March 26, 2017

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संपादकीयः बेकाबू आतंक

एक हफ्ते के भीतर काबुल में हुए दूसरे हमले से फिर यही साबित हुआ है कि आइएसआइएस किस तरह अपने पांव तेजी से फैला रहा है।

Author March 10, 2017 02:43 am
आतंकी संगठन आईएसआईएस अपने लड़ाकों को नरभक्षी बनने की ट्रेनिंग दे रहा है। (Indian Express)

एक हफ्ते के भीतर काबुल में हुए दूसरे हमले से फिर यही साबित हुआ है कि आइएसआइएस किस तरह अपने पांव तेजी से फैला रहा है। पिछले हफ्ते काबुल में खुफिया सेवा के दफ्तर और पुलिस स्टेशन पर किए गए हमलों में दर्जनों लोग मारे गए या घायल हुए थे। इस बार आतंकियों ने अफगानिस्तान के सबसे बड़े सैन्य अस्पताल को निशाना बनाया और डॉक्टरों का वेश धर कर तीस से ज्यादा लोगों को मार डाला। करीब चार दर्जन लोग घायल हो गए। मौजूदा दौर में अफगानिस्तान में तालिबान और आइएसआइएस के रूप में आतंक के दो ध्रुव काम कर रहे हैं, इसलिए स्वाभाविक ही यह सवाल उभरा कि इसमें किसका हाथ हो सकता है। मगर आइएस की ओर से जारी एक बयान में इस घटना की जिम्मेदारी ली गई, तो अफगान तालिबान के प्रवक्ता ने इसमें अपना कोई हाथ होने से इनकार किया। हाल ही में अफगानिस्तान सरकार ने चेतावनी जारी की थी कि इस साल काबुल में अत्यंत सुरक्षित मानी जाने वाली जगहों पर आतंकी हमले हो सकते हैं।

दरअसल, कुछ समय पहले तालिबान के साथ सरकार की शांति वार्ता नाकाम हो गई थी और उसके स्वाभाविक नतीजे में संभावित आतंकी हमलों से निपटने की तैयारी चल रही थी। इसके अलावा, पिछले महीने अमेरिकी जनरल जॉन निकोलसन ने जब गरमियों में आतंकी हमलों को रोकने के लिए अफगानिस्तान में गठबंधन सेना के हजारों अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती की बात कही, तो सरकार ने उसका समर्थन किया था। दूसरी ओर हाल के लगातार हमलों से यह जरूर साफ हो रहा है कि आतंकी अब काबुल के सबसे सुरक्षित घेरों को तोड़ने में कामयाब हो रहे हैं। काबुल के सैन्य अस्पताल के अधिकारियों ने कहा कि अस्पतालों पर हमले को किसी भी रूप में न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता।

पर सच यह है कि आतंकियों के लिए यह कोई नैतिक या संवेदना का प्रश्न कतई नहीं होता है कि उन्हें कहां हमला करना है और किन्हें बख्श देना है। इससे पहले भी दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अस्पताल या स्कूल पर हमला कर न जाने कितने मरीजों और बच्चों को मार डाला गया है। पाकिस्तान में पेशावर के स्कूल में आतंकी हमला कर जिस तरह करीब डेढ़ सौ मासूम बच्चों को मार डाला गया था, उससे दुनिया भर में आतंकवादी समूहों के एजेंडे और राजनीति को लेकर चिंता पैदा हुई थी। लगभग छह महीने पहले काबुल में ही अमेरिकन यूनिवर्सिटी आॅफ अफगानिस्तान पर आतंकियों ने हमला कर सोलह से ज्यादा लोगों को मार डाला था।

ऐसी घटनाओं को अंजाम देते हुए आतंकियों से किसी संवेदना की उम्मीद करना बेमानी है। इसलिए काबुल के अस्पताल में इतने सारे लोगों को मार डालना हैरान नहीं करता। यों भी यह दुनिया से छिपा नहीं है कि हिंसा को अपने लिए धर्म की तरह मानने वाले तालिबान ने समूचे अफगानिस्तान में राजनीति से लेकर समाज तक की क्या दशा कर दी है। अब वहां आइएसआइएस की घुसपैठ ने हिंसा की होड़ को और जटिल बना दिया है। लेकिन अब ऐसे सवाल तेजी से उभरने लगे हैं कि तालिबान या आइएसआइएस के पीछे कौन खड़ा है। अफगानिस्तान ने कई बार पाकिस्तान पर अपने सीमा क्षेत्र में तालिबान को समर्थन देने का आरोप लगाया है। दूसरी ओर, अमेरिका की अगुआई वाला आतंकवाद विरोधी अंतरराष्ट्रीय गठबंधन भी है। पर आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक रणनीति की आखिर वह कौन-सी कमजोरी है, जिसके चलते ऐसे हमलों पर रोक नहीं लग पा रही!

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First Published on March 10, 2017 2:43 am

  1. R
    raj kumar
    Mar 10, 2017 at 4:59 am
    अब समय आ गया हे की आतंक की परिभाषा दुबारा परिभाषित की जाये, और हमारे राजनेता वोट की राजनीत के कारण कट्टरवाद और गुण्डातत्वों व् भ्रस्ट राजनेताओ के खिलाफ न सिर्फ कड़ाई से करवाई करनी होगी बल्कि लोगो को भी समझाना पड़ेगा, दूसरे बाटने वाली राजनीत नहीं होनी चाहिए और बहुद्धिजीवी वर्ग के खिलाफ भी माहौल बनाना होगा जो इन तत्वों का समर्थन करने का आधार तैयार करते हैं तभी हम आतंकवाद से मुक्ति पा सकते हैं दूसरे धारा ३७० जितना जल्द हो उतनी जल्दी खत्म हो ताकि कश्मीरी और शेष भारत के बीच दुरी घटे.तभी देश का कल्याण
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