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संपादकीयः आग्रह और अनुग्रह

आपदा, दुर्घटना, आतंकी हमले आदि में हताहत होने वालों या उनके परिजनों को आर्थिक मदद पहुंचाना सरकारों का नैतिक कर्तव्य है।
Author March 11, 2017 03:58 am
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया

आपदा, दुर्घटना, आतंकी हमले आदि में हताहत होने वालों या उनके परिजनों को आर्थिक मदद पहुंचाना सरकारों का नैतिक कर्तव्य है। मगर जब सरकारें अपना राजनीतिक आधार मजबूत करने के मकसद से नियम-कायदों को ताक पर रखते हुए अनुग्रह राशि घोषित करती हैं, तो उस पर अंगुलियां उठना स्वाभाविक है। यही हुआ दिल्ली में आम आदमी पार्टी सरकार के फैसले पर। पिछले साल नवंबर में समान रैंक समान पेंशन की मांग लेकर आंदोलन कर रहे पूर्व सैनिकों में से एक ने जहर खाकर खुदकुशी कर ली। तब केंद्र सरकार पर कई तरह के सवाल उठे। उस वक्त अरविंद केजरीवाल सरकार ने मृतक सैनिक के परिजनों को एक करोड़ रुपए अनुग्रह राशि देने की घोषणा की थी। उस फैसले को उपराज्यपाल अनिल बैजल ने नियम विरुद्ध करार देते हुए निरस्त कर दिया है। अब मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री पर आरोप लगाया है कि वे सैनिकों के प्रति पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाते हैं। इस तरह उन्होंने अनुग्रह राशि देने के औचित्य को समझने के बजाय राजनीतिक रंग दे दिया है।

सरकारी खजाने से मदद पहुंचाने को लेकर भी नियम-कायदे हैं। नियम है कि अगर कोई व्यक्ति ड्यूटी पर रहते हुए किसी दुर्घटना में मारा जाता है तो उसके परिजनों के भरण-पोषण के लिए मदद पहुंचाई जानी चाहिए। इसके दायरे में सेना, अर्द्ध सैनिक बल, दिल्ली पुलिस होम गार्ड, अग्निशमन सेवा के कर्मचारी और दिल्ली सरकार के वे कर्मचारी आते हैं जो सेना, पुलिस या दमकल कर्मियों के साथ सहायता में जुटे हों। इस लिहाज से ओआरओपी के लिए आंदोलन करते हुए खुदकुशी करने वाले पूर्व सैनिक को अनुग्रह राशि देने का औचित्य समझ नहीं आता। इस तरह खुदकुशी करने वाले किसी नागरिक के प्रति सरकार की संवेदना सराहनीय है, मगर उससे यह अपेक्षा भी की जाती है कि सरकारी खजाने का मुंह खोलने से पहले स्थिति की हकीकत समझे, नियम-कायदों का पालन करे। खुदकुशी करने वाले पूर्व सैनिक के बारे में उस समय कई तरह की खबरें सामने आई थीं। अगर उन पर गौर करने का समय नहीं था, तो यह ध्यान रखना चाहिए था कि उस आंदोलन में केंद्र सरकार जवाबदेह थी। अगर उसमें अनुग्रह राशि देने का औचित्य था तो उसका फैसला पहले केंद्र को करना चाहिए था। यह ठीक है कि कई मामलों में मुख्यमंत्री को विवेक के आधार पर अपने सीमा क्षेत्र से बाहर जाकर भी सहायता राशि देने का अधिकार होता है, पर इस मामले में दिल्ली सरकार के फैसले के पीछे केंद्र को कठघरे में खड़ा करने का मकसद अधिक दिखाई देता था।

आपदा, दुर्घटना आदि के समय या फिर सामाजिक दायित्व का निर्वाह करते हुए मुख्यमंत्री को आर्थिक मदद पहुंचाने या फिर लोगों को पुरस्कृत करने आदि का विशेषाधिकार होता है। इसके लिए अलग से कोष निर्धारित होता है। मगर अक्सर देखा जाता है कि मुख्यमंत्री अपने इस अधिकार का दुरुपयोग करते हैं। वास्तविक भुक्तभोगियों और जरूरतमंदों तक आर्थिक मदद नहीं पहुंच पाती, जबकि सरकार से नजदीकी रखने वाले इसका लाभ उठा लेते हैं। इस कोष का उपयोग प्राय: सराहना बटोरने और जनाधार बढ़ाने के मकसद से भी किया जाता है। लोगों को सरकारी जमीन का आबंटन कर देना, किसी संस्था को आर्थिक मदद देना, किसी खास समुदाय के लोगों को उपकृत करने के लिए मदद पहुंचा देना, राजनीतिक मकसद साधने का तरीका बनते गए हैं। ऐसे में दिल्ली सरकार के फैसले को निरस्त कर उपराज्यपाल ने एक तरह से दूसरी सरकारों के सामने भी नजीर पेश की है।

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