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कालेधन पर नजर

नोटबंदी के फलस्वरूप पैदा हुई अफरातफरी से पार पाने के बाद अब सरकार ने विदेशों में जमा काले धन के भी खिलाफ कार्रवाई शुरू करने के संकेत दिए हैं।
प्रतीकात्मक चित्र

केंद्र सरकार बराबर यह संदेश देना चाह रही है कि काले धन पर काबू पाने के लिए वह कोई कसर नहीं छोड़ेगी। नोटबंदी के फलस्वरूप पैदा हुई अफरातफरी से पार पाने के बाद अब सरकार ने विदेशों में जमा काले धन के भी खिलाफ कार्रवाई शुरू करने के संकेत दिए हैं। उसने स्विट्जरलैंड से कुल दस भारतीय नागरिकों और इकाइयों का बैंकिंग ब्योरा मांगा है। लंबे समय से स्विट्जरलैंड के कुछ बैंक, जो गुप्त खातों की सुविधा देते हैं, कर-चोरी या काले धन की पनाहगाह के रूप में बदनाम रहे हैं। लेकिन धीरे-धीरे स्विट्जरलैंड पर इस बात के लिए अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ता गया है कि वह कम से कम उन मामलों में गोपनीयता न बरते जिनमें किसी देश की सरकार को यह शक हो कि उसके नागरिक का स्विस बैंक में जमा पैसा अवैध रूप से अर्जित किया हुआ है। बराक ओबामा के कार्यकाल में अमेरिका ने इसी आधार पर स्विट्जरलैंड से काफी सूचनाएं हासिल की थीं। फिर अन्य देशों के लिए भी गुंजाइश पैदा हुई।

पिछले साल भारत और स्विट्जरलैंड के बीच एक समझौैता हुआ, जिसके तहत स्विस सरकार गुप्त खातों की बाबत, संदिग्ध मामलों में, सूचनाएं साझा करने को राजी हुई। अलबत्ता अपने घरेलू कानून के चलते, स्विस सरकार मांगी गई सूचनाएं फौरन मुहैया नहीं कराती। संबंधित खाताधारकों को आपत्ति या स्पष्टीकरण दर्ज कराने तथा सूचनाएं मांगने के अनुरोध को खारिज करने के लिए अपील करने का मौका देती है। भारत सरकार के ताजा अनुरोध पर स्विस सरकार ने यही किया है, संबंधित खाताधारकों को नोटिस जारी कर तीस दिनों में जवाब देने को कहा है। यह खबर ऐसे वक्त आई है जब प्रवर्तन निदेशालय ने धनशोधन के मामले में देश भर में सैकड़ों फर्जी या संदिग्ध कंपनियों पर छापे डाले हैं। इसलिए स्विस बैंक से सूचनाएं साझा करने के भारत सरकार के अनुरोध को भी काले धन के खिलाफ अभियान की अगली कड़ी के तौर पर देखा जा रहा है।

मगर शेयर बाजार में पहचान छुपा कर निवेश करने की छूट देने वाले प्रावधान को खत्म करने की पहल क्यों नहीं हो रही है? स्विट्जरलैंड को इस तरह के अनुरोध पहले भी भेजे गए हैं। इसलिए जल्दी ही कुछ नतीजा निकलने की उम्मीद पालना अति उत्साह होगा। फिर, विरोधाभास यह है कि सरकार एक तरफ काले धन केखिलाफ सक्रियता का संदेश देती है, और दूसरी तरफ, नोटबंदी के फलस्वरूप कितना काला धन पकड़ में आया इसका हिसाब देना जरूरी नहीं समझती। जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों से कितनी जाली मुद्रा जब्त हुई, इस सवाल को भी केंद्र ने बड़ी चतुराई से टाल दिया है। सरकार के सुर में सुर मिलाते हुए रिजर्व बैंक ने भी ऐसा ही रवैया अपना रखा है। आरबीआइ यह बताने को तैयार नहीं है कि इकतीस मार्च तक पुराने नोट जमा करने की इजाजत क्यों नहीं दी गई, जबकि प्रधानमंत्री के एलान में इसका आश्वासन दिया गया था।

दूसरा विरोधाभास यह है कि सरकार ने वित्त विधेयक के जरिए नया प्रावधान यह किया है कि अब कंपनियां राजनीतिक दलों को चाहे जितना चंदा दे सकती हैं; जबकि पहले वे तीन साल के अपने शुद्ध मुनाफे के औसत के साढ़े सात फीसद से ज्यादा चंदा नहीं दे सकती थीं। यही नहीं, पहले के नियम के विपरीत, कहीं यह बताने या दर्ज करने की जरूरत नहीं होगी कि उन्होंने किस पार्टी को कितना चंदा दिया है। यह मानी हुई बात है कि काले धन की समस्या से तब तक पार नहीं पाया जा सकता जब तक चुनावों को पारदर्शी नहीं बनाया जाता। फिर, चुनावी चंदे को पहले से भी ज्यादा रहस्यमय बनाने की तजवीज सरकार ने क्यों की?

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