ताज़ा खबर
 

अंधविश्वास का दायरा

कितना विचित्र है कि अपनी किस्मत सुधारने या चमत्कारी तरीके से धन-संपत्ति पाने के लालच में लोग लाखों पशुओं की बलि चढ़ा देते हैं। नेपाल में आस्था की दलील पर करीब तीन सौ साल से गढ़ीमाई मंदिर में अंधविश्वासों को मजबूत करने वाली पशुबलि प्रथा बेहद बर्बर शक्ल में जारी थी। हालांकि कई स्वयंसेवी संगठन […]
Author July 30, 2015 17:09 pm

कितना विचित्र है कि अपनी किस्मत सुधारने या चमत्कारी तरीके से धन-संपत्ति पाने के लालच में लोग लाखों पशुओं की बलि चढ़ा देते हैं। नेपाल में आस्था की दलील पर करीब तीन सौ साल से गढ़ीमाई मंदिर में अंधविश्वासों को मजबूत करने वाली पशुबलि प्रथा बेहद बर्बर शक्ल में जारी थी।

हालांकि कई स्वयंसेवी संगठन और लोग इस तरह जानवरों की बलि पर रोक लगाने का अभियान चला रहे थे। अब उसका कुछ असर पड़ा है। गढ़ीमाई मंदिर न्यास ने घोषणा की है कि वहां 2019 में होने वाले पूजा समारोह में पशुओं की बलि नहीं दी जाएगी। यह पशुओं के प्रति संवेदना रखने वालों की बड़ी जीत कही जा सकती है। गौरतलब है कि नेपाल में गढ़ीमाई मंदिर में हर पांच साल के अंतराल पर होने वाली पूजा के दौरान एक समय पांच लाख तक की तादाद में पशुओं की बलि दी जाती थी।

नेपाल की सीमा से सटे भारतीय इलाकों से भी लोग उसमें बड़ी तादाद में शामिल होते थे। भारत से भारी संख्या में पशु ले जाए जाते थे। सामाजिक संगठनों की लगातार कोशिशों के बाद भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने पशुओं को नेपाल ले जाने पर पाबंदी लगा दी थी, जिसके चलते 2014 में आयोजित समारोह में मारे गए मवेशियों की तादाद घट कर पांच हजार रह गई थी। पिछले साल ह्यूमन सोसाइटी इंटरनेशनल इंडिया और एनिमल वेलफेयर नेटवर्क नेपाल जैसे संगठनों ने भी गढ़ीमाई मंदिर में होने वाली बलि की रिवायत के खिलाफ व्यापक अभियान चलाया था।

हालांकि दुनिया के अनेक देशों में पशुओं की बलि देकर अपनी मनोकामना पूरी करने का अंधविश्वास आज भी कायम है। भारत में कई अवसरों पर पशुओं की बलि देने की प्रथा छिपी नहीं हैं। ग्रामीण और कई बार शहरों में भी लोग बीमार पड़ने पर बैगा, गुनिया या ओझा-तांत्रिकों के पास चले जाते हैं, जो किसी रोग को जादू-टोना बता कर उसे ठीक करने के लिए पशु की बलि चढ़ाने की सलाह दे देते हैं।

ऐसे अंधविश्वास में पड़ कर बलि के नाम पर किसी मासूम बच्चों तक की हत्या कर देने की खबरें आती रही हैं। इक्कीसवीं सदी में जब दुनिया का विज्ञान ब्रह्मांड की तमाम गुत्थियां सुलझाने में रोज नई कामयाबियां दर्ज कर रहा है, ऐसी धारणाओं का बने रहना अपने आप में किसी समाज के पिछड़े सोच को ही दर्शाता है। यह अपने आप में विडंबना है कि एक ओर जहां लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी वैज्ञानिक आविष्कारों से सुविधाजनक होती गई है, पर दूसरी ओर ऐसे अंधविश्वासों से समाज का पीछा नहीं छूट पाया है कि किसी अबोध पशु की हत्या करने से उनकी किस्मत अच्छी हो जाएगी या घर धन से भर जाएगा।

इन सबके पीछे वजह दरअसल वैज्ञानिक चेतना को मजबूत करने वाली शिक्षा का उचित प्रचार-प्रसार न होना है। चूंकि सरकारों की ओर से भी जन-जागरूकता के लिए कोई ठोस कार्यक्रम नहीं चलाया जाता और न स्कूली शिक्षा में अंधविश्वासों के खिलाफ कोई सुचिंतित पाठ शामिल किया जाता है, इसलिए पीढ़ी-दर-पीढ़ी ऐसी अमानवीय वृत्तियां समाज में चलती रहती हैं। किसी भी आधुनिक देश में ऐसी प्रथाएं मनुष्यता पर धब्बा हैं। इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए प्रशासन के स्तर पर तंत्र-मंत्र और जादू-टोना को बढ़ावा देने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने और समाज में अंधविश्वासों के खिलाफ शैक्षिक और जन-जागरूकता कार्यक्रम चलाने की जरूरत है।

 

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- http://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- http://twitter.com/Jansatta

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग