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मीडिया की मर्यादा

खबरों की प्रस्तुति में पक्षधरता से इतर ऐसे सवाल अक्सर उठते रहे हैं कि संवेदनशील मसलों पर भी मीडिया, खासकर टीवी चैनलों का सनसनी फैलाने वाला रुख कितना उचित है।
Author August 10, 2015 08:32 am
खबरों की प्रस्तुति में पक्षधरता से इतर ऐसे सवाल अक्सर उठते रहे हैं कि संवेदनशील मसलों पर भी मीडिया, खासकर टीवी चैनलों का सनसनी फैलाने वाला रुख कितना उचित है।

खबरों की प्रस्तुति में पक्षधरता से इतर ऐसे सवाल अक्सर उठते रहे हैं कि संवेदनशील मसलों पर भी मीडिया, खासकर टीवी चैनलों का सनसनी फैलाने वाला रुख कितना उचित है। हाल में मुंबई बम विस्फोटों के एक दोषी याकूब मेमन की फांसी से संबंधित खबरों के प्रसारण के दौरान तीन टीवी चैनलों के रुख पर आपत्ति जताते हुए सरकार ने उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया।

सरकार की नजर में इन चैनलों पर याकूब को फांसी से संबंधित खबरों के दौरान कुछ ऐसे साक्षात्कार प्रसारित किए गए, जो राष्ट्रपति और सर्वोच्च न्यायालय के प्रति असम्मान दर्शाने वाले थे। इसमें कुख्यात छोटा शकील का फोन पर लिया गया साक्षात्कार दिखाना और उसके जरिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाना शामिल है। इसके अलावा, एक चैनल पर याकूब मेमन के वकील ने यह कहते हुए फांसी की सजा से असहमति जाहिर की कि कई देशों ने मृत्यु-दंड पर रोक लगा दी है।

कायदे से इसे एक संवेदनशील खबर पर अलग-अलग पक्षों की राय के तौर पर देखा जाना चाहिए। अक्सर अदालती फैसलों पर बहसें होती रही हैं और एक लोकतांत्रिक शासन-प्रणाली में इसमें कुछ गलत भी नहीं है। लेकिन जब कानूनविदों से सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पक्ष-विपक्ष में राय ली जा सकती है, तो फिर किसी टीवी चैनल को एक कुख्यात अपराधी का बयान लेने की जरूरत क्यों महसूस हुई?

जहां तक याकूब के वकील का दूसरे बहुत सारे देशों में मृत्यु-दंड पर रोक के हवाले से फांसी से असहमति जाहिर करने का सवाल है, इस पर सरकार की आपत्ति भी समझना मुश्किल है। मौत की सजा पर बहस नई नहीं है, इसे खत्म करने की मांग पुरानी है। दूसरे, याकूब के वकील की राय को एक ऐसे पक्ष के तौर पर देखा जा सकता है, जिसने संविधान के दायरे में अपने मुवक्किल की ओर से पैरवी की थी।

याकूब को फांसी दिए जाने का मामला आखिरी समय में संवेदनशील बन गया था। मीडिया का ज्यादातर हिस्सा जहां फांसी को जायज मानने वाले आम मानस के हिसाब से खबरों की प्रस्तुति कर रहा था, वहीं कुछ चैनलों ने मृत्यु-दंड का प्रावधान खत्म करने की मांग करने वाले दूसरे पक्ष को भी प्रसारित किया। क्या इसे मीडिया की जिम्मेदारी के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए?

हालांकि ऐसी शिकायतें आम रही हैं कि जिन घटनाओं को लेकर मीडिया को संतुलित खबरें देनी चाहिए, उनकी प्रस्तुतियां कई बार उन्माद पैदा करने की हद तक चली जाती हैं। इसलिए मीडिया को नियंत्रित करने से लेकर स्वनियमन तक पर लगातार बहसें होती रही हैं। पर इस दिशा में कोई भी ढांचा तय करते हुए यह ध्यान रखना चाहिए कि अगर मीडिया के लिए अभिव्यक्ति की आजादी की जगह नहीं छोड़ी गई, तो इससे न सिर्फ पत्रकारिता पर से भरोसा घटेगा, बल्कि लोकतंत्र भी कमजोर होगा। इसी तरह, अपनी विश्वसनीयता बचाए रखने के लिए मीडिया को भी सनसनी और उन्माद फैलाने से बचना होगा।

 

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