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नृशंसता का मानस

इस वारदात की वीभत्सता का एक दिल दहलाने वाला उदाहरण यह है कि अस्पताल में इसकी खबर लेने गए एक टीवी चैनल के कैमरामैन की वहां का खूनी मंजर देख कर दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई।
Author नई दिल्ली | March 1, 2016 01:15 am
इन मृतकों में हत्यारे की दुधमुंही बेटी समेत उसके माता-पिता, तीन सगी बहनें और उनके बच्चे शामिल हैं।

मुंबई के पास ठाणे में एक शख्स ने अपने ही परिवार के चौदह सदस्यों की बर्बतापूर्वक हत्या करके संवेदनशील समाज को तो दहलाया ही है, इंसानियत को भी शर्मसार कर दिया है। इन मृतकों में हत्यारे की दुधमुंही बेटी समेत उसके माता-पिता, तीन सगी बहनें और उनके बच्चे शामिल हैं। इस वारदात के बाद हालांकि हत्यारे ने खुद भी फांसी के फंदे पर झूल कर जान दे दी लेकिन उसके जुर्म ने उन सवालों को जिंदा कर दिया है जो एक अपराधी की क्रूरता की वजहों और हदों को लेकर लंबे समय से जवाब मांगते रहे हैं। आखिर कोई इतना जालिम कैसे हो सकता है कि अपनी तीन माह की बच्ची के गले पर छुरी चलाते हुए उसकी रूह न कांपे? जिन माता-पिता ने जन्म दिया, पाला-पोसा उन्हीं की गर्दन काटने में कलेजा न थर्राए? जिस पत्नी को ब्याह कर लाया, जिन बहनों के साथ खेलते हुए बचपन के खूबसूरत पल बिताए उन्हें उनके बच्चों सहित मौत के घाट उतारने में दिल न दहले, न अंतरात्मा कचोटे?

इस वारदात की वीभत्सता का एक दिल दहलाने वाला उदाहरण यह है कि अस्पताल में इसकी खबर लेने गए एक टीवी चैनल के कैमरामैन की वहां का खूनी मंजर देख कर दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई। अपराधशास्त्रियों के मुताबिक ऐसे बर्बर हत्याकांडों में अक्सर अनपढ़-जाहिल अपराधी शामिल पाए जाते हैं लेकिन ठाणे का यह हत्यारा संपन्न परिवार से ताल्लुक रखता था, पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट था और एक निजी टैक्स सलाहकार कंपनी में ऊंचे वेतन पर कार्यरत था। गरीबी और अशिक्षा का अपराध और बर्बरता से रिश्ता जोड़ने की अवधारणा को शीर्षासन कराने वाली यह वारदात बताती है कि अपराधी की नृशंसता को तमाम हदें पार करने में देर नहीं लगती। यह दिल्ली के निर्भया कांड से लेकर आए दिन घटित होने वाले अपराधों में अफसोसनाक रूप से जाहिर होता रहा है।

क्रूरता के कीर्तिमान कायम करने का यह सिलसिला कानूनों की मजबूत किलेबंदी के बावजूद थमने का नाम नहीं ले रहा है तो इसके मूल में निहित वजहों की शिनाख्त किया जाना जरूरी है। यह कड़वा सच है कि सभ्यता के तमाम विकास और आर्थिक-शैक्षिक उपलब्धियों के बावजूद कई मायनों में हम अभी तक सभ्य नहीं हो पाए हैं। बात-बात में आपा खो देना, विरोध को दुश्मनी और दुश्मनी को हत्या तक ले जाना आम हो गया है। मामूली कहासुनी में सीधे खूनखराबे पर उतर आना भी खूब देखने को मिल रहा है।

महज पचास रुपए के लिए कत्ल, लड़की पर फब्ती कसने से रोकने वाले बुजुर्ग को पीट-पीट कर अधमरा कर देने, बचाव की गुहारों की अनसुनी करने, राह चलते रास्ता मांगने या हॉर्न बजाने पर जानलेवा रोडरेज की की खबरें अखबारों में खूब छपती रहती हैं। सड़क दुर्घटनाओं में घायलों को मरने के लिए तड़पता छोड़ कर आगे बढ़ जाने के वाकये भी सामने आते रहते हैं। यह बेरहम परिदृश्य हमारे समाज के जिस चेहरे को सामने लाता है, क्या उसका संवेदनाओं से दूर का भी कोई नाता है? यह चौतरफा अमानवीयता ही घनीभूत होकर न केवल समाज, बल्कि उसमें घटित अपराधों की जघन्यता में भी प्रकट हो रही है। आज बर्बर अपराधों का ग्राफ तेजी से ऊपर जा रहा है तो इसे महज कानून-व्यवस्था का मामला कह कर दरकिनार करना आत्मघाती होगा।

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