May 25, 2017

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संपादकीयः सार्क की मुश्किल

श्रीलंका के प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने भी आतंकवाद के मसले पर भारत का साथ दिया है। उन्होंने दक्षिण एशियाई देशों के संगठन सार्क को बिखरने से बचाने पर जोर दिया।

Author October 7, 2016 02:52 am

श्रीलंका के प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने भी आतंकवाद के मसले पर भारत का साथ दिया है। उन्होंने दक्षिण एशियाई देशों के संगठन सार्क को बिखरने से बचाने पर जोर दिया। विक्रमसिंघे ने कहा कि सीमा पर आतंकवादी गतिविधियों को रोकने के लिए सभी सार्क देशों को मिल कर काम करने की जरूरत है। तनावपूर्ण स्थिति बनी रहने से इसका हल नहीं निकाला जा सकता। अगर सार्क बिखर गया, तब भी आतंकवाद पर लगाम लगने का दावा नहीं किया जा सकता। छिपी बात नहीं है कि पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी संगठन न सिर्फ भारत, अफगानिस्तान, बांग्लादेश जैसे सार्क देशों के लिए सुरक्षा संबंधी मुश्किलें पेश कर रहे हैं, बल्कि दुनिया भर में उनके सूत्र जुड़े हुए हैं। इसलिए दुनिया के ज्यादातर देशों ने पाकिस्तान पर अपने यहां चल रहे आतंकी शिविरों को बंद करने का दबाव बनाया है। मगर सार्क की भूमिका इस मामले में इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि इसके सदस्य आपसी सहयोग से सीमा पर आतंकवादी गतिविधियों को रोकने में प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं। सार्क का गठन दक्षिण एशिया में व्यापार, वाणिज्य और शांति प्रयासों के मकसद से किया गया था। इसलिए सार्क के घोषणापत्र में खासतौर पर कहा गया कि इसका कोई भी सदस्य देश आतंकवादी गतिविधियों के लिए किसी भी रूप में अपनी धरती का इस्तेमाल नहीं होने देगा। मगर उस घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करने के बावजूद पाकिस्तान आतंकवादी संगठनों को संरक्षण देने से बाज नहीं आता। भारत की तरफ से अनेक मौकों पर उसके यहां चल रहे आतंकी शिविरों के सबूत पेश किए जा चुके हैं, मगर वह उन्हें सिरे से खारिज करता आ रहा है। ऐसे में उड़ी हमले के बाद भारत को इस्लामाबाद में आयोजित सार्क शिखर सम्मेलन में हिस्सा न लेने का निर्णय करना पड़ा।

भारत के समर्थन में लगभग सभी सार्क देश उतर आए। यह पहली बार हुआ है। सार्क नियमों के मुताबिक एक भी देश के अनुपस्थित रहने पर शिखर सम्मेलन आयोजित नहीं किया जा सकता। ऐसी स्थिति में पाकिस्तान को खुद इस्लामाबाद में सार्क सम्मेलन का आयोजन रद्द करना पड़ा। अब आशंका यह उठ खड़ी हुई है कि अगर भारत और पाकिस्तान के बीच इसी तरह तनाव का माहौल बना रहा तो कहीं सार्क संगठन बिखर न जाए। अगर ऐसा हुआ तो दक्षिण एशियाई देशों की आर्थिक बेहतरी के लिए तैयार साझा योजनाएं अधर में लटक जाएंगी। चूंकि इस संगठन में भारत की भूमिका महत्त्वपूर्ण है, इसलिए स्वाभाविक ही सबकी नजरें उसकी तरफ लगी हुई हैं। मगर टेढ़ा काम यह है कि पाकिस्तान को आतंकवादी संगठनों पर नकेल कसने को कैसे विवश किया जाए। अमेरिका सहित अनेक देश उसे इसकी नसीहत दे चुके हैं, पर ऐसा करना उसके बूते से बाहर होता गया है। पाकिस्तान के आतंकवादी संगठन वहां की सेना और खुफिया एजेंसी आइएसआइ के संरक्षण में पनाह पाए हुए हैं। और ये दोनों महकमे किस कदर ताकतवर और बेकाबू हो चुके हैं, यह भी छिपी बात नहीं है। वहां की सरकार को कट््टरपंथी ताकतों, सेना और आइएसआइ के दबाव में फैसले करने पड़ते हैं। ऐसी स्थिति में सार्क देशों को मिल कर सोचने की जरूरत है कि इस समस्या से कैसे पार पाया जा सकता है। पाकिस्तान को अलग-थलग करने की भारत की रणनीति कुछ हद तक कामयाब हो रही है। अंतरराष्ट्रीय मंचों से उस पर लगातार दबाव बन रहा है। अगर सारे सार्क देश उससे व्यापारिक-वाणिज्यिक संबंध तोड़ लेंगे तो उसकी मुश्किलें और बढ़ जाएंगी।

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First Published on October 7, 2016 2:51 am

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