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दूसरी नजरः विशाल बदइंतजामी

मनमोहन सिंह कम बोलते हैं। वे बड़े मृदु ढंग से अपनी बात कहते हैं और यह खयाल रखते हैं कि किसी के दिल को चोट न पहुंचे।
Author December 4, 2016 02:54 am

मनमोहन सिंह कम बोलते हैं। वे बड़े मृदु ढंग से अपनी बात कहते हैं और यह खयाल रखते हैं कि किसी के दिल को चोट न पहुंचे। मेरे खयाल से ये एक नेता के बड़े भारी गुण हैं, पर कर्कशता और कोलाहल से भरे हमारे लोकतंत्र में इन्हें अवगुण माना जाता है। हमारे लोकतंत्र की हालत शोचनीय है, क्योंकि यहां शोरशराबे को प्रोत्साहित किया जाता है। हमारी बहसें खोखली हैं, क्योंकि तथ्य और तर्क पर झूठ व शब्दाडंबर हावी रहते हैं। डॉ सिंह गुरुवार, 24 नवंबर, 2016 को राज्यसभा में बोले। वे मुश्किल से सात मिनट बोले होंगे, नरमी से, थोड़ा रुक-रुक कर, सदन के कामकाज में हस्तक्षेप करने पर खेद जताने जैसे अंदाज में! उन्होंने कहा कि विमुद्रीकरण के फैसले के अमल में सरकार ह्यबड़े पैमाने पर बदइंतजामी की दोषी है। प्रधानमंत्री वहां मौजूद थे, पर जाने क्यों उन्होंने जवाब देने की जरूरत नहीं समझी। मीडिया कितना भी सरकार पर मेहरबान हो (कुछ समूह जुगुप्सा जगाने की हद तक मेहरबान और चिकनी-चुपड़ी बातें करने के जोश से भरे हैं), वे डॉ सिंह की टिप्पणी को खबर बनाने के लिए बाध्य थे। लिहाजा, विशाल बदइंतजामी, ये शब्द टीवी चैनलों पर बार-बार दिखाए गए और अखबारों तथा सोशल मीडिया में बार-बार दोहराए गए। ये शब्द लोगों के मन पर अमिट रूप से अंकित हो गए हैं।
खास पहचान
लगता है विशाल बदइंतजामी राजग सरकार की खास पहचान बन गई है। कोई भी चुनौती जिससे पार पाने का बीड़ा वे उठाते हैं, वह चुनौती आखिरकार पहले से ज्यादा जटिल और खतरनाक हो जाती है। विमुद्रीकरण इसका नवीनतम उदाहरण है। निजी सूत्रों से सीधे मिली जानकारी और संबंधित व्यक्तियों की गतिविधियों को जोड़ कर देखने पर अब यह साफ हो गया है कि सिर्फ चार अफसरों को भरोसे में लिया गया था और उन्हें विमुद्रीकरण को अंजाम देने का जिम्मा सौंप दिया गया। उनमें से किसी को भी मुद्रा-उत्पादन और प्रबंधन का पर्याप्त ज्ञान नहीं था, और इसलिए नीचे दिए गए प्रश्नों में से कोई भी प्रश्न न तो पूछा गया न उसका जवाब दिया गया:
1. प्रश्न: कितने नोट 8-9 नवंबर, 2016 की आधी रात से अपनी कानूनी वैधता खो देंगे? जवाब: 2300 करोड़ नोट।
2. प्रश्न: सरकार और रिजर्व बैंक की नोट छापने वाली मशीनों की क्षमता कितनी है? जवाब: 300 करोड़ नोट प्रतिमाह।
3. प्रश्न: विमुद्रीकृत किए गए नोटों की जगह नए नोट चलन में आने में कितना वक्त लगेगा? अगर समान मूल्य वाले पुराने नोटों की जगह नए नोट चलाने हों, तो सात महीने लगेंगे। अगर पांच सौ के नोटों की जगह सौ के नोट लाने हों, तो पांच गुना ज्यादा वक्त लगेगा। अगर हम 2000 के ज्यादा नोट छापते हैं, तो कम वक्त लगेगा।
बेतुका निर्णय
4. प्रश्न: क्या 2000 रु. के नोट लाने का कोई औचित्य है? जवाब: बिल्कुल नहीं। अगर ज्यादा कीमत के नोटों से भ्रष्टाचार व काला धन पनपता है, और इसीलिए पांच सौ व हजार के नोटों का विमुद्रीकरण किया गया, तो निश्चय ही उससे भी ज्यादा कीमत के नोट लाने का कोई औचित्य नहीं हो सकता।
5. प्रश्न: क्या नए नोट एटीएम के जरिए तुरंत वितरित किए जा सकते हैं? जवाब: नहीं। एटीएम को नए नोट भरने और वितरित किए जाने लायक बनाना है। 2 लाख 15 हजार एटीएम को ठीक करने में एक महीना तो लगेगा ही, ज्यादा भी लग सकता है।
6. प्रश्न: तो नए नोट लोगों तक जल्दी कैसे पहुंचेंगे? जवाब: बैंक-शाखाओं और बैंककर्मियों की सीमाओं को देखते हुए वे जल्दी-से वितरित नहीं किए जा सकते।
7. प्रश्न: क्या नोटों की किल्लत अभी रहेगी, और कब तक? जवाब: नोटों की अभी भारी किल्लत रहेगी, और यह परेशानी लंबी खिंच सकती है। ऊपर-लिखित सीमाओं के अलावा, एक कहीं ज्यादा अहम कारण बैंक-शाखाओं तथा एटीएम की विषम मौजूदगी भी है।
* बैंक शाखाओं (कुल: 1,38,626) का दो तिहाई महानगरों, शहरों व छोटे शहरों में है। केवल एक तिहाई शाखाएं ग्रामीण क्षेत्रों में हैं जहां निकटतम बैंक शाखा भी कई किलोमीटर दूर हो सकती है।
* कुल 2,15,000 एटीएम में से 55,690 एटीएम सात महानगरों में हैं। कुल एटीएम के नब्बे फीसद सोलह राज्यों में हैं। केवल दस फीसद एटीएम (21,810) तेरह राज्यों और सात केंद्रशासित प्रदेशों में हैं। पूर्वोत्तर के सात राज्यों में कुल सिर्फ 5199 एटीएम हैं, जिनमें से 3645 एटीएम असम में हैं।
अर्थव्यवस्था पर असर
8. प्रश्न: अर्थव्यवस्था को विमुद्रीकरण की क्या कीमत चुकानी पड़ेगी? जवाब: इसकी काफी कीमत चुकानी होगी। मान लें कि जीडीपी में बस 1 फीसद की कमी आएगी। बजट में दिए गए हिसाब के मुताबिक 2016-17 के अंत में जीडीपी का आकार करीब 150 लाख करोड़ रुपए का होगा। उसके 1 फीसद का मतलब है 1.5 लाख करोड़।
(ह्यसेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमीह्ण ने हिसाब लगाया है कि 8 नवंबर से 30 दिसंबर तक विमुद्रीकरण के पचास दिन की अवधि में अर्थव्यवस्था को होने वाला नुकसान 1,28,000 करोड़ रुपए का होगा:
परिवार (कतार में लगने, लेन-देन की परेशानी): 15,000 करोड़ रु.
सरकार और रिजर्व बैंक (नए नोटों की छपाई): 16,800 करोड़ रु.
कारोबार (कारोबारी नुकसान, बिक्री में कमी): 61,500 करोड़ रु.
बैंक (बैंककर्मियों पर आने वाला खर्च): 35,100 करोड़ रु.
9. प्रश्न: विमुद्रीकृत किए गए नोटों का कितना नए नोटों से अदलाबदली के जरिए या जमा के रूप में अर्थतंत्र में लौटेगा? विमुद्रीकृत किए गए नोटों का कुल मूल्य 31 मार्च को 14,17,000 करोड़ रु. था। अगर मूल्य के हिसाब से 90 फीसद लौटता है, तो प्रभावी विमुद्रीकरण होगा सिर्फ 1,40,000 करोड़ रु. का, अर्थव्यवस्था को होने वाले नुकसान से ज्यादा।
(27 नवंबर तक 8,44,982 करोड़ रु. के मूल्य के नोट बदले या जमा किए गए। मेरे सूत्रों ने मुझे बताया है कि बीते शुक्रवार तक 11,00,000 करोड़ जमा हुए। अगर अगले चार हफ्तों तक जमा होने की यही गति रही, तो विमुद्रीकृत किए गए नोटों के अर्थव्यवस्था में लौटने का अनुपात नब्बे फीसद से ज्यादा हो सकता है!)
10. प्रश्न: अगर यह संभव है कि विमुद्रीकृत किए गए सारे नोट अर्थतंत्र लौट आएं, तो यह कवायद क्यों? जवाब: क्योंकि कभी-कभी सरकार को ह्यखोदा पहाड़ निकली चुहियाह्ण वाली कहावत को चरितार्थ करने में मजा आता है!

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  1. A
    AMRIT RAJ
    Dec 4, 2016 at 12:44 pm
    राजनीतिक मुद्दों पर राय स्पष्ट करनी चाहिए। मृदुभाषी या कठोरभाषी का संबंध नहीं है। मुद्दा यह है की सरकार में रहते हुए जो कार्य हुए उससे क्या लोगों का भला हुआ। आखिर सरकार क्या है ? मुझे बता दें तो बेहतर होगा। पैसों की किल्लत के माे में विपक्ष संसदीय परम्परा के तहत अपनी बातों को ी से रख पाया ?समस्या है सबको पता है आपको भी पता है। ये मुद्दा नहीं है बल्कि समाधान और विपक्ष की भूमिका भी मजबूत नहीं है।
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    1. A
      Amit Kumar
      Dec 28, 2016 at 7:53 am
      आप हो कितने अच्छे ,आप हो कितने सुंदर,आप हो कि कितने सच्चे, हम है कि झूठ पर झूठ बोले जा रहे है narendramodi to #Indians
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      Reply