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संपादकीयः इबादत का हक

पिछले कुछ महीनों के दौरान पूजा-स्थलों में महिलाओं के प्रवेश पर घोषित-अघोषित पाबंदी के खिलाफ जो अभियान चले, उसका असर अब साफ दिखने लगा है।
Author July 8, 2016 00:50 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

पिछले कुछ महीनों के दौरान पूजा-स्थलों में महिलाओं के प्रवेश पर घोषित-अघोषित पाबंदी के खिलाफ जो अभियान चले, उसका असर अब साफ दिखने लगा है। करीब तीन महीने पहले महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर मंदिर में भीतर जाकर महिलाओं को पूजा करने में मिली कामयाबी के बाद अब इसका दायरा मुसलिम समुदाय तक भी पहुंचा है। तहजीब का शहर कहे जाने वाले लखनऊ की ऐशबाग ईदगाह में पहली बार औरतों ने ईद की नमाज अता की। यों इस ईदगाह के दरवाजे महिलाओं के लिए बंद नहीं थे, मगर पहले उनके लिए नमाज का अलग इंतजाम नहीं किया जाता था। अब इस मसले पर उठी मांग का दबाव बढ़ने के बाद मौलानाओं को झुकना पड़ा और ऐशबाग ईदगाह में ईद की नमाज में तकरीबन पांच हजार महिलाएं भी शामिल हुर्इं।

समाज की आधी आबादी होने के बावजूद उन्हें मस्जिद में इबादत करने से वंचित रखा जाता रहा है। पर अब इस वंचना के खिलाफ एक शुरुआत हुई है, और उम्मीद की जानी चाहिए कि लखनऊ की यह मिसाल बाकी देश में मुसलिम समुदाय को अनुसरण करने के लिए प्रेरित करेगी। महिलाओं को इससे जीवन की मुख्यधारा में शामिल होने की ओर बढ़ने का मौका मिलेगा। यों मजारों पर जाकर इबादत करने के मामले में महिलाओं पर कोई पाबंदी नहीं रही है। लेकिन मस्जिदों या इबादतगाहों में उनकी मौजूदगी अमूमन नहीं रही है।

लखनऊ में हुई शुरुआत से पहले, एक आंदोलन हिंदू महिलाओं का हुआ। महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर मंदिर के गर्भ-गृह तक जाकर पूजा-अर्चना करने का हक उन्होंने लगातार अपने संघर्ष के जरिए हासिल किया। ये मामले अदालतों तक भी पहुंचे, और अदालतों ने यही व्यवस्था दी कि अन्य मामलों की तरह पूजा-अर्चना के मामले में भी महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार हासिल हैं। अलबत्ता धर्मगुरुओं का एक हिस्सा आज भी महिलाओं को पूजा-स्थलों में प्रवेश देने पर सहमत नहीं है और उनके ऐसा करने पर अनिष्ट की आशंका जाहिर कर साधारण लोगों के बीच भय पैदा करने की कोशिश करता है। गौरतलब है कि शनि शिंगणापुर मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के बाद एक धर्मगुरु ने टिप्पणी की थी कि ऐसा होने के बाद बलात्कार के मामले बढ़ेंगे।

इसी तरह, हाजी अली दरगाह में औरतों के मजार तक जाने पर दरगाह के ट्रस्ट ने कहा था कि वहां महिलाओं को प्रवेश देना पाप होगा। इसी तरह की धारणाओं का नतीजा है कि कुछ समय पहले शनि शिंगणापुर मंदिर में प्रवेश को लेकर चलाए गए अभियान के दौरान महिलाओं को स्थानीय लोगों के विरोध का तो सामना करना पड़ा ही, प्रशासन की बेरुखी भी झेलनी पड़ी। इसके बरक्स ऐशबाग ईदगाह के मामले में एक फर्क यह रहा कि स्त्रियों के हक में आवाज बुलंद करने वाली संस्थाओं के ईदगाह में नमाज में पढ़ने के इरादे जताने के बाद खुद इस्लामिक सेंटर आॅफ इंडिया ने पहल की और फिर वहां शांतिपूर्ण तरीके से महिलाओं ने नमाज अता की। इस पहल का महत्त्व इस लिहाज से भी है कि देश में कुछ समय से मुसलिम पर्सनल लॉ पर बहस चल रही है और इसमें कई सुधार चाहने वालों की तादाद मुसलिम समाज के भीतर भी बढ़ रही है।

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