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त्रासदी और फैसला

उपहार सिनेमा अग्निकांड के मामले में आए सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने पीड़ितों को मायूस किया है। उन्हें उम्मीद थी कि अगर न्यायालय दोषियों की सजा बढ़ाएगा नहीं, तो कम से कम उसे बरकरार रखेगा।
Author August 21, 2015 07:58 am
उपहार अग्निकांड : अंसल भाइयों पर 60 करोड़ का जुर्माना, लेकिन अब जेल नहीं जाएंगे

उपहार सिनेमा अग्निकांड के मामले में आए सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने पीड़ितों को मायूस किया है। उन्हें उम्मीद थी कि अगर न्यायालय दोषियों की सजा बढ़ाएगा नहीं, तो कम से कम उसे बरकरार रखेगा। मगर सर्वोच्च अदालत ने अंसल बंधुओं की अपंील के दौरान जेल में बिताए गए वक्त को ही पर्याप्त मान लिया। इस तरह उनकी कैद की अवधि छह महीने भी नहीं रही। जबकि कानून की जिस धारा के तहत उन्हें दोषी ठहराया गया उसके अंतर्गत अधिकतम सजा दो साल है। अंसल बंधुओं को कैद से राहत देते हुए सर्वोच्च अदालत ने दोनों को तीस-तीस करोड़ रुपए जुर्माना भरने को कहा है। कुल साठ करोड़ रुपए जुर्माने की रकम दिल्ली सरकार को एक ट्रामा सेंटर बनाने के लिए दी जाएगी।

पीड़ित परिवारों का कहना है कि उन्हें अठारह साल बाद भी न्याय नहीं मिला। उनकी प्रतिक्रियाएं स्वाभाविक हैं। इसके अलावा भी, इस फैसले को लेकर खासकर दो सवाल उठे हैं। एक यह कि जब सर्वोच्च न्यायालय ने भी अंसल बंधुओं को दोषी ठहरा दिया था, तब सजा की मियाद क्यों घटा दी गई? दूसरे, फैसले को ऐसा रूप क्यों दिया गया मानो यह केवल हर्जाने का मामला हो। गौरतलब है कि तेरह जून 1997 को दिल्ली के ग्रीन पार्क स्थित सिनेमा हॉल में फिल्म दिखाए जाने के दौरान आग लग गई। इससे उनसठ लोग मारे गए और सौ से ज्यादा घायल हो गए। सिनेमा हॉल के मालिकों सुशील अंसल और गोपाल अंसल समेत सोलह लोगों को पुलिस ने आरोपी बनाया। निचली अदालत ने 2007 में अंसल बंधुओं को दो साल कैद की सजा सुनाई। इसके तेरह महीने बाद दिल्ली हाइकोर्ट ने उनकी सजा आधी कर दी।

इस मामले की जांच सीबीआइ ने की थी। उसने जो तथ्य और सबूत निचली अदालत और फिर हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट को सौंपे, उनमें यह बात शामिल थी कि सिनेमा हॉल में न सिर्फ सुरक्षा मानकों की अनदेखी की गई थी, बल्कि ज्यादा सीटें लगाने के चक्कर में ऐसे नियम-विरुद्ध फेरबदल भी किए गए जो संकट के समय दर्शकों के निकलने में बाधा बने। लिहाजा, निचली अदालत से लेकर सर्वोच्च स्तर तक, मामले की सुनवाई करने वाले सभी जजों ने अंसल बंधुओं को दोषी करार दिया। लेकिन सजा के मामले में अलग-अलग रुख रहा और वह नरम होता गया। हाइकोर्ट ने निचली अदालत में सुनाई गई सजा घटा कर आधी कर दी। मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा।

पिछले साल मार्च में सुनवाई कर रहे दोनों जज दोषसिद्धि पर तो एकमत थे, मगर सजा को लेकर उनकी अलग-अलग राय थी। पर दोनों में से कोई हाइकोर्ट से मिली सजा घटाने के पक्ष में नहीं था। दो राय होने के कारण मामला तीन जजों के खंडपीठ को सौंपा गया, और इसने भी आरोपियों की दोषसिद्धि को बरकरार रखा। पर दोषियों के जेल में रहने का जो वक्त मुकर्रर किया वह संबंधित प्रावधान में निश्चित की गई अधिकतम कैद के चौथाई से भी कम है। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले नजीर माने जाते हैं। उनसठ लोगों की जिंदगी लील जाने वाले भयानक हादसे से जुड़ी आपराधिक लापरवाही के मामले में आए फैसले ने कैसी मिसाल कायम की है!

 

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