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पेरिस के पार

पेरिस में जलवायु संकट से निपटने को लेकर एक मंजिल और उस तक पहुंचने का सड़क मार्ग ही तय किया गया है। लेकिन फिलहाल जो तस्वीर दिख रही है, उसमें उस मंजिल तक पहुंचना लगभग नामुमकिन है
Author नई दिल्ली | December 19, 2015 00:12 am

पेरिस में जलवायु संकट से निपटने को लेकर एक मंजिल और उस तक पहुंचने का सड़क मार्ग ही तय किया गया है। लेकिन फिलहाल जो तस्वीर दिख रही है, उसमें उस मंजिल तक पहुंचना लगभग नामुमकिन है। खासतौर पर भारत के लिए। हालांकि इस सम्मेलन के हासिल यानी ‘पेरिस समझौते’ से फिलहाल पूरा विश्व प्रफुल्लित दिख रहा है। हो भी क्यों नहीं, आखिर एक ऐतिहासिक समझौते को कलमबद्ध जो किया गया है। ऐतिहासिक इस मायने में कि ऐसा बार-बार नहीं होता है और न ही होगा कि किसी एक मसविदे पर विश्व के 196 देश एक साथ खड़े दिखें।

जाहिर है, जिस मसले पर अब तक अलग-अलग देशों के बीच अपनी जरूरतों के मद्देनजर तीखे टकराव रहे हों, एक-दूसरे को आईना दिखाने की होड़ रही हो, ऐसी हालत में इस बार की यह उपलब्धि अपने आप में ऐतिहासिक है। और इसलिए इस पर मनाए जा रहे जश्न को वाजिब कहा जा सकता है। इस सहमति से यह समझा जा सकता है कि इन तमाम देशों को अब संकट की भयावहता का अहसास है और शायद ये सभी आने वाले जटिल हालात का अनुमान भी लगा पा रहे हैं। यों, यह संकट अगर ऐसे ही बढ़ता गया तो बाकी पारिस्थितिकी तंत्र में भयावह उठा-पटक तो तय है, अपने आसपास भी प्रदूषण के कारण अगले पांच साल में विश्व में विनाश की आहट सहज ही सुनाई देगी और फिर उसका कहर बरपना भी महज वक्त की बात होगी।

देश इस बात पर खुश है कि जिस ‘सतत जीवनशैली और जलवायु इंसाफ’ का जिक्र मसविदे में चाहिए था, वह तो उसकी प्रस्तावना में ही है। लेकिन क्या इतना काफी है? एक लंबे अरसे में तय हुई जीवनशैली के आलोक में जलवायु के मामले में एक न्यायोचित और संतुलित व्यवस्था के लिए जोखिम उठाने को देश कितना तैयार है, यह देखने की बात होगी। सही है कि इस मसविदे में विकसित और विकासशील के फर्क का ध्यान रखा गया है और इस संकट से निपटने के लिए वित्तीय मदद का भी इंतजाम किया गया है। लेकिन विकसित देशों का अब तक का रिकार्ड देखते हुए यह समझना मुश्किल नहीं है कि इस व्यवस्था को व्यवहार में जमीन पर उतारना कितनी बड़ी चुनौती होगी।

कहने को मसविदे में विकासशील देशों की मदद की खातिर इस मकसद को हासिल करने के लिए हर साल सौ अरब डॉलर की सहायता का संकल्प लिया गया है। लेकिन इस संकल्प को कितना अमल में लाया जा सकेगा, इस अभियान की सफलता इसी पर निर्भर करेगी, क्योंकि विकासशील देशों को बिना इसके कुछ हासिल नहीं होने वाला। जाहिर है, लक्ष्य आसान नहीं। खास तौर पर विकासशील देशों के बीच खुद को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में खड़ा करने के लिए जिस तरह औद्योगीकरण की दौड़ चल रही है, उसमें विरोधाभासी हालात पैदा होंगे।

हालांकि सच यह है कि जलवायु के मौजूदा संकट के लिए विकसित देश अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। जिस तरह से औद्योगीकरण और साधन संपन्न सुविधाओं से भरी जीवनशैली के कारण आज यह समस्या गहराती जा रही है, उसके लिए उनकी जिम्मेदारी तय है। इसे लेकर पिछले कई सालों से विकासशील देशों की ओर से जोरदार तरीके से आवाज उठाई गई और खास तौर पर इस बात पर जोर दिया गया कि जब तक विकसित देश अपने यहां कार्बन उत्सर्जन में कटौती नहीं करते, उन्हें विकासशील देशों पर शिकंजा कसने की बात नहीं करनी चाहिए। इस मसले पर अब तक विकसित देशों का रवैया टालमटोल भरा ही रहा। लेकिन पिछले कुछ सालों में उभरे दबाव का ही शायद यह नतीजा है कि इस बार अपनी जिम्मेदारी को कबूल करते हुए विश्व को विकसित और विकासशील के अंतर से नापने की कोशिश की गई है।

इस क्रम में अगले पांच वर्ष में धरती के तापमान को दो डिग्री से नीचे रखने की यह पहल सराहनीय तो है, लेकिन अभी भी जो उलझनें बची हुई हैं, उन्हें देखते हुए यह कहा जा सकता है कि निर्धारित लक्ष्य पाना मुश्किल है। इसके बावजूद जिस बात से थोड़ी उम्मीद की किरण दिखाई देती है, वह यह है कि इस लक्ष्य को पाना कानूनी तौर पर बाध्यकारी बनाया गया है। फिर भी, यह बाध्यता किस हद तक जमीन पर उतरेगी, यह देखने की बात होगी।

हालांकि यह उम्मीद थी कि इस सम्मेलन में जलवायु संकट के लिए ऐतिहासिक जिम्मेदारी तय की जाएगी। लेकिन अगर ऐसा नहीं हो सका तो यह भी सहज ही समझ में आ सकने वाली बात है। इस मसले पर अब तक का इतिहास देखें तो 1980 के दशक में औद्योगिक विकास की रफ्तार पकड़ने के चक्कर में आज के विकासशील देशों ने भी कार्बन उत्सर्जन को उच्चतम स्तर पर ले जाकर इस संकट को और गहरा किया। जाहिर है, इससे निपटने में अब इनकी भी जिम्मेदारी बड़ी होनी चाहिए थी। लेकिन सम्मेलन शायद इससे कतरा गया।

1980 के दौर से ही प्रदूषण फैला कर और इक्कीसवीं सदी की शुरुआत तक इस विनाशकारी स्तर पर लाने के लिए विकासशील देशों को न सिर्फ अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए थी, बल्कि इसके लिए विश्व से क्षमाप्रार्थी भी होना चाहिए था। आखिर इस समस्या से लड़ने में सबकी भागीदारी बराबर होनी चाहिए। यह तथ्य है, लेकिन केवल इसलिए यह जिद पकड़े रहने से काम नहीं चलेगा कि मौजूदा संकट में विकसित देश अपनी भूमिका के अनुपात में अपनी ओर से कदम भी उठाएं। दरअसल, कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए संसाधनों को जितना सीमित करने की दरकार है, उसे स्वीकार करना विकसित देशों के लिए आसान नहीं। यहीं एक जटिल स्थिति आ खड़ी होती है।

सवाल है कि ‘पेरिस समझौते’ का मकसद हासिल करना वैसी हालत में कैसे मुमकिन होगा कि एक ओर अमेरिका अपने यहां पेट्रोलियम और कोयले की खपत पर रोक लगाने की मांग या शर्त स्वीकार नहीं करे और दूसरी ओर भारत जैसे देशों में भी इनके इस्तेमाल पर लगाम लगाने के बजाय इसमें और बढ़ोतरी ही होती जाए! अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि जब भारत और चीन के साथ खड़े विकासशील और गरीब देशों ने कार्बन उत्सर्जन और जलवायु संकट के मसले पर ऐतिहासिक जिम्मेदारी की बात उठाई तो अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी ने बीच में ही बातचीत के बहिष्कार तक की धमकी दे डाली। हालत यह पैदा हो गई कि कार्बन के र्इंधन का इस्तेमाल कम करने के आग्रह के कारण भारत को एक ‘अवरोधक देश’ के तमगे से नवाज दिया गया।

लेकिन इस वैश्विक मसले का वास्तविक अवरोधक कौन है, क्या यह अब कोई छिपी बात है! बहरहाल, भारत के नजरिए से देखें तो सहभागी देशों के बीच विकसित और विकासशील के अंतर के साथ देश को कोयले से संचालित बिजली संयंत्रों से उत्सर्जन को कम करने के मामले में कुछ और वक्त मिल गया। देश के अक्षय ऊर्जा का 175 जीडब्लू का लक्ष्य पाने के लिए 2022 तक का समय मिल गया है। लेकिन इसके साथ ही देश पर कुछ जिम्मेदारियां भी आयद हुई हैं। भारत को ऐसे देशों की मदद के लिए आगे आना होगा जो जलवायु परिवर्तन के संकट से निबटने के मामले में कमजोर हैं। देश की मौजूदा नीतियों में मसविदे के प्रावधानों के मुताबिक, बदलाव भले आसान नहीं हुआ हो, लेकिन अब पेरिस में सहमति के बाद यह करना ही होगा। इसके अलावा हर पांच साल के बाद जलवायु संकट के लिए अपने प्रयासों को पहले से आगे बढ़ाना होगा। मगर अफसोस की बात यह है कि इन सबके लिए धन की उपलब्धता कैसे होगी, इस पर संदेह ही है।

इस मसविदे में हर विकसित देश को अगले पांच वर्ष तक हर साल सौ अरब डॉलर की मदद और उससे किए गए प्रयासों का हिसाब भी पांच वर्ष बाद देना होगा। ऐसे सभी देशों को अपने खाते जांच के लिए पेश करने होंगे। लिहाजा, सभी के लिए वास्तविक स्तर पर प्रयास करना आवश्यक होगा। चीन और भारत समेत 134 देश जो इस समय विकसित देशों की जी-77 श्रेणी में शामिल थे, अभी खुश हैं कि अमीर और अभी हो रहे अमीर के फर्क को मान लिया गया। याद रहे, अमेरिका ने पिछले उत्सर्जन समझौते पर दस्तखत करने से इनकार कर दिया था और अमीर देशों को उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल करने के लिए किसी सख्त प्रावधान से बचा ले गया था।

इस करार की सबसे बड़ी चुनौती भारत के सामने ही आने वाली है। जलवायु परिवर्तन पर मसविदे की धाराओं के मुताबिक लगाम कसने के लिए ऐसी तकनीकें विकसित करनी होंगी, जिनसे पर्यावरण को स्वच्छ करने में मदद मिले। इस बात पर हैरत नहीं होगी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रणनीतिकार अब ‘स्वच्छ भारत’ की तर्ज पर ‘स्वच्छ पर्यावरण’ का प्रस्ताव भी ले आएं। यों यह बुरा नहीं क्योंकि आम आदमी की भागीदारी से किसी भी लक्ष्य को हासिल करना कदरन आसान ही होता है। जैसे बूंद-बूंद से तालाब भरता है वैसे ही प्रदूषित कण-कण पर अंकुश लगाने से पर्यावरण की सुरक्षा व स्वच्छता की गारंटी करना आसान है। देश के बड़े औद्योगिक घरानों पर भी यह जिम्मेदारी आती है कि वे ऐसे संसाधनों का इस्तेमाल करें जिनसे पर्यावरण को बचाने में मदद मिले।

उसमें एक बड़ा कदम इस तरह भी उठाया जा सकता है कि जो इलाके अभी पर्यावरण को बचाए हुए हैं, वहां विकास रथ को तभी ठेला जाए जब जलवायु स्वच्छता की शर्तों को कायम रखते हुए ही विकास के काम हों। हाल ही में विख्यात हृदय रोग विशेषज्ञ नरेश त्रेहन ने दो फेफड़ों की अंदरुनी स्थिति को जगजाहिर किया। एक हिमाचल के वासी की और एक दिल्ली के नागरिक की। दिल्ली के व्यक्ति का फेफड़ा प्रदूषण से मानव शरीर को हो रहे नुकसान की भयावह तस्वीर पेश करने वाला था। लेकिन जिस गति से हिमाचल और दूसरे पहाड़ी प्रदेश-जो अपेक्षाकृत स्वस्थ वातावरण प्रदान करते हैं- विकास और औद्योगिक विकास की होड़ में लगे हैं, वह दिन दूर नहीं जब दिल्ली और हिमाचल के वासियों के फेफड़ों में फर्क करना ही मुश्किल हो जाए। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि सरकार इन इलाकों के विकास में हरित तकनीक के प्रयोग को लाजमी कर दे और जब तक यह संभव न हो, यहां विकास एक जरूरी हद तक ही महदूद कर दिया जाए।

इससे पूर्व के क्योटो प्रोटोकाल में तो विकसित देशों के लिए कुछ खास लक्ष्य नहीं था। अमीर देशों के लिए भी उत्सर्जन में पांच फीसद की कमी 2012 तक करनी थी। लेकिन ‘पेरिस समझौते’ की सबसे बड़ी खासियत यही है कि इसमें कार्बन उत्सर्जन को रोकने के लिए एक सार्वभौमिक लक्ष्य तय किया गया। लेकिन इसका सीधा असर भारत और चीन जैसे विकासशील देशों पर आने वाला है जहां विकास की गति बनाए रखने की बड़ी चुनौती होगी। इस बार वित्तीय मदद के मामले में सभी के लिए खुशी का विषय है। कम से कम वित्तीय मदद एक अरब डॉलर है, लेकिन जो देश ज्यादा मदद कर सकते हैं, उनसे यह अपेक्षा की जा रही है कि अधिक मदद के लिए बढ़ कर आगे आएंगे।

क्योटो प्रोटोकाल के विपरीत पेरिस में लक्ष्य प्राप्ति का जायजा लेने की समय-सीमा 15 वर्ष से कम करके पांच वर्ष कर दी गई है। जबकि सभी देशों में यह निरीक्षण दो वर्ष में एक बार होगा। इससे लक्ष्य हासिल करने के लिए दबाव लगातार बने रहने की संभावना प्रबल है। पेरिस में विकसित देशों से यह अपेक्षा है कि उनका उत्सर्जन का लक्ष्य शून्य को हासिल करेगा, जबकि विकासशील देशों से कहा गया है कि वे उत्तरोतर अपने लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में कदम उठाएं। लेकिन इस मसले पर अगर अमीर देशों का पिछला रिकॉर्ड बना रहा और वे अपनी जिद पर अड़े रहे तो विकासशील देशों की तमाम कोशिशें धरी रह जाएंगी।

जाहिर तौर पर पेरिस में जिस तरह एक हरी-भरी परिकल्पना सामने आई है, उससे सबका खुश होना स्वाभाविक है। लिहाजा भारत भी खुश है। लेकिन उसके व्यावहारिक पक्ष को जांच कर देश में प्रयास आज से ही शुरू करने होंगे, ताकि दूर की मंजिल कुछ पास आ सके। वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी पर काबू पाने का सवाल केवल किसी एक देश का नहीं है, समूची धरती और पूरी मानवता के साथ-साथ जीव-जगत का भी है।

 

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