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दिल्ली का दम

जानें आरएसपीएम को हवा में धूल के वे कण जो कि सांस के साथ अंदर जा सकते हैं अथवा नहीं, इसकी जांच आरएसपीएम में की जाती है। हवा में पर्टिकुलेट मैटर (पीएम) पाए जाते हैं, जिनका व्यास 2.5 माइक्रोमीटर से कम होता है, उन्हें पीएम 2.5 कहा जाता है। जिनका व्यास 10 माइक्रोमीटर से कम होता है, उन्हें पीएम 10 कहा जाता है। पीएम 2.5 का स्तर 60 से अधिक होने और पीएम 10 का स्तर 100 से अधिक होने पर स्वास्थ्य को नुकसान होता है।

से मौके शायद ही कभी आते हैं जब किसी सरकार को देशहित में नागरिकों से अपनी कुछ सुविधाओं से समझौता करने की गुहार लगानी पड़ती है। ताजा मामला आबोहवा से जुड़ा है, जिसकी लगातार बदतर होती हालत ने संकट के पैमाने को इस हद तक पहुंचा दिया है कि बच्चों के स्कूल कुछ दिनों तक बंद कर देने की खबरें आने लगी हैं, बीमारों और बुजुर्गों को घरों की चारदिवारी में रहने की सलाह दी जा रही है। इसी के मद्देनजर सरकार जहरीले प्रदूषण घोलने वाले कारकों से आबोहवा को बचाने के लिए सड़कों पर कारों की तादाद कम करने के इंतजाम में लग गई है।
दरअसल, देश के लिए आपके जज्बे को तो गाहे-बगाहे ललकारा जाता है और उसका इजहारे-खयाल भी बहुत व्यापक होता है। बचपन से राष्टÑभक्ति का पाठ पढ़ते देशवासियों का देश के प्रति जज्बा सहज और स्वाभाविक है। लेकिन लाखों लोगों की स्वप्न-नगरी और राजधानी दिल्ली में इस बार आपका अपने शहर के लिए जज्बा दांव पर है। शहर को प्रदूषण मुक्त या यों कहा जाए कि सांस लेने भर के काबिल बनाने के लिए दिल्ली सरकार के प्रस्ताव की कामयाबी का सेहरा अगर अंत में किसी के सिर पर सजेगा तो वे शहरवासी ही होंगे।
दरअसल, व्यावहारिक स्तर पर सरकार के प्रस्ताव के लागू होने की दिशा में इतने अवरोध हैं कि इसकी कामयाबी पर सिर्फ शक है। ऐसे में अगर यह प्रस्ताव सार्थक है तो उसे प्रभावी तरीके से लागू करना लोगों के ही हाथ में है। यों अच्छा यह होता कि सरकार इसे स्वयंसेवी तरीके से लागू करती। समस्या जिस संदर्भ और पैमाने पर है, उसकी मार सिर्फ बड़े-बुजुर्ग और बच्चे ही नहीं झेल रहे, बल्कि एक समूची युवा पीढ़ी इसकी ओर से नजरें फेर लेने के बावजूद इसका बोझ ढोने को अभिशप्त है। फिलहाल युवा बेशक इस प्रदूषण से जूझ लें, लेकिन कभी न कभी इसका असर उन पर आयद होगा ही। फिर प्रदूषण के डर से केवल बुजुर्गों और बच्चों के लिए घर में नजरबंदी की स्थिति पैदा करना कहां तक उचित होगा! अमेरिकी दूतावास अपने स्कूलों में बाहरी स्कूली गतिविधि बंद करवा सकता है, लेकिन कब तक? जिस रफ्तार से शहर में प्रदूषण बढ़ रहा है, उससे यह नहीं लगता कि किसी स्थिति में खुद घरों की दरो-दीवारें इसे दरवाजों से अंदर ले जाने में कामयाब नहीं होंगी।
जो हो, इस दिशा में सरकार की पहल स्वागतयोग्य है, लेकिन इसका श्रेय लेने की हड़बड़ी में इस पर आम राय बनाए बिना इसे लागू करना शायद गलत है। दूसरे, इतनी बड़ी पहल के लिए महज तीन हफ्ते का वक्त हर तरह से कम लग रहा है। इस मसले पर एकतरफा फैसला सरकार ने सहज ही कर लिया, मगर इसे लागू करने के लिए कई महकमों के साथ और समर्थन की जरूरत होगी। दिल्ली की दूषित हवा एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर राजनीतिक सहमति बनाना सरकार के लिए कोई मुश्किल काम नहीं था। लेकिन उसकी जरूरत नहीं समझी गई और सीधे प्रस्ताव को लागू करने की घोषणा कर दी गई। यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि दिल्ली में प्रदूषण में काफी तेजी से कई गुना इजाफे की वजह शहर में बाहर से आने वाले वाहन हैं। खासतौर से रात नौ बजे के बाद शहर की सड़कों पर कतारबद्ध होकर दाखिल होने वाली बड़ी-बड़ी गाड़ियां। इसके लिए दिल्ली सरकार अगर उत्तर प्रदेश और हरियाणा की सरकारों को विश्वास और साथ में लेती तो नतीजे भिन्न हो सकते थे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
दिल्ली के आसपास एक अंगूठी की तरह फैले पश्चिमी और पूर्वी कॉरिडोर का मॉडल पहले से है। पूर्वी कॉरिडोर को कुंडली-मानेसर-पलवल एक्सप्रेस-वे कहा जाता है। करीब 2000 करोड़ रुपए की लागत से इस कॉरिडोर का बड़ा हिस्सा एक अर्से से तैयार है। लेकिन इसका कुछ किलोमीटर हिस्सा कानूनी दांव-पेच और सरकारी काहिली में उलझ जाने के कारण रुका पड़ा है। उस एक्सप्रेस-वे को 2009 में ही तैयार होना था, जिसमें पहले ही पांच साल की देरी हो चुकी है। अगर यह शुरू हो जाता तो पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और चंडीगढ़ के जिन वाहनों को उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा के भी कुछ हिस्सों से गुजरना होता था, वे बिना दिल्ली शहर में दाखिल हुए ही निकल जाते।
बहरहाल, पड़ोसी राज्यों से होकर दिल्ली में दाखिल होने वाले अनगिनत वाहनों को केवल सम और विषम नंबरों की पहचान कर सड़कों से दूर रखना असंभव है। लेकिन शहर के ऐसे वाहनों को भी रोकना मौजूदा पुलिसबल के सहारे आसान नहीं। कंगाली में आटा गीला होने की तरह दिल्ली पुलिस में पहले ही बहुत कुछ ठीक नहीं चल रहा। सड़क पर चलते हर वाहन को रोक कर उसके दस्तावेजों की जांच वैसे ही होगी, जैसे पहले से मची भगदड़ के बीच उतने ही आदमी और झोंक देना। लिहाजा, सरकार को उसे लागू करने के साथ-साथ इस पर जबर्दस्त जागरूकता अभियान चला कर लोगों के भीतर उनके शहर के प्रति जज्बे को जगाना होगा। जो इसे समझने की कोशिश नहीं करें, उन पर कार्रवाई ऐसी हो कि अगली बार नियम-कायदों के उल्लंघन का खयाल भी मन में नहीं आए। यह सभी जानते हैं कि हमारे देश में ट्रैफिक नियमों का पालन अगर बेहद कम है तो उसकी सबसे बड़ी वजह इस अपराध में सजा का न के बराबर होना है। अमीरजादों की कारों के शीशे आज भी काले हैं, क्योंकि पुलिस उन्हें उतार भी दे तो वे फिर दूसरा चिपका लेते हैं और जुर्माने की रकम बिना हुज्जत के अदा कर देते हैं। जाहिर है, सजा और कार्रवाई का मसला भी हैसियत के अहं में दब कर दम तोड़ देता है। क्या यह नए चेहरे में पुराना सामंतवाद है!
प्रदूषण की मार झेल रहे पेरिस, मैक्सिको और बेजिंग में सम-विषम नंबरों वाला कानून पहले से लागू है और परिणाम भी उत्साहवर्द्धक है। जाहिर है, यह वक्त आपसी आंकड़ों का हिसाब करने के बजाए दिल्ली की हवा और उससे पनपते खतरे से लोगों को बचाने में खर्च किया जाना चाहिए। इसलिए उसमें केंद्र, राज्य, पड़ोसी राज्यों, पुलिस, पर्यावरण या स्वयंसेवी संस्थाओं से जितनी मशक्कत की दरकार है, वह करनी ही होगी। वरना यह प्रस्ताव महज किताबी बात ही बन कर रह जाएगी।
विश्व में ऐसे उदाहरण हैं जहां लोगबाग अपने प्रशासन के साथ प्रदूषण के खिलाफ डट कर खड़े हो जाते हैं। अटलांटा में प्रदूषण का स्तर बढ़ते ही एक खास तरह का अलार्म बजता है, जिसके बाद लोग तत्काल अपने वाहन खड़े कर देते हैं। कई बार तो उसी रुके हुए वाहन से दुबारा अपना सफर आगे बढ़ाने के लिए दो या तीन घंटे तक भी इंतजार करना पड़ता है। दरअसल, वे वाहन दुबारा तभी चलते हैं जब प्रदूषण का स्तर तयशुदा मानकों के मुताबिक हो जाए।
जहां तक शहर में ट्रकों के प्रवेश का सवाल है तो दिल्ली सरकार पड़ोसी राज्यों के साथ बात करके कुछ वैकल्पिक रूट तैयार करने पर भी विचार कर सकती है। व्यावसायिक वाहनों के विकल्प तय रास्तों से निकालना भी उतना आसान नहीं, क्योंकि तब सरकार को वहां अपनी ओर से तय किए गए कर को वसूलने के लिए अलग से नाके लगाने पड़ेंगे। ऐसे कई रूट स्टाफ की कमी की वजह से कर चोरों के लिए यही रूट अब भी चलते हैं। यह किसी से छिपा तथ्य नहीं है कि दिल्ली पुलिस अगर सड़क पर अनधिकृत रूप से पहले से ही यह तय करके न खड़ी हो कि उसे चालान का अपना तय लक्ष्य पूरा करना है तो वह पूरा दिन बेरोक-टोक चालान करे। मगर स्टाफ की यही कमी सरकार की महत्त्वाकांक्षी योजना को लागू करने में आड़े आने वाली है।
हालांकि यह योजना भी नियमन के स्तर पर कम जोखिम भरी नहीं है कि सभी वाहनों से उत्सर्जन यूरो-श्क मानकों के अनुरूप ही हों। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए केंद्र के साथ पूरे तालमेल और उसे लेकर आंतरिक ढांचे और नियमन प्रणाली को विकसित करना होगा। यह इतना आसान नहीं है और इसमें कुछ समय लग सकता है, लेकिन इस बार तेजी से काम होने की सूरत में यह उतना भी असंभव नहीं है। इसके लिए यह जरूरी है कि आने वाले दो हफ्ते के अंदर ही सरकार इस मामले में केंद्र और राज्यों से तालमेल करे, वरना कहीं ऐसा न हो कि शहर की सीमाओं पर ऐसे ‘खोखे’ खुल जाएं जहां यूरो-श्क मानकों को सत्यापित करने वाले प्रमाण-पत्र पहले के प्रदूषण प्रमाण-पत्रों की तरह जारी होने लगें! सरकार राजधानी की हवा में और जहर घोलने से बचाने के लिए यूरो-श्क मानकों को जांचने वाले उपकरण पुलिस और संबद्ध अधिकारियों को मुहैया कराए।
व्यावहारिकता के स्तर पर भी सरकार को कुछ ठोस विकल्प ढूंढ़ने होंगे। फिलहाल इमरजेंसी सेवाओं को इससे छूट दी गई है और अकेले चलने वाली महिलाओं को छूट देने पर विचार करने की बात है। जाहिर है, सरकारी वाहनों को भी छूट होगी, लेकिन किसी के घर में कोई इरमजेंसी की हालत हो जाए तो इस सूरत में कोई क्या करे? क्या पड़ोसी से कार मांगे? अपने रिश्तेदारों की सूची अपने पास रखे नंबरों के हिसाब से? क्या सरकारी वाहनों के आने का इंतजार करे? ऐसी स्थिति से निपटने के लिए भी सरकार को ही इमरजेंसी सेवाएं लोगों के घरों के आसपास मुहैया करानी होगी। दिल्ली की चिंता वाजिब है, क्योंकि यह ध्यान रखने की बात है कि दिल्ली इस समय विश्व के 20 सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में शुमार हो चुकी है। शहरवासियों की सारी उम्मीद भी दिल्ली सरकार पर ही टिकी है कि वह उसे प्रदूषण के कारण होने वाले नुकसान से बचने को कोई असरकारी उपाय सुझाए। लेकिन साथ में यह भी जरूरी है कि सरकार इन उपायों के व्यावहारिक पहलू भी ठोक-बजा कर देख ले।
शहर के दो उपनगरीय इलाकों के कारण भी यहां आवाजाही में जबर्दस्त बढ़ोतरी हुई है। काम की तलाश में इस शहर में आने वाले नए लोग यहां घर लेने में असमर्थ होते हैं तो वे उपनगरों की ओर भागते हैं। इस तरह उनकी आवाजाही रोज की जिंदगी का हिस्सा बन जाती है। दूसरी ओर, यह भी सच है कि गुड़गांव और नोएडा में बहुत से दफ्तरों के मुख्यालय स्थानांतरित हो गए हैं जिनके अधिकारी रोज आना-जाना करते हैं। यही स्थिति सरकारी कर्मचारियों की भी है। नगर की सीमाओं से अगर कोई प्रभावकारी परिवहन व्यवस्था मिले तो शायद यह हवा कुछ कम प्रदूषित हो, लेकिन फिलहाल ऐसे कोई आसार तो नहीं दिखते।
आज के समय में कार स्टेटस सिंबल की तरह हो गई है। कारपोरेट जगत के आला अफसरों को मेट्रो या किसी भी अन्य सार्वजनिक माध्यम से सफर अपनी हेठी की तरह महसूस होता है। मगर अब शहर के अलंबरदार चाहें तो इसके लिए मिसाल खड़ी कर सकते हैं। लेकिन आत्ममुग्धता और आत्मसुविधा में लिप्त सरकार से यह उम्मीद कम ही है।
जो नए-नवेले विधायक टीवी कैमरों के सामने प्रधानमंत्री से भी एक लाख रुपए की अपनी तनख्वाह को जनता के लिए ही इस्तेमाल की दुहाई दे रहे हैं, उनसे यह उम्मीद कम ही है कि वे सार्वजनिक संसाधनों का इस्तेमाल करेंगे। जो विधायक टीवी पर अपनी छोटी-सी भीड़ वाले चुनाव क्षेत्र में जनता तक पहुंचने के लिए कार की जरूरत पर जोर देते नजर आए वे किसी बस या तिपहिया वाहन पर कहां सवार होंगे। हालांकि केजरीवाल ने ऐलान किया है कि वे भी सम-विषम फार्मूले का सख्ती से पालन करेंगे और खास तारीखों पर सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल या कारपुल करेंगे। लेकिन ये सार्वजनिक वाहन की सवारी कैमरे की आंख के लिए होती है, वह भी प्रतीकात्मक ही। काश, ये राजनेता भी अपने बच्चों को सरकारी कार के बजाए उनके स्कूल की बस में स्कूल भेजें। लेकिन देश में अभी तक असलियत यही है कि (चैरिटी नेवर बिगिन्स एट होम) पुण्य का काम अपने नहीं, दूसरे के घर से ही शुरू होता है।
मगर क्या यह भी हो पाएगा? जिनके लिए कार किसी जरूरत के मुकाबले हैसियत का प्रदर्शन ज्यादा है, वे ‘सम-विषम’ फार्मूले को कितना अपनी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनाने को तैयार होंगे? जिनके लिए जरूरत है, क्या उनकी जरूरत की दलील को दरकिनार करना आसान होगा? एक व्यक्ति जो अपने शहर की आबोहवा को स्वच्छ रखने या सड़क के बोझ को हलका करने के मकसद से कार घर में छोड़ कर सड़क पर निकलता है, वह अपने गंतव्य तक कैसे पहुंचेगा, उसके सफर की गुणवत्ता क्या होगी? एक मेट्रो ट्रेन को छोड़ दिया जाए तो दिल्ली की जिन सड़कों पर सार्वजनिक बसों की हालत एक दोयम दर्जे के सार्वजनिक परिवहन की तरह है, वह कितने कार मालिकों को इसमें सफर करने के लिए प्रोत्साहित कर सकेगा? दिल्ली की सड़कों पर रोजाना तकरीबन चौदह सौ नई कारों के सड़क पर उतरने का हिसाब सड़कें और आबोहवा को नहीं, तो और किसे चुकाना पड़ेगा? एक अहम सवाल यह आईने की तरह सामने खड़ा है कि कार में सवारी और नई कारों को अपने स्टेटस के पर्याय के तौर पर देखने वाला तबका क्या सामाजिक-आर्थिक हैसियत के मनोविज्ञान से ऊपर उठ कर सर्वव्यापी हित में सहभागी बन कर भी दिखाएगा?

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  1. B
    B.UPADHYAY
    Dec 12, 2015 at 3:15 am
    देश की सभी पार्टया यदि खुद के संगठन मे बैठे देशद्रोही,मानवता के दुश्मन नेताओ को येन-केन प्रकारेन दफ़न कर दे तो देश का पोलयूसन ख़त्म होकर पर्यावरण शुद्ध हो जाएगा. संसद मे मानव चुनकर जाएँगे और वे मानवता के लिए काम करेंगे. देश को संसकारी सांसदो की ज़रूरत है सत्य और न्याय के मालिक की जय हो.
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    सबरंग