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संपादकीयः राष्ट्रगान का मर्म

यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस समय देश आजादी की सत्तरवीं सालगिरह मनाने की तैयारी कर रहा है, एक स्कूल में प्रबंधक की तरफ से राष्ट्रगान की मनाही होने की खबर आई।
Author August 10, 2016 03:10 am

यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस समय देश आजादी की सत्तरवीं सालगिरह मनाने की तैयारी कर रहा है, एक स्कूल में प्रबंधक की तरफ से राष्ट्रगान की मनाही होने की खबर आई। स्कूल के प्रबंधक ने मनाही की वजह यह बताई है कि राष्ट्रगान की पंक्ति ‘भारत भाग्य विधाता’ गैर-इस्लामी है। प्रबंधक का यह रवैया घोर मनमानी भरा और राष्ट्र की गरिमा के खिलाफ है। उसे इस तरह का फतवा देने का क्या हक है? राष्ट्रगान को इस तरह के किसी संकीर्ण नजरिए से कैसे देखा जा सकता है?

मदरसों के बारे में यह शिकायत अक्सर की जाती है कि उनका जोर मजहबी पढ़ाई पर रहता है, वे आधुनिक और प्रगतिशील दृष्टिकोण नहीं अपनाते, दकियानूसी नजरिए को पोसते रहते हैं। लेकिन मजे की बात है कि यह स्कूल कोई मदरसा नहीं है। इलाहाबाद के सादियाबाद इलाके में एमए कानवेन्ट नाम का यह स्कूल बारह वर्षों से चल रहा था और जैसा कि अब पता चल रहा है, प्रबंधक ने इसमें शुरू से राष्ट्रगान पर रोक लगा रखी थी। रोक के पीछे प्रबंधक ने यह दलील दी है कि विद्यार्थियों के अभिभावकों ने ‘भारत भाग्य विधाता’ को गैर-इस्लामी बताते हुए एतराज जताया था। स्कूल के तीन सौ बच्चों में दो सौ बच्चे हिंदू परिवारों के थे।

क्या प्रबंधक ने उन परिवारों की भी राय ली थी? फिर, यह कैसे मान लिया जाए कि सभी मुसलिम अभिभावकों ने एतराज जताया ही होगा? राष्ट्रगान की इजाजत न होने पर प्रधानाध्यापिका समेत कई शिक्षकों ने इस्तीफा दे दिया। दूसरी ओर, राष्ट्रगान के अपमान पर प्रबंधक को गिरफ्तार कर लिया गया है। इस गिरफ्तारी के साथ यह खुलासा भी हुआ है कि नर्सरी से आठवीं तक का यह स्कूल बारह साल से बिना मान्यता के चल रहा था। यह कैसे संभव हुआ? इसकी जांच होनी चाहिए, ताकि पता चले कि बिना मान्यता के इस तरह बरसों-बरस स्कूल चलाते रहने के लिए और कौन-कौन जिम्मेवार हैं?

पर सवाल सिर्फ बिना मान्यता के स्कूल चलाने का नहीं, बल्कि यह भी है कि जहां राष्ट्रगान की मनाही हो, वहां से बच्चे कैसी शिक्षा हासिल करके निकलेंगे? उनका बौद्धिक विकास कैसा होगा? किसी भी देश का राष्ट्रगान देशप्रेम की भावना, उसके गौरव-बोध और वहां की जनता के सम्मिलित संघर्ष की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति होता है। इसे कम से कम कुछ प्रमुख अवसरों पर अवश्य गाया जाता है और इसके प्रति सम्मान प्रकट करने के कुछ कायदे भी बने होते हैं। जैसे, राष्ट्रगान के समय खड़े रहना अनिवार्य है। भारत का राष्ट्रगान आजादी की लड़ाई की देन है। इसकी रचना रवींद्रनाथ ठाकुर ने की और इसे सबसे पहले दिसंबर, 1911 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में गाया गया था।

इसे चौबीस जनवरी, 1950 को संविधान सभा ने विधिवत राष्ट्रगान की मान्यता दी। आजादी के लिए लड़ने वालों में सभी धर्मों और सभी समुदायों के लोग शामिल थे। संविधान सभा में भी वैसा ही विविध प्रतिनिधित्व था। लेकिन किसी को नहीं लगा कि कोई पंक्ति किसी समुदाय की भावना को आहत करती है। दूसरे कई देशों के राष्ट्रगान में जहां किसी सम्राट की स्तुति और सामरिक भाव प्रबल है, वहीं भारत का राष्ट्रगान वैविध्य के समावेश से ओतप्रोत है। यह दिलचस्प है कि रवींद्रनाथ के ही एक ही गीत ‘आमार सोनार बांग्ला’ को बांग्लादेश ने अपने राष्ट्रगान के रूप में चुना। धर्म और राष्ट्र में कोई एक दूसरे से बड़ा या छोटा नहीं है, दोनों अलग-अलग आयाम हैं और उन्हें इसी रूप में लिया जाना चाहिए।

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