ताज़ा खबर
 

पहले टमाटर अब प्याज

सबसे बड़ी विडंबना तो यह है कि एक तरफ किसान टमाटर और प्याज का वाजिब दाम पाने को तरस गए, तो दूसरी ओर आम लोग इन्हें खरीद पाने में खुद को असमर्थ पा रहे हैं।
Author August 7, 2017 05:22 am
दिल्ली में सब्जी बेचता एक विक्रेता। (फाइल फोटो)

पहले टमाटर की कीमतें आसमान चढ़ीं और अब प्याज की कीमतें उपभोक्ता की आंखों में आंसू ला रही हैं। जब किसानों को पैदावार की वाजिब कीमत दिए जाने की मांग उठती है, तो कुछ लोग यह डर दिखाते हैं कि ऐसा करने पर कृषि उत्पादों की कीमतें बढ़ जाएंगी, और इस हद तक बढ़ जाएंगी कि आम उपभोक्ता की क्रय-शक्ति से बाहर हो जाएंगी। लेकिन सबसे बड़ी विडंबना तो यह है कि एक तरफ किसान टमाटर और प्याज का वाजिब दाम पाने को तरस गए, तो दूसरी ओर आम लोग इन्हें खरीद पाने में खुद को असमर्थ पा रहे हैं। जबकि ये दोनों चीजें हर रसोईघर का हिस्सा और दैनिक उपभोग की चीजें हैं। दो महीनों के भीतर टमाटर के दाम कई गुना बढ़े हैं, सौ रुपए प्रतिकिलो तक भी पहुंच गए। जबकि मई में कई जगह लागत-मूल्य भी न निकल पाने के कारण टमाटर फेंक दिए जाने की खबरें आई थीं। उसी चीज का दाम खुदरा बाजार तक आते-आते चार सौ-पांच सौ फीसद तक कैसे चढ़ गया? आखिर यह बीच का इतना भारी अंतर क्यों? यही हाल प्याज का भी है। कई जगह पचास पैसे प्रतिकिलो तक की दर से किसान प्याज मंडियों में बेचने को मजबूर हुए। गुजरात के अमरेली में तो मई में हजारों किलो प्याज किसानों ने सड़कों पर फेंक दिया था। लेकिन उसी चीज की कीमत बाजार में एक महीने में तीन गुनी हो चुकी है। कीमतों में इतनी तेज बढ़ोतरी न तो कोई नई बात है न रहस्य ही।

जिन्हें कृषि अर्थशास्त्र का ककहरा भी मालूम है, वे जानते हैं कि उपज जब तक किसान के पास रहती है तब तक उसकी कीमत काफी गिरी रहती है, जब उसके हाथ से निकल जाती है तब, यानी जब किसान की विक्रेता की भूमिका समाप्त हो चुकी होती है, तब कृषि उत्पादों के दाम तेजी से चढ़ने लगते हैं। साफ है कि बाजार में जो कीमत उपभोक्ता चुकाते हैं उसका लाभ किसानों को नहीं मिलता, व्यापारियों, बिचौलियों, जमाखोरों और सट््टेबाजों को मिलता है। कृषि उत्पादों की कीमतों की बेजा बढ़ोतरी में कई बार कुछ और कारण भी जुड़ जाते हैं। मसलन, आयात-निर्यात के गलत या संदिग्ध फैसले। कई बार यह देखा गया है कि पैदावार अच्छी हुई, मगर अचानक निर्यात पर रोक लगा दी गई, या उसी चीज के आयात पर शुल्क हटा लिया गया। भंडारण की बदइंतजामी भी एक कारक है। मध्यप्रदेश में भंडारण की उचित व्यवस्था न होने से प्याज सड़ने की खबर आई है। हमारे देश में भंडारण और प्रसंस्करण की पर्याप्त सुविधाएं न होने के चलते, एक मोटे अनुमान के मुताबिक, एक लाख करोड़ रु. के कृषि उत्पाद हर साल नष्ट हो जाते हैं।

देश में शीतगृहों की भंडारण क्षमता में तीस लाख से चालीस लाख टन की कमी है। यों तो उदारीकरण का दौर शुरू होने के बाद से ढांचागत विकास पर बहुत जोर दिया जाता रहा है, यह कहते हुए कि यही विकास की सबसे अहम कुंजी है। लेकिन कृषि उत्पादों की भंडारण व प्रसंस्करण व्यवस्था को और सक्षम बनाने को कभी प्राथमिकता नहीं दी गई, जबकि यह लोगों की कहीं ज्यादा बुनियादी जरूरत से जुड़ा मसला है। टमाटर और प्याज की कीमतों को केवल फौरी शिकायत के रूप में न देख कर, किसानों और आम ग्राहकों, दोनों की तकलीफों के मद््देनजर देखें, तो यह एक बहुत बड़े विरोधाभास का आईना है। सबक भी।
कीमत की मार

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग