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संपादकीयः सराहनीय पहल

पाकिस्तान में आतंकवादी संगठनों को पनाह मिलना भारत के लिए तो परेशानी का सबब रहा ही है, इस मसले पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भी चिंता बढ़ रही है।
Author July 22, 2017 03:05 am

पाकिस्तान में आतंकवादी संगठनों को पनाह मिलना भारत के लिए तो परेशानी का सबब रहा ही है, इस मसले पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भी चिंता बढ़ रही है। अमेरिकी संसद के एक पैनल ने आंतकी गतिविधियों को अपनी जमीन पर रोक पाने में विफल रहने के कारण पाकिस्तान को दी जाने वाली मदद रोक देने का समर्थन किया है। इसके लिए अमेरिकी विदेशमंत्री को अधिकृत किया गया है। पाकिस्तान से आतंकी गतिविधियां संचालित करने वाले कई संगठन हैं। अमेरिका के अनेक प्रतिनिधि काफी समय से यह मांग करते रहे हैं कि पाकिस्तान को अमेरिकी मदद रोक दी जाए। इस बारे में हाउस अप्रोप्रिएशंस कमेटी ने बुधवार को ‘स्टेट एंड फॉरेन आॅपरेशंस अप्रोप्रिएशन बिल 2018’ को ध्वनिमत से पारित कर दिया। इसमें स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि अपनी सरजमीं पर चल रही आतंकी गतिविधियों को रोक पाने में पाकिस्तान के विफल रहने पर अमेरिकी विदेशमंत्री को यह अधिकार होगा कि वे सहायता रोक दें। इस विधेयक को विचार के लिए फिलहाल प्रतिनिधि सभा के पास भेजा गया है।

विधेयक के मुताबिकअमेरिकी विदेशमंत्री पहले यह समीक्षा करेंगे कि पाकिस्तान के भीतर हक्कानी नेटवर्क, क्वेटा शूरा तालिबान, जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा और अलकायदा या अन्य कोई भी आतंकी समूह क्या गतिविधि चला रहा है। अमेरिकी प्रशासन देखेगा कि पाकिस्तान सरकार ने अपने यहां या पड़ोसी मुल्कों में इन संगठनों की आतंकी गतिविधियों को समाप्त किया है नहीं। अगर पाकिस्तान सरकार इसमें नाकाम रहती है तो अमेरिकी विदेशमंत्री सहायता राशि रोकने का आदेश दे सकेंगे। जाहिर है, ऐसा हुआ तो यह पाकिस्तान के लिए बहुत बड़ा झटका होगा। इससे पहले हिज्बुल मुजाहिदीन, जैश-ए-मोहम्मद, हक्कानी नेटवर्क आदि को अमेरिका पहले ही आतंकी सूची में शामिल कर चुका है। पाकिस्तानी फौज के खुफिया संगठन आइएसआइ पर लंबे समय से यह आरोप लगता रहा है कि अफगानिस्तान और भारत के खिलाफ सक्रिय आतंकी समूहों को वह संरक्षण देता है। जब भी पाकिस्तान पर इस तरह के आरोप लगते हैं तो संयुक्त राष्ट्र से लेकर दूसरे मंचों पर उसकी यही दलील होती है कि उसने किसी आतंकी समूह को संरक्षण नहीं दे रखा है, बल्कि वह भी दहशतगर्दी का शिकार है। जबकि यह कोई छिपा हुआ तथ्य नहीं है कि पाकिस्तान में जिन संगठनों ने आतंकवादी वारदातों को अंजाम दिया है, वे पहले आइएसआइ की छत्रछाया में ही पाले-पोसे गए थे।

मुंबई में 2008 में हुए आतंकी हमले की तैयारी में शामिल रहे डेविड हेडली के कबूलनामों से भी इस खौफनाक हकीकत की पुष्टि होती है। अब भले ही वे पाकिस्तान के लिए भस्मासुर साबित हो रहे हों, मगर दूसरे मुल्कों के लिए तो वे पहले से सिरदर्द बने हुए हैं। अगर आतंकी समूह स्वयं पाकिस्तान के भीतर सक्रिय हैं, और पाक सरकार ऐसा मानती भी है, तब तो उसकी जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि ऐसे तत्त्वों को नेस्तनाबूद कर दे। लेकिन असल समस्या यह है कि आतंकवाद के मुद््दे पर पाकिस्तान सरकार की नीति दोमुंही है। आतंकी गुटों के ठिकानों और उनकी गतिविधियों के बारे में सबकुछ मालूम होते हुए भी पाकिस्तान सरकार कोई कार्रवाई नहीं करती। लिहाजा, अमेरिकी सांसदों ने जो पहल की है वह तार्किक परिणति तक पहुंचनी चाहिए।

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