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संपादकीयः चीन की चिंता

जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे के दौरे के दौरान भारत के साथ पंद्रह समझौतों पर हस्ताक्षर के बाद निश्चित रूप से हिंद प्रशांत क्षेत्र में राजनीतिक समीकरण में बदलाव आएगा।
Author September 16, 2017 03:04 am
अहमदाबाद पहुंचे जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे को घुमाते पीएम नरेंद्र मोदी। (Photo: PTI)

जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे के दौरे के दौरान भारत के साथ पंद्रह समझौतों पर हस्ताक्षर के बाद निश्चित रूप से हिंद प्रशांत क्षेत्र में राजनीतिक समीकरण में बदलाव आएगा। खासकर इसलिए भी कि भारत और जापान के बीच साझेदारी का स्तर आर्थिक होने के साथ-साथ रणनीतिक भी है और इसे व्यापक आधार प्रदान करने का मकसद भी सामने रखा गया है। इसलिए चीन इससे चिंतित दिख रहा है, तो यह स्वाभाविक है। दरअसल, अतीत को छोड़ दें तो हाल ही में डोकलाम क्षेत्र में सैनिकों की तैनाती के मसले पर हुई तनातनी के समय से भारत के प्रति चीन का रवैया जगजाहिर रहा है। चीन लगातार कोशिश करता रहा है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत के सवालों को दरकिनार किया जाए। लेकिन अब तक उसे इस मामले में कामयाबी नहीं मिल सकी है। अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि कुछ समय पहले हुए ब्रिक्स सम्मेलन में चीन ने आतंकवाद और पाकिस्तान का मसला उठाने से साफतौर पर मना किया था। लेकिन भारत की ओर से की गई कूटनीतिक कवायदें कामयाब रहीं और ब्रिक्स के संयुक्त घोषणा-पत्र में पाकिस्तान के ठिकानों से काम करने वाले लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों का नाम लेकर उनकी आलोचना की गई।

जाहिर है, चीन को भारत की यह सक्रियता रास नहीं आ रही थी। अब जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने न सिर्फ मुंबई से अमदाबाद तक बुलेट ट्रेन परियोजना का शिलान्यास किया, बल्कि कई ऐसे द्विपक्षीय समझौते भी हुए, जिनका असर आने वाले वक्त में समूचे हिंद प्रशांत क्षेत्र में दिखेगा। पिछले कुछ समय से चीन इसी क्षेत्र में ज्यादा आक्रामक नजर रहा है। और अगर भारत और जापान के बीच दोस्ती गहरी हुई तो न केवल आर्थिक, बल्कि रणनीतिक मोर्चे पर भी जो नया स्वरूप उभरेगा, वह चीन के अनुकूल नहीं होगा। इसके अलावा, जापान के भारत को यूएस-2 समुद्री निगरानी विमान बेचने की योजना का चीन के हितों पर क्या असर पड़ेगा, यह भी समझा जा सकता है। भारत में बुलेट ट्रेन परियोजना जापान को मिलने पर चीन इसलिए भी चिंतित है कि वह खुद यहां तीव्र गति वाली रेल परियोजनाएं हासिल करने की दौड़ में है। हालांकि भारत और चीन के बीच संबंधों में कई बार जैसे उतार-चढ़ाव आते रहे हैं, उसमें यह देखने की बात होगी कि चीन के खिलाफ भारत सख्त रुख अपनाने की किस हद तक जाता है।

गौरतलब है कि पूर्वी चीन सागर में द्वीपों के मसले पर जापान और चीन में लंबे समय से विवाद कायम है। भारत और जापान संयुक्त रूप से विभिन्न देशों में आधारभूत परियोजनाएं शुरू करते हैं तो एशिया-प्रशांत से लेकर अफ्रीका तक के क्षेत्र में तैयार होने वाला ‘फ्रीडम कॉरिडोर’ चीन की महत्त्वाकांक्षी ‘वन बेल्ट वन रोड’ यानी एकीकृत आधारभूत पहलकदमी का एक रणनीतिक जवाब होगा। यानी अगर भारत और जापान के बीच आपसी सहयोग से शुरू सफर रणनीतिक गठजोड़ की ओर बढ़ा तो समूचे इलाके में शक्ति संतुलन में चीन की हैसियत पर नकारात्मक असर पड़ेगा।

शायद इसी से चिंतित चीन के विदेश मंत्रालय की ओर से यह कहा गया कि हम इसका समर्थन करते हैं कि देशों को टकराव के बिना संवाद के लिए खड़ा होना चाहिए और ‘गठजोड़’ के बजाय साझेदारी की खातिर काम करना चाहिए। जाहिर है, चीन ने परोक्ष रूप से जापान और भारत के बीच संबंधों को ‘सीमित’ दायरे में रखने की हिदायत दी है। लेकिन अपने सीमा-क्षेत्र और संप्रभुता को लेकर जरूरत से ज्यादा संवेदनशील रहते हुए चीन क्या कभी अपने पड़ोसी देशों की चिंता को भी समझने की कोशिश करता है?

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