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बेखौफ अपराधी

पिछले कुछ समय से गुरुग्राम की सुरक्षा-व्यवस्था पर लगातार सवाल उठते रहे हैं।
Author January 31, 2017 04:08 am
इस तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में शामिल गुरुग्राम में पटौदी के पास मंदपुरा गांव में शनिवार की रात एक फैक्ट्री में आठ लोग पिस्तौल के दम पर घुसे और सो रहे मजदूरों को पीटते-धमकाते हुए वहीं बने अस्थायी कमरों में बंधक बना लिया और दो महिलाओं का सामूहिक बलात्कार किया। इस घटना से एक बार फिर यही जाहिर हुआ है कि चकाचौंध से दमकते इस शहर और इसके आसपास के इलाकों में सुरक्षा-व्यवस्था की क्या दशा है और महिलाएं किस कदर असुरक्षित हैं। हैरानी की बात यह है कि जिस दौर में हर छोटी-बड़ी दुकान तक के पास निजी सुरक्षाकर्मी या रात के चौकीदार रखे जाते हैं, वहां शायद ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी ताकि लोगों को थोड़ा सचेत होने का मौका मिलता। यह सरकार और पुलिस महकमे की ओर से कानून-व्यवस्था के प्रति बरती गई लापरवाही के अलावा ऐसी अनदेखी थी, जिसका खमियाजा वहां फैक्ट्री से गुजारा करने वाले मजदूरों और उनके परिवार की महिलाओं को भुगतना पड़ा।

सुरक्षा और सावधानी को लेकर ऐसी कोताही तब भी कायम रही, जब कुछ समय पहले मेवात इलाके में ऐसी ही एक घटना में अपराधियों ने एक घर में हमला कर परिवार की महिलाओं का सामूहिक बलात्कार किया और दो लोगों की बर्बर तरीके से हत्या कर दी थी। तब चौतरफा आलोचना के बाद हरियाणा सरकार ने उस घटना की सीबीआइ जांच का आदेश दिया था। मगर उसके बाद भी सुरक्षा-व्यवस्था के मोर्चे पर राज्य में क्या हालत है, इसका अंदाजा उसी तरह की इस ताजा घटना से लगाया जा सकता है जिसमें अपराधियों ने चार घंटे तक आराम से अपराध को अंजाम दिया। करीब तीन महीने पहले सुरक्षित क्षेत्र के तौर पर देखे जाने वाले एमजी रोड मेट्रो स्टेशन परिसर में एक युवक ने चाकुओं से गोद कर हत्या कर दी थी। इसके अलावा भी आए दिन वहां से यौनहिंसा की खबरें आती रहती हैं। कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर लापरवाही के आरोपों को बल इसलिए भी मिलता है कि जब पुलिस महकमा सक्रिय हो जाता है तो आपराधिक घटनाओं में अचानक कमी आ जाती है। यही नहीं, जिन अपराधियों का सुराग मिलना मुश्किल होता है, उन्हें पुलिस खोज निकालती है।

पिछले कुछ समय से गुरुग्राम की सुरक्षा-व्यवस्था पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। गुरुग्राम ही क्यों, महिलाओं की सुरक्षा के मामले में दिल्ली समेत समूचे एनसीआर की तस्वीर काफी चिंताजनक है। विडंबना यह है कि चकाचौंध से लबरेज शहरों को जितना हाइटेक और कारोबार का केंद्र बनाने की ओर ध्यान दिया गया है, उतना अपराध-मुक्त बनाने पर नहीं। साामाजिक विकास नीतियों के मसले पर तो शायद विचार ही नहीं किया जाता, कानून-व्यवस्था के मामले में भी ऐसा माहौल बनाने की कोशिश नहीं जाती कि आपराधिक तत्त्वों के भीतर इसे लेकर खौफ हो। यह बेवजह नहीं है कि सुरक्षा और चौकसी के तमाम सरकारी दावों के बावजूद महिलाओं के खिलाफ अपराधों का ग्राफ चिंताजनक स्तर पर बना हुआ है। यह तस्वीर विकास और व्यवस्था के किसी भी प्रचार को झुठलाती है। गुड़गांव का नाम बदल कर गुरुग्राम कर दिया गया। लेकिन सिर्फ नाम के बदलाव से क्या होता है?

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