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जी-बीस की राह

अमेरिका और चीन समेत दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं वाले बीस देशों का समूह तब बना था जब दुनिया मंदी के दौर से गुजर रही थी। उस वक्त इसमें विकसित देशों की दिलचस्पी..
Author नई दिल्ली | November 16, 2015 22:49 pm
तुर्की के पर्यटन नगरी अंताल्या में जुटे जी20 देशों के नेताओं की सामूहिक तस्वीर। (रॉयटर्स फोटो)

अमेरिका और चीन समेत दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं वाले बीस देशों का समूह तब बना था जब दुनिया मंदी के दौर से गुजर रही थी। उस वक्त इसमें विकसित देशों की दिलचस्पी अधिक थी, क्योंकि उन्हें लगता था कि चीन और भारत के विशाल बाजारों के सहारे वे मंदी से उबर सकते हैं। उनका यह ख्रयाल किसी हद तक सही निकला। जी-बीस की प्रासंगिकता साबित हुई और तब से हर साल इसका शिखर सम्मेलन होता रहा है। अब तक इसके हर सम्मेलन में आर्थिक सहयोग, व्यापार और निवेश बढ़ाना ही मुख्य मुद््दा होता था, जो कि इसके गठन की बुनियाद था। इस बार आर्थिक सहयोग के अलावा, अगले महीने पेरिस में होने वाले वैश्विक जलवायु सम्मेलन के मद््देनजर कार्बन उत्सर्जन कटौती के उपायों पर चर्चा तय थी। यह नहीं कहा जा सकता कि ये मसले नजरअंदाज कर दिए गए, हां यह जरूर हुआ कि ये हाशिये पर खिसक गए और पेरिस पर हुआ हमला और आइएस का आतंकवाद केंद्रीय विषय हो गया। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि पेरिस पर हुए आतंकवादी हमले ने सारी दुनिया को स्तब्ध कर दिया है। फिर, दहशतगर्दी की धमक जी-बीस शिखर सम्मेलन के मेजबान देश तुर्की में भी सुनाई दी, जहां गाजियानतेप में पुलिस छापे के दौरान आइएस से जुड़े एक आतंकी ने खुद को विस्फोट से उड़ा लिया।

9/11 यानी न्यूयार्क पर आतंकवादी हमले के बाद इटली में हुए जी-7 के शिखर सम्मेलन में भी आतंकवाद ही केंद्रीय मसला बन गया था। अगर दुनिया खुद को सुरक्षित ही महसूस न करे, तो विकास का सपना कैसे देख सकती है। जी-बीस भले कुछ ही देशों का मंच है, पर इस समूह की व्यापकता और प्रभाव का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इन देशों में कुल मिला कर विश्व की दो-तिहाई आबादी रहती है और ये देश सम्मिलित रूप से दुनिया की पचासी फीसद अर्थव्यवस्था का प्रतिनिधित्व करते हैं। इनमें बड़े विकसित देश भी शामिल हैं और बड़े विकासशील देश भी। इसलिए चाहे आर्थिक विकास का मामला हो या पर्यावरण को बचाने का, जी-बीस के साझा प्रयासों का महत्त्व किसी भी अन्य अंतररष्ट्रीय मंच की तुलना में अधिक हो सकता है। क्या आतंकवाद की बाबत भी यही बात कही जा सकती है?

इसका सटीक जवाब तो भविष्य ही देगा, पर यह जरूर हुआ कि तुर्की के अंताल्या शहर में जी-बीस के शिखर सम्मेलन के लिए जुटे नेताओं ने एक सुर में आतंकवाद से लड़ने का संकल्प जताया और आइएस के नेटवर्क को नेस्तनाबूद करने की बात कही। दूसरी ओर संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की-मून ने आतंकवाद से निपटने के लिए विस्तृत योजना बनाने के संकेत दिए हैं। अगले महीने होने वाले पेरिस जलवायु सम्मेलन के मद्देनजर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सात साल में भारत की अक्षय ऊर्जा उत्पादन क्षमता को चौगुना करने और जीवाश्म र्इंधन पर सबसिडी घटाने का संकल्प जताते हुए प्रमुख देशों का आह्वान किया कि वे 2020 तक प्रतिवर्ष सौ अरब डॉलर का हरित जलवायु कोष बनाना सुनिश्चित करें। मोदी ने इस मौके पर जलवायु संकट से निपटने के वैश्विक प्रयासों को आगे बढ़ाने की खातिर सात सूत्र सुझाए। इनमें ‘कार्बन क्रेडिट’ से ‘ग्रीन क्रेडिट’ की ओर जाने, 2030 तक शहरों में आवागमन के साधनों में सार्वजनिक परिवहन प्रणालियों का हिस्सा बढ़ा कर तीस फीसद तक पहुंचाने, स्वच्छ ऊर्जा के लिए विकासशील देशों को तकनीक और वित्तीय मदद देने जैसे सुझाव शामिल हैं। मंदी से जूझने में जी-बीस ने एकजुटता का परिचय दिया था। जलवायु संकट से निपटने में भी क्या वैसी ही साझेदारी और संजीदगी दिखेगी?

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