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चेतावनी का संदेश

गृहमंत्री राजनाथ सिंह के बयान के जरिए भारत सरकार ने एक बार फिर पाकिस्तान को चेताया है कि वह आतंकवाद से बाज आए।
Author December 13, 2016 03:00 am
गृह मंत्री राजनाथ सिंह। PTI Photo by Subhav Shukla

गृहमंत्री राजनाथ सिंह के बयान के जरिए भारत सरकार ने एक बार फिर पाकिस्तान को चेताया है कि वह आतंकवाद से बाज आए। रविवार को जम्मू-कश्मीर के कठुआ में शहीदों के सम्मान में हुए एक समारोह को संबोधित करते हुए केंद्रीय गृहमंत्री ने कहा कि पाकिस्तान याद रखे कि आतंकवाद के सहारे वह जम्मू-कश्मीर को भारत से अलग नहीं कर सकता। इसी के साथ उन्होंने सीमापार के आतंकवाद को भारत में पाकिस्तान द्वारा छेड़े गए छद्मयुद्ध की संज्ञा दी; उन्होंने कहा कि चूंकि पाकिस्तान को चार बार भारत के साथ हुए युद्ध में मुंह की खानी पड़ी है और सीधे मुकाबला कर सकने का उसमें साहस और आत्मविश्वास नहीं है, इसलिए उसने छद्मयुद्ध चला रखा है। सवाल है कि गृहमंत्री को ऐसा सख्त संदेश देने की जरूरत क्यों महसूस हुई। उनके ताजा बयान का एक कारण अवसरोचित हो सकता है। वे शहीदों के सम्मान में हुए एक समारोह को संबोधित कर रहे थे, इसलिए उन्हें ऐसी भाषा में बोलना जरूरी लगा होगा जिससे सुरक्षा बलों की हौसला आफजाई होती हो। पर एक वजह और हो सकती है। उड़ी के आतंकी हमले के बाद भारतीय सेना ने जिस सर्जिकल स्ट्राइक का दावा किया था, उसके अपेक्षित परिणाम नहीं आए हैं।

उस कार्रवाई के बाद यह उम्मीद की जा रही थी कि पाकिस्तान को कड़वा पाठ पढ़ने को मिला होगा और अब आतंकी घटनाएं एकदम से भले न रुकें, पर उनमें काफी कमी आएगी। लेकिन सीमा पार की उस कार्रवाई के बाद घुसपैठ के भी वाकये बढ़े हैं और सैन्य ठिकानों पर हमले के भी। शायद इसका एक कारण मौसम भी होगा। कोहरे का लाभ उठा कर रात में घुसपैठ करने में आतंकी कामयाब हो जाते हैं। हैरत की बात यह है कि वे किसी सैन्य ठिकाने तक पहुंचने, यहां तक कि कई बार उसके भीतर घुसने में भी सफल हो जाते हैं। लिहाजा, आंतरिक सुरक्षा से जुड़ी खुफिया एजेंसियों को और सतर्क रहना होगा। उड़ी के बाद पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर घेरने में भारत ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। इसमें उसे काफी हद तक सफलता भी मिली है। अगर पाकिस्तान एकदम अलग-थलग नहीं पड़ा है तो इसका कारण उसे मिल रहा चीन का सहारा है। चीन ने ही जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को प्रतिबंधित करने के सुरक्षा परिषद में रखे भारत के प्रस्ताव को वीटो कर दिया और उसी के रवैए के चलते पिछले ब्रिक्स सम्मेलन के घोषणापत्र में आतंकवाद के सिलसिले में पाकिस्तान का संदर्भ नहीं आ सका। लेकिन असलियत क्या है दुनिया जानती है।

खुद परवेज मुशर्रफ ने कुछ महीने पहले अपने एक इंटरव्यू में स्वीकार किया था कि जब वह राष्ट्रपति थे, कश्मीर के लिए लड़ने वाले उग्रवादी संगठनों को मदद दी जाती थी। बुरहान वानी को ‘शहीद’ कह कर नवाज शरीफ भी अपना रुख जता चुके हैं। विडंबना यह है कि फिर भी सीमापार से होने वाली घुसपैठ और आतंकवाद के लिए जब पाकिस्तान की जवाबदेही तय करने की बात उठती है, तो पाकिस्तान यह कह कर पल्ला झाड़ने की कोशिश करता है कि ये गैर-राजकीय तत्त्व हैं, ये उसकी नुमाइंदगी नहीं करते। सवाल है कि फिर पाकिस्तान की फौज और आइएसआइ चोरी-छिपे उनकी मदद क्यों करते हैं? और यह अनुभव सिर्फ भारत का नहीं, अफगानिस्तान का भी है, जिसका इजहार पिछले दिनों अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण के उद््देश्य से अमृतसर में हुए हॉर्ट आॅफ एशिया सम्मेलन में अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने किया।

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