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परीक्षा का प्रश्न

सरकार एक बार फिर स्कूली शिक्षा प्रणाली में बदलाव करना चाहती है। शिक्षा से संबंधित केंद्रीय सलाहकार बोर्ड की बैठक में आठवीं कक्षा तक बच्चों को फेल न करने का नियम समाप्त करने पर सहमति बनी है।
Author August 21, 2015 07:55 am
8वीं तक फेल न करने की नीति होगी खत्म, 10वीं में बोर्ड परीक्षा पर भी पुनर्विचार! (फोटो: अविनाश श्रीवास्तव)

सरकार एक बार फिर स्कूली शिक्षा प्रणाली में बदलाव करना चाहती है। शिक्षा से संबंधित केंद्रीय सलाहकार बोर्ड की बैठक में आठवीं कक्षा तक बच्चों को फेल न करने का नियम समाप्त करने पर सहमति बनी है। इस बारे में पंद्रह दिनों के भीतर सभी राज्य सरकारों से लिखित रजामंदी मांगी गई है। बोर्ड परीक्षाओं को लेकर तनाव बढ़ने की वजह से बच्चों में खुदकुशी की प्रवृत्ति पैदा होने के मद्देनजर यूपीए सरकार के समय बस्ते का बोझ कम करने, पाठ्यक्रम आसान बनाने, आठवीं कक्षा तक किसी भी विद्यार्थी को फेल न करने और दसवीं में बोर्ड परीक्षा को वैकल्पिक बनाने जैसेनियम लागू किए गए थे।

इससे बच्चों में पढ़ाई-लिखाई को लेकर तनाव तो जरूर कम हुआ, पर परीक्षा का दबाव हटने से उनमें शिथिलता जड़ें जमाती गई। पिछले कुछ सालों में पढ़ाई-लिखाई की गुणवत्ता पर भी इसका असर साफ दिखा है। बोर्ड परीक्षाओं में जहां नकल की प्रवृत्ति तेज हुई है, वहीं बच्चों के फेल होने का आंकड़ा बढ़ा है। इस तरह उनमें सीखने और दक्षता विकास की गति मंद पड़ी है। आठवीं तक विद्यार्थियों को फेल न करने और दसवीं की बोर्ड परीक्षा को वैकल्पिक बनाने के पीछे एक मकसद यह भी था कि दसवीं के बाद बच्चों को उनकी रुचियों के मुताबिक कौशल अर्जित करने संबंधी पढ़ाई की तरफ उन्मुख किया जाएगा। मगर अभी तक ऐसी पढ़ाई-लिखाई की व्यवस्था नहीं हो पाई है, जिसके चलते दसवीं के बाद बच्चों को नियमित पाठ्यक्रमों में ही दाखिला लेना होता है। फिर उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।

इन तमाम स्थितियों को देखते हुए काफी समय से शिक्षाविद परीक्षाओं को शिथिल बनाने का विरोध करते रहे हैं। उनका तर्क वाजिब है कि अगर शुरू से ही बच्चों में पढ़ाई-लिखाई को लेकर प्रतिस्पर्द्धा नहीं बनाए रखेंगे, तो दसवीं के बाद उनमें कौशल विकास को लेकर सक्रियता पैदा कर पाना कठिन होगा। आठवीं तक किसी भी बच्चे को फेल न करने के नियम का नतीजा यह हुआ है कि राज्य बोर्डों की परीक्षाओं में नकल की प्रवृत्ति काफी तेजी से पनपी है। बीते शिक्षा सत्र में जिस तरह बिहार, हरियाणा आदि राज्यों में परीक्षा केंद्रों पर खुलेआम नकल की तस्वीरें आर्इं उससे परीक्षा प्रणाली को लेकर नई चर्चाएं उठीं।

अभी तक स्थिति यह है कि बोर्ड परीक्षाओं में भी आंतरिक मूल्यांकन के तहत स्कूल खुद अपने विद्यार्थियों के व्यवहार और पाठ्येतर गतिविधियों में सक्रियता आदि के आधार पर अंक देते हैं। देखा गया है कि इसमें स्कूल सभी विद्यार्थियों को अधिकतम अंक दे देते हैं। इस तरह उनके अनुत्तीर्ण होने की संभावना कम रह जाती है। फिर दसवीं बोर्ड परीक्षा के प्रश्नपत्र इस बात को ध्यान में रख कर तैयार किए जाते हैं कि उन्हें हल करने में विद्यार्थी को बहुत परेशानी न हो। सवाल है कि विद्यार्थी की योग्यता का आकलन करने का एकमात्र जरिया अगर परीक्षा है, तो उसमें शिथिलता क्यों बरती जानी चाहिए। विद्यार्थियों को तनावमुक्त करने का यह तरीका नहीं हो सकता कि उन्हें परीक्षा से छूट दे दी जाए। अलबत्ता परीक्षा पद्धति में बदलाव किया जा सकता है।

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  1. S
    sudhir pareek
    Sep 1, 2015 at 6:18 pm
    बहुत अच्छा है
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    Reply