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संपादकीयः नोटा का पेच

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यसभा चुनाव में ‘नोटा’ (इनमें से कोई नहीं) के विकल्प पर रोक लगाने की कांग्रेस की याचिका खारिज कर दी।
Author August 5, 2017 00:04 am
शीर्ष अदालत के एक फैसले के बाद से निर्वाचन आयोग चुनावों में नोटा का प्रावधान मतदाताओं को उपलब्ध करा रहा है। (File Photo)

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यसभा चुनाव में ‘नोटा’ (इनमें से कोई नहीं) के विकल्प पर रोक लगाने की कांग्रेस की याचिका खारिज कर दी। राज्यसभा चुनाव में नोटा पर रोक लगाने का अनुरोध स्वीकार न होने से कांग्रेस को गहरा झटका लगा है, जो गुजरात में बड़ी मुश्किल में दिखती है। गुजरात से राज्यसभा की तीन सीटों के लिए अगले हफ्ते चुनाव होना है। भाजपा के पास जितने वोट हैं उनके आधार पर वह दो उम्मीदवार आसानी से जिता सकती है। लेकिन उसने तीन उम्मीदवार खड़े किए हैं। क्यों? पिछले दिनों का घटनाक्रम इसका संकेत दे देता है। कांग्रेस के छह विधायक इस्तीफा दे चुके हैं। कांग्रेस का आरोप है कि पार्टी में इस सेंधमारी के पीछे भाजपा का हाथ है। कुछ और विधायक ऐसा ही कदम न उठाएं, इस डर से कांग्रेस ने गुजरात के अपने बाकी विधायकों को बेंगलुरु के एक रिसॉर्ट में ठहराया हुआ है, ताकि उनसे सौदेबाजी के लिए कोई संपर्क न कर सके। सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस के वकील से पूछा कि नोटा का प्रावधान राज्यसभा चुनाव में अप्रैल 2014 से है, इससे पहले आपने विरोध क्यों नहीं किया। इस सवाल से भी जाहिर है कि नोटा को लेकर कांग्रेस की बेचैनी खासकर गुजरात को लेकर है जहां सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल एक बार फिर उम्मीदवार हैं। लेकिन गौरतलब है कि बाद में भाजपा भी नोटा के खिलाफ फरियाद लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई।

दरअसल, भाजपा को भी लगा होगा कि आज भले वह सुविधाजनक स्थिति में है, पर नोटा की गाज कभी उसके ऊपर भी गिर सकती है। जिस तरह राज्यसभा चुनाव में धनशाली उम्मीदवारों की संख्या और वोटों की खरीद-फरोख्त के मामले बढ़ते गए हैं उसे देखते हुए कुछ भी हो सकता है। राज्यसभा चुनाव से पहले आम चुनाव में नोटा का विकल्प दिया गया। इसके पीछे मकसद यह था कि अगर मतदाता को कोई भी प्रत्याशी पसंद न हो तो उसे मतदान में इसे अभिव्यक्त करने का अधिकार दिया जाए। लेकिन क्या राज्यसभा चुनाव को आम चुनाव के समकक्ष रखा जा सकता है? लोकसभा या विधानसभा के चुनाव में मतदाता देश के सारे नागरिक होते हैं जिनका न तो उम्मीदवारों की चयन प्रक्रिया में दखल होता है न उनमें से ज्यादातर लोग किसी पार्टी का हिस्सा होते हैं। पर क्या विधायकों को भी यह कहने का हक होना चाहिए कि उन्हें अपनी पार्टी का उम्मीदवार पसंद नहीं है? संभव है कि पार्टी हाइकमान ने जो उम्मीदवार तय किया हो उसे लेकर वे असंतुष्ट हों। पर ऐसा तो पार्टी-नेतृत्व के और भी निर्णयों की बाबत हो सकता है। होना तो यह चाहिए कि सारी पार्टियों में सामान्य आंतरिक लोकतंत्र स्थापित हो।

एक तरफ दलबदल कानून और विप का प्रावधान है, जिसका उल्लंघन करने पर सदन की सदस्यता से हाथ धोना पड़ सकता है, और दूसरी तरफ यह छूट कि कोई विधायक चाहे तो राज्यसभा में अपनी पार्टी के उम्मीदवार को वोट न भी दे! जो प्रावधान आम चुनाव में एक मतदाता की नापसंदगी के इजहार का जरिया है, वही राज्यसभा चुनाव में जोड़-तोड़ और सेंधमारी का औजार भी बन सकता है। दोनों चुनावों में जो फर्क है उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। राज्यसभा चुनाव में बेहतर यह होगा कि उम्मीदवारों के चयन में पार्टी हाइकमान ही निर्णायक न हो, विधायक दल की भी सहमति ली जाए। पर जिस पार्टी से कोई विधायक हो, राज्यसभा चुनाव में उसी पार्टी के प्रत्याशी को नकारने का विकल्प, खतरों से भरा विकल्प है। इस पर बहस शुरू में ही होनी चाहिए थी। पर अब भी हो, तो क्या हर्ज है? अच्छा है कि सर्वोच्च न्यायालय इस मामले के संवैधानिक नुक्तों पर सुनवाई के लिए राजी है।

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