता है कि यह चलती ही रहेगी। अनवरत। शायद इसलिए कि एक लोकतांत्रिक समाज बनाने और उसके बाधक तत्त्वों की पहचान करने वाली शक्तियां अपनी जिम्मेदारी भूल रही हैं। और जिम्मेदारियों को समझने के लिए उसी संविधान के चिंतन-मनन की जरूरत है जिसके जरिए हम अपने अधिकारों का बेरहम इस्तेमाल करते हैं।

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  1. S
    santosh
    Apr 17, 2016 at 3:15 pm
    भा ज प भी अब कांग्रेस हो चली है। किस कांग्रेस मुक्त भारत का सपना देखते है मोदी।
    (0)(0)
    Reply