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पुलिस का चेहरा

पुलिस के कामकाज के तरीके में सुधार की जरूरत काफी समय से रेखांकित की जाती रही है। इसके लिए कई पुलिस सुधार आयोग और समितियां सुझाव भी दे चुकी हैं..
Author नई दिल्ली | December 21, 2015 00:07 am
दिल्ली पुलिस (फाइल फोटो)

पुलिस के कामकाज के तरीके में सुधार की जरूरत काफी समय से रेखांकित की जाती रही है। इसके लिए कई पुलिस सुधार आयोग और समितियां सुझाव भी दे चुकी हैं। इस दिशा में समय-समय पर कुछ कदम भी उठाए गए, पर अभी तक उल्लेखनीय सुधार नहीं आ पाए हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री का पुलिस को अधिक संवेदनशील और चाक-चौबंद बनाने पर जोर स्वाभाविक है। गुजरात के कच्छ में राज्यों के पुलिस महानिदेशकों और उपनिरीक्षकों के सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने जोर दिया कि पुलिस को स्थानीय लोगों के साथ बेहतर तालमेल बनाने और अत्याधुनिक सूचना तकनीक के इस्तेमाल में दक्षता हासिल करने की जरूरत है। पिछले साल गुवाहाटी में आयोजित सम्मेलन में भी उन्होंने पुलिस को ‘स्मार्ट’ बनाने पर जोर दिया था। इस वक्त चूंकि दुनिया भर में दहशतगर्दी से निपटने पर जोर दिया जा रहा है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस समस्या से पार पाने के लिए हर प्रयास करने की वचनबद्धता दोहरा चुके हैं, उनका पुलिस के कामकाज में बदलाव पर बल देना समझा जा सकता है।

जब तक आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर मुस्तैदी नहीं होगी, आतंकवाद से निपटना मुश्किल बना रहेगा। सेना के बल पर सीमा की रक्षा तो संभव है, पर आंतरिक मामलों में राज्यों की पुलिस और खुफिया एजंसियों का तालमेल बेहतर होना बहुत जरूरी है। मगर हकीकत यह है कि इस मामले में पुलिस अक्सर कमजोर साबित होती है। सूचनाएं जुटाने के मामले में पुलिस को स्थानीय लोगों के साथ मिल कर काम करना चाहिए, मगर इस पक्ष को वह कभी मजबूत नहीं बना सकी। उनके साथ पुलिस की दूरी जगजाहिर है। वह लोगों में भय पैदा करके कानून का पालन कराने पर ज्यादा भरोसा करती है। इसी का नतीजा है कि बहुत सारे मामलों में जहां स्थानीय लोगों से मदद मिल सकती है, वह नहीं मिल पाती।

आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने के मकसद से राज्यों की पुलिस, सीमा सुरक्षा बल और खुफिया एजेंसियों के बीच एक कारगर केंद्रीय तंत्र विकसित करने पर जोर दिया गया था। मगर अभी तक इस दिशा में कोई उल्लेखनीय कदम नहीं उठाया जा सका है। वास्तविकता यह है कि पुलिसकमिर्यों को आज भी सूचना तकनीक के अत्याधुनिक उपकरणों के संचालन का समुचित प्रशिक्षण नहीं है। दहशतगर्द इस मामले में बहुत आगे निकल चुके हैं। फिर खुफिया सूचनाओं की अनदेखी, दूसरे राज्यों की पुलिस के साथ मिल कर काम न करने और सीमा सुरक्षा बल या फिर दूसरे सुरक्षा बलों के साथ सहयोग न करने की प्रवृत्ति पुलिस में जैसे जड़ें जमाए बैठी है। जब तक इन पक्षों को सुधारने के व्यावहारिक उपाय नहीं किए जाते, तब तक पुलिस के कामकाज के तरीके में बदलाव की उम्मीद धुंधली बनी रहेगी।

प्रधानमंत्री ने पुलिस को जो नसीहतें दी हैं, वे पहले भी अनेक मौकों पर दी जा चुकी हैं, पर उसमें कोई सकारात्मक परिवर्तन नजर नहीं आ रहा तो उसकी कुछ वजहों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। इसके लिए पुलिस के कामकाज में बेवजह राजनीतिक दखलअंदाजी पर रोक लगाना बेहद जरूरी है। सरकारें पुलिस को अपनी इच्छा के अनुसार संचालित करना बंद कर दें, तो इससे पुलिस को निष्पक्ष और कारगर तरीके से काम करने में काफी सहूलियत होगी। इसलिए अगर केंद्र सरकार चाहती है कि पुलिस का चेहरा मानवीय बने, वह मुस्तैदी से काम करे तो उसे पुलिस सुधार संबंधी सिफारिशों को लागू करने के प्रति गंभीरता दिखानी चाहिए।

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