December 09, 2016

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संपादकीयः टोल का पैमाना

डीएनडी यानी दिल्ली-नोएडा डायरेक्ट फ्लाइवे पर टोल टैक्स वसूली बंद करने का इलाहाबाद हाइकोर्ट का आदेश जहां संबंधित कंपनी के लिए बहुत बड़ा झटका है, वहीं मुसाफिरों के लिए बहुत बड़ी राहत।

Author October 28, 2016 02:43 am

डीएनडी यानी दिल्ली-नोएडा डायरेक्ट फ्लाइवे पर टोल टैक्स वसूली बंद करने का इलाहाबाद हाइकोर्ट का आदेश जहां संबंधित कंपनी के लिए बहुत बड़ा झटका है, वहीं मुसाफिरों के लिए बहुत बड़ी राहत। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के लाखों लोगों ने स्वाभाविक ही इस फैसले को एक खुशखबरी की तरह लिया है। इसमें दो राय नहीं कि डीएनडी का टोल टैक्स जारी रहने को लेकर कई वाजिब सवाल थे। पर इसके लिए ज्यादा दोष सरकार या नोएडा प्राधिकरण का था, जिसने नोएडा टोल ब्रिज कंपनी के साथ ऐसा विचित्र करार किया, जो न जनहित की कसौटी पर खरा उतर रहा था, न न्यायिक समीक्षा में टिक सका। हालांकि यह मामले का अंत नहीं है, क्योंकि कंपनी ने फैसले के खिलाफ सर्वोच्च अदालत में अपील करने का इरादा जता दिया है। अंतत: सर्वोच्च अदालत के आदेश से ही तय होगा कि डीएनडी पर टोल टैक्स फिर से वसूला जा सकेगा, या हमेशा के लिए बंद हो जाएगा। सुप्रीम कोर्ट का रुख जो भी हो, वह केवल डीएनडी के लिए मायने नहीं रखेगा, क्योंकि देश के बहुत-से हिस्सों में टोल को लेकर विवाद और तनाव कायम हैं, जो कभी दबे रहते हैं और कभी फूट पड़ते हैं। 9.2 किलोमीटर लंबे और आठ लेन वाले डीएनडी के टोल टैक्स को लेकर भी काफी समय से नाराजगी थी और इस मसले पर कई बार धरना-प्रदर्शन हो चुके थे। मामला अदालत में भी पहुंचा। नोएडा रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन की याचिका पर ही इलाहाबाद हाइकोर्ट ने फैसला सुनाया है। गौरतलब है कि नोएडा प्राधिकरण और नोएडा टोल ब्रिज कंपनी के बीच डीएनडी फ्लाइवे बनाने का करार हुआ था। बाद में कहा गया कि पूरी लागत वसूल करने तक कंपनी टोल टैक्स वसूल सकेगी। यह करार एक अप्रैल, 2031 तक के लिए किया गया। यानी तय हुआ कि कंपनी इस तारीख तक वसूली करने के बाद नोएडा प्राधिकरण को फ्लाइओवर सौंप देगी, पर यह शर्त भी शामिल की गई कि अगर प्राधिकरण करार निरस्त करता है तो कंपनी को 2168 करोड़ रुपए देने होंगे।


वर्ष 2001 में टोल शुरू हुआ तो लागत साढ़े चार सौ करोड़ अनुमानित थी, लेकिन बाद में परियोजना पूरी होने पर कंपनी ने कहा कि लागत 2168 करोड़ पर पहुंच गई है। मोटा अनुमान है कि लागत से ज्यादा ही रकम कंपनी वसूल चुकी है। फिर, जैसा कि हाइकोर्ट ने भी कहा, करार के तहत लागत की गणना गलत तरीके से की गई। मुसाफिरों से बहुत ज्यादा कर उगाहने के बाद भी कर वसूलने का हक उत्तर प्रदेश औद्योगिक विकास अधिनियम के विरुद्ध है। पर सवाल है कि प्राधिकरण ने ऐसा करार मंजूर ही कैसे किया? लागत का गलत हिसाब प्राधिकरण के तत्कालीन आला अफसरों की पकड़ में क्यों नहीं आया? फिर, कंपनी को वसूली का हक लागत की बिना पर दिया गया, तो अप्रैल 2031 तक का समय किस आधार पर तय हुआ? प्राधिकरण ने एक तरफ तो लागत की गणना में कंपनी की मनमानी मान ली और दूसरी तरफ वसूली की समय-सीमा की बाबत भी। एक निजी कंपनी तो अधिक से अधिक मुनाफा बटोरने की फिराक में रहेगी ही, लोकहित का खयाल रखने का जिम्मा तो असल में नोएडा प्राधिकरण का था। उसने एक इतना अजीब करार कैसे कर लिया, जो किसी के भी गले नहीं उतरा? बुनियादी ढांचे के विस्तार में, खासकर उदारीकरण का दौर शुरू होने के बाद से, निजी पूंजी की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। लेकिन समाज को इसकी क्या कीमत चुकानी होगी, यह भी एक अहम सवाल है।

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First Published on October 28, 2016 2:42 am

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