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संपादकीयः परंपरा और अधिकार

महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर मंदिर के न्यासी मंडल ने महिलाओं के प्रवेश की रजामंदी दे दी है। जाहिर है, यह महिलाओं के संघर्ष की जीत है और समानता के उनके अधिकार का एक और मुकाम।
Author April 9, 2016 02:11 am

महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर मंदिर के न्यासी मंडल ने महिलाओं के प्रवेश की रजामंदी दे दी है। जाहिर है, यह महिलाओं के संघर्ष की जीत है और समानता के उनके अधिकार का एक और मुकाम। पर उनकी यह उपलब्धि न्यासी मंडल की पहल का नतीजा नहीं है, बल्कि इसका श्रेय भूमाता ब्रिगेड के आंदोलन और मुंबई उच्च न्यायालय के फैसले को जाता है। पिछले दिनों अपने एक फैसले में न्यायालय ने कहा था कि पूजास्थल में प्रवेश पुरुषों की तरह महिलाओं का भी बुनियादी अधिकार है और यह सरकार की जिम्मेवारी है कि वह उनके इस अधिकार को लागू करे और उन्हें सुरक्षा मुहैया कराए।

उच्च न्यायालय के इस फैसले के बाद राज्य सरकार पर भी दबाव बढ़ गया था और मंदिर के न्यासी मंडल पर भी। न्यासियों का ताजा रुख उसी दबाव का नतीजा है। न्यासी मंडल को यह अहसास हो गया होगा कि सदियों से चले आ रहे प्रतिबंध को जारी रखना अब संभव नहीं हो सकेगा। समाज का एक वर्ग परंपरा की खातिर या परंपरा के नाम पर ऐसे प्रतिबंध को बनाए रखने का हिमायती हो सकता है, पर अब उन्हें इसके लिए उतना व्यापक समर्थन नहीं मिल सकता जिसे आम सामाजिक सहमति कह सकें। दरअसल, मंदिरों में प्रवेश से संबंधित ये नियम-कायदे तब बने या विकसित हुए जब संविधान, कानून, नागरिक अधिकार आदि हमारे सार्वजनिक जीवन के निर्धारक तत्त्व नहीं थे। पर अब ये सार्वजनिक जीवन की अहम कसौटियां हैं। इसलिए इनकी अनदेखी नहीं की जा सकती।

आस्था के तर्क से पूजास्थलों की एक स्वायत्तता हो सकती है, होनी भी चाहिए, पर समानता तथा नागरिक अधिकार के मूल्य के साथ भी उन्हें अपना मेल बिठाना होगा। शनि शिंगणापुर मंदिर में स्त्रियों का प्रवेश वर्जित होने की परिपाटी के कई समर्थकों की दलील थी कि इस वर्जना को स्त्रियों के प्रति भेदभाव के रूप में नहीं, बल्कि उन्हें अमंगल से बचाने के एक धार्मिक विधान के रूप में देखा जाना चाहिए। पर जब शनि के तमाम मंदिरों में स्त्रियां जाती हैं तो केवल शनि शिंगणापुर को अपवाद बनाए रखना उनके तर्क का बचाव नहीं कर सकता। कुछ लोग केरल के सबरीमाला मंदिर का भी उदाहरण देते रहे हैं, जहां मासिक धर्म के आयुवर्ग की स्त्रियों का प्रवेश वर्जित है। सबरीमाला का मामला भी अदालत में है।

सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए तीन महीने पहले सर्वोच्च अदालत ने कहा था कि संवैधानिक आधार पर ऐसा नहीं किया जा सकता; मंदिर धार्मिक आधार पर (यानी अन्य धर्मावलंबियों के लिए) तो प्रतिबंध लगा सकते हैं, मगर लैंगिक आधार पर नहीं। सबरीमाला मामले में अंतिम फैसला अभी नहीं आया है, पर जाहिर है शनि शिंगणापुर मामले में मुंबई उच्च न्यायालय का फैसला सर्वोच्च अदालत के रुख से एकदम मेल खाता है।

दो धाराओं के बीच द्वंद्व में शुरू में जरूर खटास दिखती है, पर कई बार सकारात्मक परिणाम आता है; परंपरा अपने को बदलती है, नवीकृत भी करती है। शनि शिंगणापुर में जमाने से चली आ रही पाबंदी हटने को इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। इस तरह के कुछ और भी उपासना स्थल हैं, अन्य समुदायों के भी हैं जहां स्त्रियों के जाने पर रोक है। उम्मीद की जानी चाहिए कि ये प्रतिबंध वहां भी हटाए जाएंगे।

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