December 05, 2016

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संपादकीयः मौत के अस्पताल

इससे ज्यादा दुखद और अफसोसनाक क्या होगा कि अपनी गंभीर बीमारी का इलाज कराने की आस लिए लोग किसी अस्पताल में जाएं, पर उनमें से बहुत सारे वहां के प्रबंधन की लापरवाही की आग में अपनी जिंदगी गंवा बैठें।

Author October 20, 2016 02:22 am

इससे ज्यादा दुखद और अफसोसनाक क्या होगा कि अपनी गंभीर बीमारी का इलाज कराने की आस लिए लोग किसी अस्पताल में जाएं, पर उनमें से बहुत सारे वहां के प्रबंधन की लापरवाही की आग में अपनी जिंदगी गंवा बैठें। अस्पताल के आइसीयू में कैसे रोगी रखे जाते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। लेकिन ओड़िशा में भुवनेश्वर के इंस्टीट्यूट आॅफ मेडिकल साइंसेज ऐंड एसयूएम हॉस्पिटल में जीवन और मौत से जूझ रहे लोग शायद अपनी बीमारी से निजात पा जाते, लेकिन वहां के कर्मचारियों-अधिकारियों की लापरवाही के चलते फैली आग ने उन्हें जिंदा लील लिया। सोमवार की शाम एसयूएम अस्पताल में फैली जिस आग में दो दर्जन मरीज मारे गए और कई दूसरे लोग बुरी तरह जख्मी हो गए, शुरुआती जांच में उसका कारण शॉर्ट सर्किट बताया गया है। मगर आखिर ऐसे लगी आग से जानमाल के भारी नुकसान को हर बार शॉर्ट सर्किट की दलील से कब तक ढका जाता रहेगा? शॉर्ट सर्किट से लगी आग क्या बिल्कुल रोकी न जा सकने लायक होती है या फिर ऐसा होने पर आग फैलने के बचाव के इंतजाम नहीं किए जा सकते? पर ऐसे सवाल वैसे अस्पतालों के प्रबंधनों के लिए शायद बेमानी होते हैं, जिन्हें साधारण बीमारियों के लिए भी मरीजों से मोटी रकम वसूलने में कोई हिचक नहीं होती। ऐसे उदाहरण आम हैं, जिनमें मरीजों और उनके परिजनों से इलाज का खर्च वसूलते हुए अस्पताल का प्रबंधन पूरी तरह संवेदनहीन व्यवहार करता है।

हैरानी की बात है कि पिछले कुछ सालों के दौरान अस्पतालों में आग लगने की कई घटनाएं हुर्इं। कहीं-कहीं भारी तादाद में लोगों की जान चली गई। सबसे त्रासद उदाहरण पांच साल पहले कोलकाता के एएमआरआइ अस्पताल का है, जहां इसी तरह आग लगने से नब्बे से ज्यादा लोग जिंदा जल कर मर गए। मगर ऐसी तमाम घटनाएं एसयूएम अस्पताल के प्रबंधन के लिए कोई सबक नहीं बनीं और न उन्होंने ऐसा कोई ठोस इंतजाम किया, जिससे आपातकाल में मौजूद मरीजों और उनके परिजनों को बचाया जा सके। अब वहां के चार अधिकारियों को गिरफ्तार करके और मृतकों के परिजनों और घायलों को कुछ मुआवजा देकर घटना से उपजे आक्रोश को ठंडा करने की औपचारिकता निबाह ली जाएगी, लेकिन क्या यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि भविष्य में फिर कोई ऐसी घटना न हो? आम धारणा बन चुकी है कि कुप्रबंध, लापरवाही और अव्यवस्था सरकारी अस्पतालों का स्थायी मर्ज है। पर भुवनेश्वर का यह अस्पताल निजी स्वामित्व वाला है और जाहिर है, केवल इसी वजह से इसे किसी बीमारी के इलाज से लेकर व्यवस्थागत मामलों में अपेक्षया ज्यादा सुरक्षित होने का प्रचार मिल जाता है। पर हकीकत यही है कि बेहतर इलाज और सुरक्षा के उच्च मानक होने का दावा करने वाले अस्पतालों में भी लापरवाही और कुप्रबंधन का आलम बहुत अलग नहीं होता है। आग लगने जैसी आपात स्थिति में बचाव के दूसरे उपायों सहित वहां मौजूद लोगों के बाहर निकलने के इंतजाम क्या हैं, यह प्राथमिक शर्त होती है। लेकिन अव्वल तो भावी जोखिम की आशंकाओं के बावजूद अस्पतालों के प्रबंधन बहुत सारी कमियों की ओर से आंखें मूंदे रहते हैं। दूसरे, संबंधित सरकारी महकमों को भी समय-समय पर सारी व्यवस्था के चाक-चौबंद होने की निगरानी करना जरूरी नहीं लगता है। नतीजतन, ऐसी ही आपराधिक लापरवाही की कीमत इन जगहों पर जिंदगी की उम्मीद लेकर जाने वाले लोगों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है।

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First Published on October 20, 2016 2:19 am

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