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संपादकीयः कटौती के सहारे

करीब दस माह बाद रिजर्व बैंक ने नीतिगत दरों में कटौती का एलान किया, तो इसकी वजह जाहिर है।
Author August 4, 2017 02:57 am
भारतीय रिजर्व बैंक (फोटो सोर्सः इंडियन एक्सप्रेस)

करीब दस माह बाद रिजर्व बैंक ने नीतिगत दरों में कटौती का एलान किया, तो इसकी वजह जाहिर है। खुदरा महंगाई में लगातार कमी, बेहतर मानसून और मैन्युफैक्चरिंग में गिरावट के मद्देनजर रिजर्व बैंक से ऐसे ही कदम की अपेक्षा की जा रही थी जिसके सहारे वृद्धि दर का ग्राफ कुछ ऊपर उठाया जा सके। अब रेपो दर छह फीसद हो गई है और रिवर्स रेपो दर 5.75 फीसद। रेपो वह दर होती है जिस पर रिजर्व बैंक, बैंकों को उनकी फौरी जरूरतें पूरी करने के लिए नकदी मुहैया कराता है। रिवर्स रेपो का मतलब है वह दर जिस पर बैंक, रिजर्व बैंक में नकदी जमा कराते हैं। रिजर्व बैंक के ताजा फैसले के फलस्वरूप वाहन, मकान आदि के लिए पहले की अपेक्षा थोड़ा सस्ता कर्ज मिलेगा। इससे बाजार में कुछ तेजी आने की आस लगाई गई है। अलबत्ता शेयर बाजार रिजर्व बैंक के एलान से खुश नहीं हुआ। उसे उम्मीद थी कि नीतिगत दरों में कम से कम पचास अंकों की यानी आधा फीसद की कटौती की जाएगी। शायद वित्त मंत्रालय ने यही आस लगाई थी। लेकिन रिजर्व बैंक को एक झटके में उतनी कटौती करना ठीक नहीं लगा होगा। फिर, अब रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति तय करने में केवल गवर्नर की नहीं चलती; इसके लिए बाकायदा मौद्रिक नीति समिति है।

समिति के छह सदस्यों में से सिर्फ एक ने आधा फीसद कटौती का प्रस्ताव रखा था, जबकि एक ने यथास्थिति बनाए रखने की वकालत की थी। बाकी चार सदस्य चौथाई फीसद कटौती के पक्ष में थे। लिहाजा निर्णय वही हुआ, जो कि स्वागत-योग्य है। पर एक अहम सवाल उठता है कि क्या इस कटौती का पर्याप्त लाभ ग्राहकों को मिल पाएगा? जनवरी 2015 के बाद से अब तक रेपो दर में 1.75 फीसद की कटौती हो चुकी है, मगर शायद एक फीसद से अधिक लाभ ग्राहकों को नहीं मिल सका। खुद आरबीआइ गवर्नर उर्जित पटेल ने यह अंदेशा जताया है कि बैंक संभवत: कटौती का पूरा लाभ ग्राहकों को न दें। इसीलिए उन्होंने बैंकों की ओर से ब्याज दरें तय करने की वर्तमान प्रणाली एमसीएलआर (यानी फंड की मार्जिनल लागत पर आधारित ब्याज दरें) को बदलने का संकेत दिया है। इसके अलावा, उन्होंने पब्लिक क्रेडिट रजिस्ट्री बनाने का मंसूबा जाहिर करते हुए इसके लिए एक उच्चस्तरीय समिति भी गठित कर दी है।

प्रस्तावित रजिस्ट्री में एक प्रकार से देश में कर्ज लेने वाले लोगों का पूरा-लेखा जोखा होगा। इसके आंकड़े हर वित्तीय संस्थान को उपलब्ध होंगे। इससे किसी व्यक्ति या कंपनी को कर्ज देने से पहले बैंक उसके रिकार्ड के बारे में जान सकेंगे। लेकिन जहां तक कटौती का पूरा लाभ ग्राहकों को न मिल पाने के अंदेशे का सवाल है, तो इसके पीछे एक बड़ी वजह बैंकों का एनपीए भी है। ‘बुरे कर्ज’ के आंकड़े बताते हैं कि इसके लिए आम ग्राहक नहीं, करोड़ों के कर्ज लेने वाले जिम्मेवार हैं। एक तरफ किसान मामूली कर्ज न चुका पाने के कारण आत्महत्या कर लेते हैं, और दूसरी तरफ सैकड़ोंं करोड़ के देनदार मजे में रहते हैं। उन्हें राहत देने के लिए उनके कर्ज की राशि ‘पुनर्गठित’ करके कम कर दी जाती है। फिर भी वसूली नहीं हो पाती, तो वह बट्टेखाते में डाल दी जाती है। लेकिन क्या विडंबना है कि रिजर्व बैंक को ताजा मौद्रिक समीक्षा में केवल कृषि कर्जमाफी पर आगाह करने की जरूरत महसूस हुई!

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