March 28, 2017

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संपादकीयः ताज की रंगत

विश्व के सात अजूबों में शामिल प्रेम का प्रतीक ताजमहल दिनोंदिन बदरंग होता जा रहा है। अगर इससे निपटने के लिए शीघ्र इंतजाम नहीं किए गए तो वह दिन दूर नहीं जब भारत की इस ऐतिहासिक धरोहर की शान दास्तान-ए-किताब तक महदूद होकर रह जाएगी।

Author October 18, 2016 03:17 am

विश्व के सात अजूबों में शामिल प्रेम का प्रतीक ताजमहल दिनोंदिन बदरंग होता जा रहा है। अगर इससे निपटने के लिए शीघ्र इंतजाम नहीं किए गए तो वह दिन दूर नहीं जब भारत की इस ऐतिहासिक धरोहर की शान दास्तान-ए-किताब तक महदूद होकर रह जाएगी। भारत और अमेरिका के एकसंयुक्त अनुसंधान दल ने पाया है कि यह विश्व धरोहर लगातार पीली पड़ती जा रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह है ठोस कूड़े और उपलों का उसके आसपास जलाया जाना। इसके धुएं का गहरा असर ताजमहल पर पड़ता है। सत्रहवीं सदी में यमुना के तट पर आगरा में बना यह मकबरा पूरी दुनिया के पर्यटकों के लिए सदा से आकर्षण का केंद्र रहा है। जार्जिया इंस्टीच्यूट आॅफ टेक्नोलॉजी, मिनेसोटा विश्वविद्यालय और कानपुर आइआइटी से जुड़े अनुसंधानकर्ताओं के दल ने अपने निष्कर्ष में कहा है कि आसपास ठोस कचरा और उपले जलाए जाने के कारण ताजमहल अपनी रंगत खोने लगा है। शोध में पाया गया कि ठोस कूड़ा जलाने के कारण वायु प्रदूषक (पार्टीकुलेट मैटर) नुकसानदेह स्तर पर पहुंच जाता है। उपले और ठोस कूड़े के धुएं की परत ताजमहल की दीवारों और छतों आदि पर चिपक जाती है, जो आखिरकार इस धरोहर के लिए खतरे की घंटी है। हालांकि एक शोधकर्ता ने अपने बयान में यह भी कहा है कि ठोस कूड़े को जलाने पर पूरी तरह पाबंदी लगाना असरदार नहीं होगा, क्योंकि हो सकता है लोगों के पास कोई अन्य विकल्प न हो। शोध दल ने ताजमहल ही नहीं, आगरा के नागरिकों के लिए भी वायु प्रदूषक के विकराल रूप को लेकर चिंता जताई है। दल ने कहा कि यह स्थिति लोगों के स्वास्थ्य के लिए भी खतरनाक है।

ताजमहल की उड़ती रंगत को लेकर यह अध्ययन नया नहीं है। लंबे समय से पर्यावरणविद और वैज्ञानिक इसे बचाने की चेतावनी देते रहे हैं। सरकारें समय-समय पर थोड़ा-बहुत इंतजाम भी करती रही हैं। लेकिन जिस पैमाने पर उपाय किए जाने चाहिए, नहीं हो पा रहा है। यही वजह है कि ताजमहल की खूबसूरती को लेकर खतरा बरकरार है। पिछले दिनों राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, शहरी विकास मंत्रालय और उत्तर प्रदेश सरकार के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को नोटिस भी जारी किया था। साथ में आगरा के नगर निकायों को निर्देश दिया था कि वे ताज के आसपास कूड़ा वगैरह न जलाएं। एक याचिकाकर्ता ने न्यायाधिकरण में याचिका दाखिल करके बताया था कि प्रतिदिन दो हजार मीट्रिक टन कूड़ा और उपला वगैरह ताज के आसपास जला दिया जाता है। इसके धुएं का असर ताज पर पड़ता है। कुछ पर्यावरणविदों ने ताज को देखने आने वाले पर्यटकों की अबाध संख्या पर भी चिंता जताई है और दर्शकों की संख्या सीमित करने की सलाह दी है। इसके अलावा आगरा शहर में बढ़ते वाहनों का प्रदूषण भी चिंताजनक है। साथ में यमुना नदी की विषाक्तता का असर भी ताज पर पड़ रहा है। जाहिर है, हल्की-फुल्की कोशिश कामयाब नहीं होगी। एक ठोस, मुकम्मल और दीर्घगामी योजना की दरकार है। ध्यान रखना होगा कि यह भारत की स्थापत्य कला का एक बेमिसाल नमूना है, साथ ही यहां आने वाले दुनिया भर के सैलानियों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण भी।

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First Published on October 18, 2016 3:17 am

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